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यूरोप में एक नए दौर की शुरूआत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पश्चिमी यूरोप के स्थाई लोकतंत्र वाले देशों को यह समझना ख़ासा मुश्किल होगा कि पूर्वी और मध्य यूरोपीय देशों के लिए यूरोपीय संघ में शामिल होने का क्या मतलब है. पश्चिमी यूरोप के ज़्यादातर देश दशकों तक टिकाऊ लोकतंत्र और विकसित अर्थव्यवस्था के फ़ायदे देख चुके हैं. सोवियत संघ के विघटन और साम्यवाद के सफ़ाए के बाद और बर्लिन की दीवार गिरने के साथ ही पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी का एकीकरण होने से लेकर यह मुहावरा काफ़ी इस्तेमाल किया गया है कि "शीत युद्ध समाप्त हो चुका" है. लेकिन इस बार यूरोपीय संघ के ऐतिहासिक विस्तार के मौक़े पर इस मुहावरे को कोई हवा नहीं मिल रही है. आठ पूर्व कम्युनिस्ट देशों के लिए यूरोपीय संघ में शामिल होना उस सफ़र की मंज़िल जैसा होगा जो उन्होंने 15-16 साल पहले शुरू किया था. यूरोपीय संघ के मौजूद सदस्य देश बहुत से मुद्दों पर ख़ासी बहस कर रहे हैं, जैसे- किसको कितना अधिकार हो, संविधान की शब्दावली क्या हो, संघ के मुख्यालय और सदस्य देशों के बीच अधिकारों का बँटवारा कैसे हो और महत्वपूर्ण फ़ैसले बहुमत से लिए जाएं या फिर सर्वसम्मति से वग़ैरा-वग़ैरा. लेकिन नए सदस्य देशों के लिए यूरोपीय संघ का सदस्य ही बन जाना बहुत महत्व की बात है. कठिन दौर एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया क़रीब आधी सदी तक सोवियत संघ का हिस्सा थे और स्लोवेनिया कम्युनिस्ट देश यूगोस्लाविया का हिस्सा था. हंगरी, पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया (अब चेक गणराज्य और स्लोवाकिया) पर भी दूसरे विश्व युद्ध के बाद से सोवियत सेनाओं का क़ब्ज़ा था और यह क़ब्ज़ा 1989 तक रहा. इन तीनों देशों के लिए सोवियत संघ से अलग होने की कोशिशें बहुत ख़ून-ख़राबे वाली रही हैं. हंगरी में राष्ट्र स्तर पर विद्रोह हुआ और सोवियत संघ के नेतृत्व वाली वारसा संधि से अलग होने की कोशिश की गई तो 1956 में सोवियत सेनाएं घुस गईं और तब हज़ारों लोग मारे गए. पोलैंड में सोलिडैरिटी नाम के ट्रेड यूनियन आंदोलन को 1080-81 में मार्शल लॉ का सामना करना पड़ा और वहाँ के सैनिक जनरलों ने सोवियत संघ की इच्छाओं को अंजाम दिया. बाल्टिक युद्धभूमि तीन बाल्टिक देशों - एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया ने तो सोवियत संघ में शामिल होने के बाद से बहुत मुश्किलों भरा दौर देखा है. कहा जाता है कि उनके बारे में सोवियत संघ के नेता स्टालिन और जर्मनी के तानाशाह हिटलर के बीच कोई गुप्त समझौता हुआ था. दूसरे विश्व युद्ध के बाद बाल्टिक राज्यों में रूसियों की तो बाढ़ सी आ गई. उनका मक़सद स्थानीय आबादी को दरकिनार करना था और वहाँ की अर्थव्यवस्था को रूसी रंगरूप देना था. |
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