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हमास नेता शेख़ यासीन का जीवन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
शेख़ यासीन शरीर से बिल्कुल कमज़ोर थे जिन्हें मुश्किल से दिखाई पड़ता था. उनकी आवाज़ भी कांपती थी. मगर इसके बावजूद वे फ़लस्तीनियों के नेता थे और उनकी लोकप्रियता बढ़ती ही जा रही थी. उनका जन्म 1938 में तत्कालीन फ़लस्तीन राष्ट्र में हुआ था. बचपन में हुई एक दुर्घटना ने उन्हें लकवाग्रस्त बना दिया. इसके बाद उन्होंने अपने जीवन के आरंभिक वर्ष इस्लाम के अध्ययन में बिताए. उन्होंने मिस्र की राजधानी काहिरा में पढ़ाई की जहाँ अरब जगत का सबसे पुराना मुस्लिम राजनीतिक आँदोलन शुरू हुआ था जिसे 'मुस्लिम ब्रदरहुड' के नाम से जाना जाता है. काहिरा में ही शेख यासीन ने ये धारणा बनाई कि फ़लस्तीन एक मुस्लिम स्थान है और किसी भी अरब नेता को इस क्षेत्र का कोई भी हिस्सा छोड़ने का अधिकार नहीं है. अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहली बार शेख़ यासिन का ना 1987 में आया जब फ़लस्तीनियों के पहले इंतिफ़ादा या विद्रोह की शुरूआत हुई. इसी वर्ष फ़लस्तीनियों के मुस्लिम आँदोलन ने अपना नाम हमास रखा जिसका शाब्दिक अर्थ होता है 'जोश' या 'जज़्बा'. शेख़ यासीन हमास के पहले आध्यात्मिक नेता बने. 1989 में इसराइल ने शेख़ यासीन को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई. उन्हें ये सज़ा इसलिए दी गई क्योंकि उन्होंने उन फ़लस्तीनियों की हत्या करने का आदेश दिया था जो कथित तौर पर इसराइली सेना का साथ दे रहे थे. मगर 1997 में शेख़ यासीन को रिहा कर दिया गया था. दिसंबर 2001 में फ़लस्तीनी पुलिस ने उन्हें घर में नज़रबंद कर दिया जिसके बाद झड़प हुई और एक व्यक्ति मारा गया. जून 2002 में इसराइल के ख़िलाफ़ हुए कई आत्मघाती बम हमलों के बाद फ़लस्तीनी पुलिस ने उनके घर को घेर लिया जिसके बाद फिर हिंसा भड़की. सितंबर 2003 में इसराइली सेना ने उनकी हत्या का प्रयास किया जब वे गज़ा में अपने एक सहयोगी के घर गए हुए थे. |
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