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ताइवान-चीन संबंध: सवाल-जवाब | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ताइवान में जो नया विधेयक पारित हुआ है जो चीन के साथ उसके संबंधों में कड़ुवाहट का एक नया अध्याय शुरु कर सकता है. चूंकि इस जनमत संग्रह के बाद ताइवान अपने आपको स्वतंत्र भी घोषित कर सकता है इसलिए इसने चीन को नाराज़ कर दिया है. यह नया मामला क्या है? मुख्य मुद्दा यह है कि ताइवान को चीन अपना हिस्सा मानता है लेकिन वह चुपचाप औपचारिक रुप से स्वतंत्र होने की दिशा में बढ़ता जा रहा है. चीन ने इसे लेकर कई बार चेतावनी दी है कि अगर ताइवान ने अपने-आपको स्वतंत्र घोषित किया तो वह हमला कर देगा. हालाँकि विश्लेषक इसे लेकर अभी भी एकमत नहीं हैं कि चीन की धमकियों को गंभीर माना जाना चाहिए या नहीं. चीन-ताइवान का विवाद एशिया की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक है क्योंकि विवाद थोड़ा भी बढ़ा तो सैन्य मामलों में ताइवान का सबसे बड़ा साथी अमरीका बीच में कूद पड़ेगा. ताइवान और चीन में ये दूरियाँ कैसे आईं? चीन और ताइवान के बीच इस दूरी की शुरुआत 1949 में हुई जब चीन के गृह युद्ध में कम्युनिस्टों के हाथों राष्ट्रवादियों की हार हो गई. तब हारे हुए राष्ट्रवादी च्यांग काई शेक के नेतृत्व में ताइवान चले गए जिसे चीन अपना ही मानता आया था. इसके बाद से चीन ने यह कोशिश शुरु कर दी गई कि किसी तरह ताइवान पर फिर कब्ज़ा हो जाए चाहे इसके लिए ताक़त का इस्तेमाल ही क्यों न करना पड़े. ताइवान की भी रुचि चीन के साथ मिलने में थी इसलिए जब तक यह पार्टी सत्ता में रही चर्चा यही रही कि ताइवान और चीन का विलय किस तरह होगा. हालाँकि कई सालों तक ताइवान में आज़ादी का आंदोलन भी चलता रहा. 1987 तक, जब तक ताइवान में मार्शल लॉ रहा तब तक तो यह आंदोलन छोटा ही था लेकिन डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (डीपीपी)के गठन के बाद इस आंदोलन में गति आ गई. वर्ष 2000 में डीपीपी के चेन शुई बायन जब राष्ट्रपति बने तो चीन की चेतावनी के बावजूद ताइवान आज़ादी की ओर बढ़ चला. तब से चीनी नेतृत्व ने राष्ट्रपति चेन से तब तक चर्चा करने से इंकार कर दिया जब तक ये स्वीकार नहीं कर लेते कि ताइवान चीन का ही हिस्सा है. चूंकि चेन ने इसे स्वीकार नहीं किया इसलिए चीन और ताइवान के बीच तनाव बना रहा. यह तनाव बढ़ा कैसे? क़ानून के विद्यार्थी रहे राष्ट्रपति चेन से लोगों ने जितनी उम्मीद की थी वे उससे ज़्यादा व्यावहारिक निकले और उन्होंने अपनी पार्टी की स्वतंत्रता की माँग को थोड़ा ठंडा कर दिया. लेकिन 2002 के मध्य से उन्होंने जो सुझाव देने शुरु किए उसने चीन के मन में शंका पैदा कर दी.
ताइवान के विश्लेषक कहते हैं कि यह भी 2004 के राष्ट्रपति चुनाव में फिर से जीतने का एक तरीक़ा है. उन्होंने कहा कि चीन और ताइवान दो देश हैं जो या तो एक साथ हैं या फिर वे अलग-अलग हैं, इस तर्क ने चीन के एक देश के सिद्धांत की हवा निकाल दी. उन्होंने यह भी कहा कि ताइवान के दो करोड़ तीस लाख लोगों को जनमत संग्रह में शामिल होने का अधिकार है. सरकार ने कहा कि जनमत संग्रह से बिजली घर बनाने जैसे मुद्दों पर फ़ैसला हो सकता है लेकिन राष्ट्रपति चेन ने ज़ोर देकर कहा कि जनमत संग्रह इस बात पर होना चाहिए कि यदि चीन हमला करता है तो ताइवान की आज़ादी का क्या होगा? ताइवान के उन लोगों का क्या होगा जो सचमुच आज़ादी चाहते हैं? ऐसा लगता है कि ज़्यादातर ताइवानवासी इस सवाल को टालना पसंद करते हैं. ताइवान दुनिया की बड़ी आर्थिक ताक़तों में से एक बन चुका है और वहाँ मार्शल लॉ के बाद प्रजातंत्र का दौर भी अपेक्षाकृत बहुत शांति के साथ आ गया था. इस परिवर्तन के दौरान भी इस द्वीप की स्वतंत्रता जैसे सवाल भी नहीं उठाए गए थे. शायद वे इस बात को लेकर कोई विवाद खड़ा नहीं करना चाहते. लेकिन इसके बावजूद डीपीपी के भीतर कुछ कट्टरपंथी अभी भी चाहते हैं कि ताइवान को स्वतंत्र घोषित कर दिया जाए. और दूसरे लोग जो ऐसा नहीं चाहते वे भी अपने देश के रुप में ताइवान पर गर्व करते हैं. वे मानते हैं कि चीन जितना दूर रहेगा ताइवान उतना ही स्वतंत्र रहेगा. क्या ताइवान और चीन के संबंध कभी सामान्य हो पाएँगे? दोनों देश के संबंध सामान्य होने के क़रीब पहुँचे इससे पहले दोनों के बीच किसी बड़े समझौते की ज़रुरत होगी. और इसमें मुख्य मुद्दा होगा- ताइवान की आज़ादी. हालाँकि चीन 1949 की स्थिति से बिलकुल भी आगे नहीं बढ़ रहा है वह हर हाल में ताइवान वापस चाहता है. दिलचस्प यह है कि जो लोग चीन और ताइवान के एक हो जाने के पक्ष में हैं वे भी यह नहीं चाहते कि कम्युनिस्ट सरकार के रहते ऐसा हो. और निकट भविष्य में चीन में राजनीतिक और कूटनीतिक परिस्थितियाँ बदलती नहीं दिख रही हैं. |
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