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विस्तार के साथ मतभेद भी बढ़े हैं | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक मई 2004 को विस्तार के साथ ही यूरोपीय संघ जनसँख्या की दृष्टि से दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा क्षेत्र बन गया है. नंबर एक पर है चीन जिसके बाद बारी आती है भारत की. ज़ाहिर है इसके परिणाम इन देशों पर तो पड़ेंगे ही लेकिन ख़ास बात ये है कि ज़्यादा प्रभावित होंगे यूरोपीय संघ के रूस और तुर्की जैसे पड़ोसी देश. तुर्की यूरोपीय संघ का सदस्य बनना चाहता है. अगर ऐसा हो गया तो वो यूरोपीय संघ का पहला मुस्लिम देश होगा. इसके अलावा जर्मनी के बाद वो युरोपीय संघ का सबसे बड़ा देश हो जाएगा. तुर्की को सदस्यता कब मिलेगी ये कहना तो मुश्किल है लेकिन हाँ इस पर बातचीत कब शुरु होगी इस पर फैसला दिसंबर में पच्चीसों सदस्य देश मिल कर लेंगे. हालाँकि अभी तक तुर्की ने जो क़दम उठाएं हैं उन्हें लेकर यूरोपीय आयोग के अध्यक्ष रोमानो प्रोदी काफी प्रभावित दिखें हैं. “तुर्की ने सुधार लाने में ख़ासी दिलचस्पी दिखाई है. अभिव्यक्ति की आज़ादी और धर्म को लेकर बहुत कट्टर न होने के साथ-साथ राजनीति में सेना की भूमिका को लेकर भी काफी उदारता देखी जा रही है.”
तुर्की सरकार यूरोपीय संघ के सदस्यों के साथ बातचीत कर उन्हे प्रभावित करने में जुटी है. जर्मनी ने अपना सहयोग देने की बात कही है वहीं अमरीका का क़रीबी माने जाने वाले पोलैंड ने भी तुर्की के पक्ष में अपनी बात रखने के संकेत दिए हैं. एस्टोनिया जैसे छोटे देश भी तुर्की का विरोध नहीं कर रहे हैं. एस्टोनिया के पूर्व प्रधानमंत्री सीम कलास जो अब नए यूरोपीय आयुक्त हैं मानते हैं कि नए सदस्यों का स्वागत करना चाहिए. “जैसे नए सदस्य देशों के लिए ये कहना तो क़तई उचित नहीं होगा की जब कि हमें शामिल कर लिया गया है तो दूसरों के लिए अब दरवाज़ों को बंद कर देना चाहिए. मुझे पता है कि यूरोपीय संघ के साथ बातचीत और विचार विमर्श ने देश की आंतरिक स्थिति पर भी प्रभाव डाला है.” लेकिन हाँ एस्टोनिया जैसे नए सदस्य देश, जो कभी सोवियत संघ का हिस्सा हुआ करते थे, उन्हें इस बात को लेकर चिंता है कि कुछ यूरोपीय देश रूस को विशेष दर्जा देते हैं. अपना-अपना ख़याल वैसे यूरोपीय संघ के अभी हुए नए विस्तार के समय रूस के साथ इसके संबंध को बढा-चढा कर पेश नहीं किया जा सकता. रूस युरोपीय संघ के साथ पहले किए गए कुछ राजनीतिक और आर्थिक समझौतों को अब एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया जैसे पूर्व सोवियत संघ देशों पर लागू नहीं करना चाहता.
यूरोपीय संघ ने पहले ही चेतावनी दे डाली है कि अगर ऐसा नहीं किया गया तो द्विपक्षीय व्यापार पर उसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं. तो ये तो हुई बात तुर्की और रूस जैसे पड़ोसी देशों की. भारत की अगर बात करें तो यूरोपीय संघ और भारत के बीच संबंध कोई नए नहीं हैं. जब वर्तमान यूरोपीय संघ – यूरोपीय आर्थिक समुदाय ईईसी की शक्ल में था तब राजनयिक तौर पर मान्यता देने में भारत सबसे आगे था. हाल ही में यूरोपीय संघ के विदेश मामलों के आयुक्त क्रिस पैटन ने भी भारत के बारे में कहा था कि दक्षिण एशिया में अगर कोई देश स्वाभाविक रूप से यूरोपीय संघ का सहयोगी हो सकता है तो वो भारत है. लेकिन एक तरफ सच ये भी है कि भारत को चीन, इंडोनेशिया और दक्षिण कोरिया से कड़ी टक्कर मिल सकती है. अगर अभी तुलना करें तो यूरोप के साथ चीन का व्यापार भारत के मुक़ाबले 6 गुना ज़्यादा है. हाँ भारत के पक्ष में ये है कि वहाँ अग्रेज़ी में कामकाज होता है जिससे यूरोप के साथ व्यापार करने में आसानी होती है. लेकिन अब जिस रफ़्तार से चीन में अंग्रेज़ी पर ज़ोर दिया जा रहा है, लगता है भारत के लिए चुनौती बढेगी ही. बहरहाल इस विस्तार से उत्साह का माहौल है. उत्सुकता यह जानने की है कि नए सदस्य देशों के लिए क्या कुछ बदलेगा. नए अधिकारी अपने काम को समझने बूझने में लगे हैं और इनकी तनख़्वाह होगी 18 हज़ार यूरो प्रति माह जो उनकी पिछली तनख़्वा से कम से कम चार या पाँच गुना ज़्यादा. यूरोपीय संसद में किस तरह से काम करना है, प्रमुख अधिकारियों से किन विषयों पर क्या चर्चा करनी है और यँहा तक की पत्रकारों से कैसे बात करनी है,सभी कुछ सिखाया जा रहा है. यूरोपीय आयोग के दफ़्तर में काफी चहल पहल है लेकिन क्या यहाँ काम करने वाले 20 हज़ार कर्मचारियों को स्लोवेनिया और स्लोवाकिया के बीच अंतर का पता है. जब यही पूछा ब्रसेल्स स्थित यूरोपीय आयोग के महासचिव डेविड ओ सुलिवाँ से तो उनका जवाब था, “मुझे पुरी उम्मीद है कि लोगों को स्लोवेननिया और स्लोवेकिया के बीच का फर्क़ तो पता होगा हाँ ये ज़रूर है कि शायद कुछ लोग सभी 25 सदस्य देशों के नाम एक साथ न भी ले पाएँ.” |
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