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हाथी वालों की रोज़ी-रोटी पर ख़तरा
भारत की राजधानी दिल्ली में हाथियों के मालिकों और महावतों के सामने रोज़ी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है. समस्या की जड़ में है दिल्ली पुलिस का एक आदेश जिसके तहत किसी भी जुलूस, रैली या शोभा यात्रा में हाथियों को नहीं ले जाया सकेगा. दिल्ली में इस समय कोई 30 हाथी हैं जो पिछले 50 सालों से समारोहों, जुलूसों और रैलियों की शान बनते आ रहे हैं. इन्हें आम तौर पर यमुना किनारे के इलाक़ों में रखा जाता है. इनकी देखरेख करने वाले महावत ज़्यादा पढ़े-लिखे नहीं होते और इनके पास आमदनी का कोई और ज़रिया भी नहीं होता.
एक हाथी पर हर महीने अमूनन 10 हज़ार रुपए का ख़र्च आता है. ऐसे ही एक महावत याक़ूब अली ने बताया, "ये हाथी ही हमारी ज़ायदाद हैं. अगर हाथी नहीं चलेंगे तो उनके साथ-साथ हम भी भूखे मर जाएँगे क्योंकि जुलूसों से ही हमें सबसे ज़्यादा आमदनी होती है." यातायात की समस्या एक अन्य महावत इरफ़ान ने कहा, "सरकार एक तरफ बेरोज़गारी दूर करने की बात करती है और दूसरी तरफ हमारा रोज़गार छीन रही है." दूसरी ओर यातायात पुलिस का कहना है कि हाथियों की वज़ह से यातायात में भारी रुकावट पैदा होती है.
दिल्ली के ट्रैफ़िक पुलिस के उपायुक्त मुकेश कुमार मीणा ने कहा, "बढ़ते हुए यातायात के कारण दिल्ली की सड़कों पर पहले से ही भीड़भाड़ है. इसलिए हाथियों को जुलूसों और रैलियों में ले जाए जाने पर रोक ज़रूरी है." इन हाथियों को दिल्ली से बाहर ले जाना भी आसान नहीं है क्योंकि इसके लिए वन विभाग सहित विभिन्न विभागों से अनुमति लेनी होती है. यानी महावतों के लिए इधर कुआँ और उधर खाई जैसी स्थिति हो गई है. |
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