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ईरान में चुनाव से संबंधित विवाद | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ईरान में 20 फ़रवरी के चुनाव के लिए कट्टरपंथी संस्था शूरा-ए-निगहबान ने सैकड़ों सुधारवादी उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित कर दिया है. शूरा-ए-निगहबान वो संस्था है जिसकी देखरेख में चुनाव होते हैं. कट्टरपंथियों और उदारवादियों के बीच मतभेद बढ़ गए हैं. एक नज़र डालते हैं कि ईरान में चुनावों से जुड़ा ये विवाद क्या है: ये पूरी समस्या क्या है? कट्टरपंथी संस्था शूरा-ए-निगहबान ने लगभग 5400 उम्मीदवारों को चुनाव में भाग लेने की अनुमति दी है. ये संख्या पिछले चुनाव के मुकाबले काफ़ी कम है क्योंकि लगभग 2300 लोगों को चुनाव लड़ने की इजाज़त नहीं दी गई है. पिछले चुनाव में इसके मुकाबले में एक-चौथाई लोगों को ही चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी गई थी. इन लोगों में सुधारवादी लहर के कई जाने-माने नाम हैं और संसद के 80 सदस्य भी हैं. यहाँ तक कि राष्ट्रपति मोहम्मद ख़ातमी के भाई मोहम्मद रज़ा ख़ातमी को भी चुनाव नहीं लड़ने दिया जा रहा. वे सबसे बड़े सुधारवादी गुट के नेता हैं और संसद के उप सभापति थे. पहले माना जा रहा था कि शायद शूरा-ए-निगहबान बाद में बहुत सारे सुधारवादी को चुनाव लड़ने की इजाज़त दे दे लेकिन अब ये लगता है कि वह सुधारवादियों को सत्ता से बाहर रखना चाहती है. ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतुल्ला अली ख़मेनेई ने भी स्पष्ट संकेत दे दिए कि वे इस समस्या के समाधान के लिए सुधारवादियों की ओर से हस्तक्षेप नहीं करेंगे. चुनाव रोकने से संबंधित विवाद क्या है? सुधारों के पक्ष में उम्मीदवारों को चुनाव से अलग रखने के फ़ैसले के बाद राष्ट्रपति मोहम्मद ख़ातमी की सुधारवादी सरकार ने शूरा-ए-निगहबान से कहा कि वह चुनाव स्थगित कर दे लेकिन उनके अनुरोध को ठुकरा दिया गया. सरकार के गृह मंत्रालय पर चुनाव करवाने की ज़िम्मेदारी है लेकिन मंत्रालय यह कह चुका है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करवाना संभव नहीं है. बड़ी संख्या में सुधारवादी उम्मीदवारों को चुनाव न लड़ने देने के फ़ैसले के बाद कई प्रांतों के गवर्नरों ने इस्तीफ़ा देने की धमकी दे दी. सुधारवादियों को डर है कि कट्टरपंथी चुनाव करवाने के लिए 'रेवोल्युश्नरी गार्ड्स' या ऐसे अन्य सुरक्षाकर्मियों को बुला सकते हैं लेकिन ऐसा करने से राष्ट्रपति और कई अन्य लोगों इस्तीफ़े दे सकते हैं. चुनावों को लेकर जनता कितनी उत्साहित है? जनता ज़्यादा उत्साहित नहीं दिखती. कुछ लोगों को तो ऐसा संदेह भी है कि ये पूरा विवाद चुनाव में लोगों की दिलचस्पी जगाने के लिए उठाया गया है. कुछ अन्य लोग इसे पारिवारिक झगड़ा मानते हैं. जिन सुधारवादी सांसदों ने चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाए उन्हें लोगों से भी कोई ख़ास समर्थन नहीं मिला है. जनता सत्ता में सुधारवादियों के प्रदर्शन से निराश है क्योंकि वे सत्ता पर कट्टरपंथियों का कब्ज़ा ख़त्म नहीं कर पाए हैं. माना जा रहा है कि चुनाव में बहुत अधिक लोग भाग नहीं लेंगे. सुधारवादियों को कितना जनसमर्थन हासिल है? यह कहना बहुत मुश्किल है. पिछले साल तेहरान शहर की परिषद के चुनावों में कट्टरपंथियों की जीत मिली थी. लेकिन इसका कारण ये था कि केवल कट्टरपंथियों के समर्थकों ने ही इस चुनाव में भाग लिया था. इससे पूरे देश की तस्वीर साफ़ नहीं होती. चाहे सुधारवादियों को सत्ता में कुछ अधिक हासिल करने से रोक दिया गया हो लेकिन कुछ लोगों को तो ये उम्मीद होगी कि कम से कम कट्टरपंथियों की जगह सुधारवादियों को ही दोबारा मौका दिया जाए. सुधारवादी अब क्या कर सकते हैं? राष्ट्रपति मोहम्मद ख़ातमी के भाई मोहम्मद रज़ा ख़ातमी को सन 2000 के चुनाव में सबसे अधिक मत मिले थे. लेकिन उन्हें इस चुनाव में लड़ने की इजाज़त नहीं मिली है. उनका कहना है, "सत्ता की वर्तमान व्यवस्था में तो अब सुधार लहर को ख़त्म ही माना जाना चाहिए." उनके गुट 'पार्टिसिपेशन फ़्रंट' ने घोषणा की है कि वह चुनाव में हिस्सा नहीं लेगा. लेकिन कुछ सुधारवादी गुट चुनाव में भाग ले रहे हैं ताकि संसद पर कट्टरपंथियों का कब्ज़ा न हो जाए. ऐसा लगता है कि जिन सुधारवादियों को चुनाव नहीं लड़ने दिया गया वे परिवर्तन लाने के लिए हड़ताल जैसे शांतिपूर्ण ढ़ंग अपना सकते हैं. लेकिन इन चुनावों में यदि एक अस्थिर और अल्पसंख्यक कट्टरपंथी सरकार बनती है तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह अलग-थलग पड़ सकती है और राष्ट्रपति ख़ातमी की अंतरराष्ट्रीय संबंध सुधारने की कोशिशों पर पानी फिर सकता है. |
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