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रूस के बारे में जानकारियाँ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सोवियत संघ के टूट जाने के बाद से रूस साम्यवाद की छाया से बाहर निकलने और दोबारा एक मज़बूत राष्ट्र बनने की कोशिश में है. लेकिन प्रजातंत्र और खुली अर्थव्यवस्था को गले लगाने का उसका फ़ैसला अब तक पूरी तरह सफल नहीं रहा है. शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो रूस के आकार और इसकी विविधता से प्रभावित न हो. लगभग 1.7 करोड़ वर्ग किलोमीटर आकार का यह देश उत्तरी हिस्सा बहुत ठंडा है वहीं इसके दक्षिणी हिस्से गर्म रहते हैं. अस्सी के दशक में साम्यवाद की समाप्ति के दस वर्ष बाद तक रूस को आर्थिक संकट झेलना पडा. अगस्त 1998 में रूसी मुद्रा रूबल में भारी गिरावट देखी गई लेकिन उसके बाद से अर्थव्यवस्था काफ़ी सुधरी है.
नब्बे के दशक में निजीकरण का दौर शुरू हुआ जिसने कुछ लोगों को ढेर सारा पैसा कमाने का मौक़ा दिया. 'ओलीगार्क' कहे जाने वाले इन पूंजीपतियों ने गैस और तेल कंपनियों के अलावा मीडिया कंपनियों को ख़रीद कर करोड़ों बनाए. जानकारों का कहना है कि बरिस येल्तसिन ने इन पूंजीपतियों का प्रभाव राजनीतिक क्षेत्र में आने दिया लेकिन व्लादिमीर पुतिन ने राष्ट्रपति बनते ही इन्हें किनारे लगाना शुरू कर दिया. कुछ पूंजीपतियों के ख़िलाफ़ आपराधिक मामले शुरू कर दिए गए और कुछ अन्य को रूस छोड़ कर भागना पडा. रूस में आबादी का 80 प्रतिशत हिस्सा रूसियों का है और ये लोग इसाई धर्म का पालन करते हैं. इनके अलावा एक बड़ी संख्या मुस्लिम और बशकीर लोगों की भी है. मुस्लिम आबादी ज़्यादातर वोल्गा तातार क्षेत्र में रहती है जबकि बशकीर उत्तरी कॉकसस क्षेत्र में रहते हैं. चेचन समस्या चेचन्या में अलगाववाद की समस्या रूसी प्रसाशन के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है. लगभग एक दशक से जारी इस समस्या में अब तक हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं. हालाँकि 1994 से चेचन्या में शुरू हुए रूसी सैनिक अभियान को पश्चिमी देशों की आलोचना झेलनी पड़ी है लेकिन ग्यारह सितंबर के हमलों के बाद इसमें थोड़ी कमी दिखी है. न्यूयॉर्क और वॉशिंगटन पर हुए इन हमलों के बाद रूस ने अमरीका को अपना समर्थन दिया था जिसका असर नेटो-रूस संबंधों पर भी पडा है. मई 2002 में नेटों देशों ने रूस को संगठन में बराबरी का दर्जा देने का फ़ैसला किया. लेकिन इराक़ पर अमरीकी सैनिक अभियान को लेकर अमरीका और रूस के संबंधों में थोड़ी खटास आ गई. फ़्रांस और जर्मनी की तरह रूस ने भी अमरीका का साथ नहीं दिया. इराक़ संकट के शांतिपूर्ण समाधान की रूसी कोशिश अमरीका को साफ़ संदेश था कि रूस मुख्य अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अमरीका से अलग रूख अपनाने से नहीं कतराएगा. नेता व्लादिमीर पुतिन ने अपने कामकाजी जीवन की शुरूआत रूसी ख़ुफ़िया एजेंसी केजीबी से की थी. वर्ष 1990 में उन्होंने सेंट पीटर्सबर्ग प्रशासन के साथ काम करना शुरू किया और फिर 1996 में वे मॉस्को चले आए. अगस्त 1999 तक वे रूस के प्रधानमंत्री बन चुके थे.
1999 में तत्कालीन राष्ट्रपति बरिस येल्तसिन ने पुतिन को कार्यवाहक राष्ट्रपति मनोनीत कर दिया. येल्तसिन ने कहा कि पुतिन ही वो व्यक्ति हैं जो “रूस को फिर ताकतवर देश बनाने वालों को संगठित कर सकते हैं”. मई 2000 में राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव को पुतिन ने भारी बहुमत से जीता. चेचन विद्रोहियों से सख़्ती से निबटने का उनका निश्चय लोगों को बहुत पसंद आया. उन्होंने रूस को एक आधुनिक और मज़बूत राष्ट्र बनाने की बात कही और सरकारी बजट को संतुलित करने के अलावा देश में महंगाई की बढ़ती दर पर भी लगाम लगाई. ग्यारह सितंबर के हमलों के तुरंत बाद राष्ट्रपति पुतिन ने अमरीका को अपना पूरा समर्थन देने की वादा किया. लेकिन इराक़ में सैनिक अभियान पर उन्होंने अमरीका का विरोध किया और जर्मनी और फ़्रांस की तरह ऐसे अभियान के लिए संयुक्त राष्ट्र के समर्थन पर ज़ोर दिया. समाचार माध्यम पिछले कुछ वर्षों में रूसी प्रशासन ने देश के मुख्य टीवी चैनलों पर अपनी पकड़ मज़बूत की है. चैनल वन, आरटीआर और एनटीवी ऐसे कुछ चैनल हैं जिन्होंने इस बदलाव को महसूस किया है.
आलोचकों का कहना है कि सरकार के इस प्रयास का सीधा असर समाचारों की निष्पक्षता पर पड़ा है. गैज़प्रॉम और लुकऑयल जैसी सरकारी कंपनियों और अदालत में लाए गए मामलों की मदद से सरकार ने 2001 में एनटीवी चैनल पर अपना नियंत्रण किया और फिर जनवरी 2002 में टीवी-6 को बंद कर दिया. समाचार-पत्र मॉस्कोवस्की कोमसोमोलेत्स ने दिसंबर 2001 में अपने एक संपादकीय में लिखा, “रूस के सभी टीवी चैनल एक जैसे लगते हैं. सभी पर राष्ट्रपति पुतिन के नेतृत्व में रूस की उपलब्धियों की चर्चा नज़र आती है.” सरकार के इस कड़े रुख का एक बड़ा कारण चेचन्या में जारी लड़ाई को माना जाता है. चेचन्या में काम कर रहे कई पत्रकार मारे जा चुके हैं और कुछ अन्य का पता नहीं है. इसके अलावा राजधानी मॉस्को में भी पत्रकारों से पूछताछ और उन्हें तंग करने के भी समाचार आते रहते हैं. |
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