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रविवार, 11 जनवरी, 2004 को 12:08 GMT तक के समाचार
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ईरान में सुधारवादियों पर चुनाव में पाबंदी

ईरान में चुनाव
कुछ सांसद भी अयोग्य क़रार दे दिए गए हैं

ईरान में अगले महीने होने वाले संसदीय चुनाव से सुधारवादियों को बाहर रख दिया है जिससे एक राजनीतिक संकट जैसी स्थिति पैदा हो गई है.

बहुत से सुधारवादी इस चुनाव में उम्मीदवार बनने की उम्मीद कर रहे थे लेकिन एक कट्टरपंथी संस्था ने उन्हें चुनाव लड़ने से अयोग्य क़रार दे दिया है.

ईरान की मौजूदा संसद, जिसे मजलिस कहा जाता है, में इस समय काफ़ी संख्या में सुधारवादी सदस्य हैं.

चुनाव में अयोग्य क़रार दिए जाने के बाद सुधारवादियों ने मजलिस से वाकआउट किया और वे वहीं पर धरना दे रहे हैं.

सुधारवादियों की अयोग्यताओं के बारे में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है और हर सदस्य को निजी तौर पर सूचित किया जा रहा है.

लेकिन स्थानीय अख़बारों में छपा है कि कट्टरपंथी संस्था शूरा-ए-निगहबान यानी निगरानी समिति ने इन लोगों की अयोग्यताएं निर्धारित की हैं. इस संस्था को चुनाव के लिए योग्तयाएं निर्धारित करने का अधिकार है.

सुधारवादी सांसदों के अनुसार इनमें 80 वे सुधारवादी भी शामिल हैं जो सुधारवादी आंदोलन से जुड़े रहे हैं.

इनमें राष्ट्रपति ख़ातमी के भाई मोहम्मद रज़ा ख़ातमी भी शामिल हैं. वह ख़ुद एक बड़ी सुधारवादी पार्टी के अध्यक्ष हैं और संसद के डिप्टी स्पीकर हैं.

दबाव

संसद के स्पीकर मेहंदी ख़रोबी ने इन अयोग्यताओं पर अफ़सोस ज़ाहिर किया है. अलबत्ता उनकी अर्ज़ी मंज़ूर कर ली गई है.

मेहंदी ने कहा है वह ख़ुद और राष्ट्रपति ख़ातमी मौजूदा राजनीतिक संकट टालने के लिए देश के सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतुल्ला अली ख़मेनेई और सुधारवादियों से संपर्क बनाए हुए हैं.

ईरानी सांसद
संसद में चिंता बढ़ गई है

इससे पहले राष्ट्रपति ख़ातमी कह चुके हैं कि अगर अयोग्य क़रार दिए जाने वाले सदस्यों की संख्या बहुत ज़्यादा होती है तो वे स्थिति को संभालने के लिए अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग कर सकते हैं.

लेकिन जिन लोगों को अयोग्य क़रार दिया गया है उन्हें अब भी शूरा-ए-निगहबान से अपील करने का अधिकार है.

लेकिन अंतिम सूची फ़रवरी में निकलेगी इसलिए तब तक कुछ नहीं हो सकता है.

राष्ट्रपति ख़ातमी पर कुछ सुधारवादी यह दबाव बना रहे हैं कि अगर अयोग्य होने वाले लोगों की संख्या बड़ी रहते है तो वे इस्तीफ़ा दे दें.

दूसरी तरफ़ शूरा-ए-निगहबान पर भी कट्टरपंथियों की तरफ़ से यह दबाव है कि वह पीछे ना हटे और ताकि नई संसद में सुधारवादियों का बहुमत ना बन सके.

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