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अफ़्रीकी देशों के सैनिक अब खेती की ओर
अफ़्रीका के कई देशों में सेना तख़्ता पलटने की कार्रवाइयों में शामिल रही है और यही वजह है कि इस महाद्वीप के कुछ देशों ने सेना को दूसरे कामों में भी लगाए रखने में ही भलाई समझी है. इस कोशिश का मक़सद ये है कि सेना चुनी हुई सरकारों को हटाने की बजाए समाज से और जुड़ सके. गैंबिया में सेना में काम करने वाले पुरुषों और महिलाओं को खेती से जुड़ी कई चीज़ें बताई और सिखाई जाती हैं. सैनिक हर सुबह युंदुम में सेना के बैरकों में परेड के बाद खेती से जुड़े कामों के लिए इकट्ठे होते हैं. ये जगह राजधानी बंजुल से लगभग 25 किलोमीटर दूर है. ये लोग खेतों में भी उतने ही सक्षम साबित हो रहे हैं जितने ये जंग के मैदान में होते हैं या एके-47 बंदूकें उठाकर चौकियों को गार्ड कर रहे होते हैं. सेना ने लगभग 40 हेक्टेयर ज़मीन पर चावल, मक्का, तरबूज़े और टमाटर उगाए हैं और आम तौर पर उसका इस्तेमाल सेना के बैरकों में होता है. खेती-किसानी के अलावा किसानों को ज़मीन का एक बड़ा टुकड़ा भी दिया गया है जहाँ वे ताज़ा सब्जियाँ उगा सकें. भूमि की ओर युंदुम के मुख्य बैरक के कमांडर मेजर केनेथ ने कहा, "हम न सिर्फ़ राष्ट्रपति के 'ख़ुद के लिए अन्न उगाओ अभियान' के आहवान से उत्साहित हैं बल्कि हम सैनिकों के दिमाग़ में ये बात भी डालना चाहते हैं कि शांति के समय वे विकास की सरकार की कोशिशों में मददगार हो सकते हैं."
सेना का लक्ष्य है कि इस तरह से वह खाने की चीज़ों पर ख़र्च होने वाला जो पैसा बचाएगी उसे सैनिकों को दूसरी चीज़ें सिखाने में मदद करने पर ख़र्च करे. अभी सेना को खिलाने-पिलाने पर हज़ारों डलासिस ख़र्च होते हैं. डलासिस गैंबिया की मुद्रा है. मगर सेना को उम्मीद है कि भूमि की ओर लौटने की उसकी नीति से ये स्थिति बदल सकती है. सेना की हर पलटन को कई हेक्टेयर की ज़मीन दी गई है जहाँ वह खेती कर सके. बल्कि वहाँ तो सेना को खेती में प्रतियोगिता करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता है. ज़बरदस्त फसल गैंबिया के राष्ट्रपति ही वहाँ की सेना के प्रमुख भी हैं. उन्होंने इस नीति के प्रति न सिर्फ़ अपना समर्थन ही व्यक्त किया है बल्कि ये भी कहा है कि जो पलटन सबसे अधिक फसल उगाएँगे उन्हें इनाम भी दिया जाएगा. युंदुम के बैरकों के पास जिन आम किसानों की ज़मीनें हैं उनकी ज़मीन की भी मुफ़्त में ही जुताई हो गई है ओर उन्हें इस बार ज़बरदस्त फसल की उम्मीद है. सेना के वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि युद्ध के अलावा सेना को इस तरह के कामों में लगाकर उन्हें राष्ट्र निर्माण से सीधे तौर पर जोड़ा जा सकता है. इसके अलावा इसके ज़रिए लोगों को भी ये यक़ीन दिलाया जा सकेगा कि सेना उनकी दुश्मन नहीं है बल्कि विकास में उनकी साझीदार भी है. |
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