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शनिवार, 22 नवंबर, 2003 को 16:49 GMT तक के समाचार
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अलोकप्रिय होते गए शेवर्दनाद्ज़े
शेवार्दनाद्ज़े
सोवियत विदेश मंत्री के रूप में अंतरराष्ट्रीय पटल पर क़दम रखा था शेवार्दनाद्ज़े ने

एडुअर्ड शेवर्दनाद्ज़े ने जॉर्जिया के राष्ट्रपति का पद सँभालने से पूर्व विभिन्न क्षेत्रों में काम किया है.

राष्ट्रपति बनने से पहले वह सोवियत संघ के विदेश मंत्री थे, उससे पहले कम्युनिस्ट पार्टी में उच्च पदाधिकारी और उससे भी पहले गुप्तचर संस्था केजीबी में अधिकारी.

सोवियत संघ के विघटन के बाद जॉर्जिया को गृह युद्ध और अस्थिरता के ख़तरे से निकालने का श्रेय शेवर्दनाद्ज़े को ही दिया जाता है.

कहने की ज़रूरत नहीं कि उन दिनों वह लोकप्रियता के चरम पर थे, लेकिन हाल के दिनों में वह बड़ी तेज़ी से अलोकप्रिय होते गए.

राजधानी तिब्लिसी की सड़कों पर पिछले कई सप्ताह से प्रदर्शन कर रहे लोग 75 वर्षीय शेवर्दनाद्ज़े के इस्तीफ़े की माँग कर रहे हैं.

शेवर्दनाद्ज़े के विरोधी उन पर संसदीय चुनावों में गोलमाल करने का आरोप लगाते हैं.

हालाँकि उनके ख़िलाफ़ प्रदर्शन कोई पहली बार नहीं हो रहे.

दो साल पहले भी उनके विरोध में लोग सड़कों पर उतर आए थे. उन पर अप्रैल 2000 के राष्ट्रपति चुनावों में धाँधली का आरोप तो था ही, लोग सरकार में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ भी ग़ुस्सा उतार रहे थे.

सोवियत पृष्ठभूमि

शेवर्दनाद्ज़े 1946 में सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए थे.

पार्टी में लगातार प्रगति करते हुए वह 1972 में जॉर्जिया में कम्युनिस्ट पार्टी का प्रमुख बन गए.

शीत युद्ध के ठंडा पड़ते जाने के दिनों में वह 1985 से 1990 के बीच सोवियत संघ का विदेश मंत्री रहे.

इस तरह कहा जा सकता है कि उन्होंने सोवियत विदेश नीति में बड़े परिवर्तनों को कार्यान्वित करने में प्रमुख भूमिका निभाई.

उन्होंने 1992 में सत्ता की कमान सँभालते हुए जॉर्जिया को अराजकता के दौर में जाने से बचाया.

शेवर्दनाद्ज़े पहली बार 1995 में और दूसरी बार 2000 में देश के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए.

उनके कार्यकाल के शुरुआती वर्षों में जॉर्जिया की छवि पश्चिम समर्थक और काफी हद तक लोकतांत्रिक देश के रूप में बनी, जहाँ कि संसद को अच्छे-ख़ासे अधिकार थे.

लेकिन दूसरी ओर उनके कार्यकाल में जॉर्जिया आर्थिक बदहाली के दौर से बाहर नहीं निकल पाया, और भ्रष्टाचार देश की सबसे बड़ी समस्या बनी रही.

शीत युद्ध को ख़त्म करने, केंद्रीय यूरोपीय देशों में लोकतंत्र की स्थापना, जर्मनी के एकीकरण और सोवियत संघ में उदारीकरण की प्रक्रिया से सीधे जुड़े रहे शेवर्दनाद्ज़े पर दो बार जानलेवा हमले भी हो चुके हैं.

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