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उपनिवेशवाद से दोस्ती की डगर पर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अगर ये पूछा जाए कि विश्व का वो कौन सा महाद्वीप है जहाँ उपनिवेशवाद पनपा, जहाँ के देशों ने एक समय एक तरह से पूरे विश्व पर राज किया तो आप फौरन समझ जाएंगे कि हम यूरोप की बात कर रहे हैं. लेकिन यूरोप ही एक ऐसा महाद्वीप भी है जिसने सबसे ज्यादा बदलाव देखे और जो आज भी बदलाव के दौर से गुज़र रहा है. एक मई 2004 को यूरोपीय संघ के सदस्यों की संख्या बढ़ कर 25 हो गई. विश्व युद्ध में आपस में लड़ते झगड़ते यूरोप के पड़ोसी देश जो स्वयं को एक दूसरे से श्रेष्ठ दिखाने में जुटे थे. अगर पिछली शताब्दी की बात करें तो दोनों विश्व युद्धों ने यूरोप को मानो काट कर ही रख दिया. फिर वो ऐसा क्या था जो यूरोप को जोड़ सकता था, बात-बात पर एक दूसरे से लड़ते-झगड़ते ये देश कभी एक दूसरे के सहयोगी बनेंगे या मिल कर काम करेंगे. उस समय अगर किसी को ये बताते तो कोई कभी यक़ीन ही नहीं करता. तो फिर आख़िर किस चीज़ में इतना दम था जो दुश्मनी को दोस्ती में बदल सके. अब भला और क्या हो सकता है. वो कहते हैं न कि सबसे बड़ा रूपैया...आर्थिक हितों के सामने इन देशों ने बाकी सभी मामलों को अलग रखने का निर्णय लिया. फ्रांस और जर्मनी एक दूसरे के कट्टर विरोधी थे लेकिन दोनों ही देशों के पास कुछ ऐसा था जो एक दूसरे के काम आ सकता था, एक दूसरे को और मज़बूत बना सकता था. ये था – कोयला और इस्पात. जर्मनी के पास कोयला था और फ्रांस के पास बड़ी मात्रा में इस्पात के भण्डार थे. बस फिर क्या था आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए इन देशों ने अपने मतभेदों को दरकिनार करके हाथ मिलाने का फ़ैसला किया और इसमें इटली, बेल्जियम, नीदरलैंड और लक्स़मबर्ग ने इनका साथ दिया. इस गठबंधन ने 1957 में यूरोपीय आर्थिक समुदाय यानी ईईसी का रूप लिया और इन देशों ने अपने रिश्तों को और मज़बूत बनाने की बात कही. 1986 तक ईईसी के सदस्य देशों की सँख्या बढ कर 12 हो गई. फिर 1993 में माश्ट्रिश्ट संधि ने ईईसी को यूरोपीय संघ में परिवर्तित किया. लेकिन इस यूरोपीय संघ और आज के यूरोपीय संघ में बहुत अंतर है. तब केवल इन देशों के बाज़ारों को ही आपस में जोड़ा गया था. फिर दो साल बाद यानी 1995 में यूरोपीय संघ के सदस्य देशों की सख्या बढ कर 15 हो गई. और एक मई 2004 को यूरोपीय संघ के सदस्य देशों की संख्या बढ कर हो गई 25 जब पोलैंड, स्लोवेनिया और माल्टा समेत समेत दस देश यूरोपीय संघ में शामिल हो जाएंगे. वैसे आज हम जिस रूप में यूरोप को देख रहें हैं उसकी नींव 1960 के दशक में एक वरिष्ठ फ्रांसिसी अधिकारी ज़्यो मौने ने रखी थी. उनका कहना था, “यूरोपीय संघ महज़ एक योजना या दस्तावेज़ नहीं है ये एक सिलसिला है. इंसान का स्वभाव नहीं बदलता लेकिन जब सभी राष्ट्र एक ही नियम का पालन करना शुरु कर दें और एक ही संस्थान को मानना शुरु कर दें तो एक दूसरे के प्रति उनका व्यवहार बदलता है और फिर सभ्यता इसे ही तो कहते हैं.” मतभेद लेकिन एक सच ये भी है कि इन देशों के बीच मतभेद भी रहते हैं और ये मतभेद बहुत से विषयों पर हैं जैसे कुछ का मानना है कि बाहरी प्रतिस्पर्धा से बचना चाहिए, वहीं कुछ दुनिया भर में मुक्त व्यापार को और बढावा दिए जाने के पक्षधर हैं.
कुछ चाहते हैं कि यूरोपीय संघ अमरीका की तरह महाशक्ति बने, वहीं कुछ का मानना है कि यूरोपीय संघ के देशों को एक संगठन मात्र बन कर ही रहना चाहिए. यूरोपीय संघ में जहाँ जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और इटली जैसे देश हैं जिनकी गिनती अमरीका और जापान के बाद विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में की जाती है, वहीं कुछ छोटे देश भी हैं. ऐसे में इन देशों को एक साथ एकजुट रखना, एक ही मार्ग पर आगे बढना और फिर यूरोपीय संघ के विस्तार पर भी ध्यान देना, यह कोई आसान डगर नहीं है. |
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