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सख़्ती का दूसरा नाम हैं अरियल शेरॉन
मध्य पूर्व विश्लेषक जेराल्ड बट उनके दोस्तों और समर्थकों ने ये कभी नहीं सोचा था कि ऐसा भी हो सकता है. उनके दुश्मनों ने उम्मीदें बाँधी और दुआएं मांगी कि ऐसा कभी न हो. लेकिन इसराइल में सबसे ज़्यादा पसंद और नापंसद किए जाने वाले दक्षिणपंथी अरियल शेरॉन ने उन सबको ग़लत साबित कर दिया. उन्होंने ख़ुद को राजनीति से अलग करवाए जाने की सभी कोशिशों को नाकाम कर दिया और देश के सबसे ऊंचे पद पर ख़ुद को मज़बूती से जमा लिया. अरियल शेरॉन को इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं है कि दक्षिण पंथी लिकुड ब्लॉक के ज़्यादातर सदस्य बेन्यामिन नेतन्याहू को अपने नेता के रुप में देखना चाहते थे.
साथ ही उन्होंने इस बात को भी मानने से इंकार कर दिया कि अगर लेबर का नेतृत्व एहूद बराक की जगह शिमॉन पेरेज़ ने किया होता तो उन्हें चुनावी अभियान में ज़्यादा परेशानी आती. अरियल शेरॉन मोटी चमड़ी के आदमी हैं यानी उन्हें इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं करते कि उन्हें कौन पसंद या नापंसद कर रहा है. चाहे वो अरब हो या फिर इसराइली. 72 साल के इस पूर्व सैनिक और पके हुए राजनेता का सिर्फ़ एक ही मक़सद है- अपनी शर्तों पर इसराइल को पूरी सुरक्षा मुहैया कराना. इसका मतलब ये है कि यहूदी देश के लिए ज़्यादातर भूमि और राजनीतिक अधिकार रखना और फ़लस्तीनियों को कम से कम अधिकार देना. सेना में नौकरी अरियल शेरॉन का जन्म फ़लस्तीन में 1928 में हुआ था. उस वक़्त फ़लस्तीन पर ब्रिटेन का अधिकार था.
जवानी में वह यहूदियों के भूमिगत सैनिक संगठन हगानाह में शामिल हो गए. यहूदी देश इसराइल बनने के बाद उन्होंने 1948-49 में अरब-इसराइल युद्ध में हिस्सा लिया. 1950 में उन्होंने ग़ज़ा पट्टी में तैनात मिस्र की सेना के ख़िलाफ़ कई सैनिक अभियानों में हिस्सा लिया. 1955 में एक ऐसे ही अभियान में मिस्र के 38 सैनिक मारे गए थे. अरियल शेरॉन ने सेना में ब्रिगेडियर जनरल तक का रास्ता आसानी से तय किया. 1967 में छह दिन तक चले युद्ध में उन्होंने इसराइली सेना के एक डिवीज़न की अगुवाई की. इस युद्ध में इसराइल ने पूर्वी यरूशलम, पश्चिमी तट और ग़ज़ा पट्टी पर कब्ज़ा किया था. उस वक़्त उन्होंने इसराइली कब्ज़े को बनाए रखने के लिए जो तरीक़े इस्तेमाल किए उसके बाद से ही फ़लस्तीनी लोगों को ये एहसास हो गया था कि वे उनके सबसे बड़े दुश्मन हैं. अरियल शेरॉन 1977 में पहली बार संसद के लिए चुने गए. 1982 में लेबनान पर हुए इसराइली हमले के पीछे उन्हीं का दिमाग था. बतौर रक्षा मंत्री उन्होंने प्रधानमंत्री मेंचेम बेजिन को बताए बिना ही इसराइली सेना को बेरूत भेज दिया. इसी हमले की वजह से यासिर अराफ़ात के फ़लस्तीन मुक्ति संगठन यानी पी एल ओ को लेबनान से निकाल दिया गया था. इस कदम से लेबनान में ठिकाना बनाए हुए पी एल ओ को इसराइल के ख़िलाफ़ अपने हमले रोकने पड़े. इस हमले में बेरूत में इसराइली नियंत्रण वाले दो शरणार्थी शिविरों में सैंकड़ों फ़लस्तीनियों की हत्या कर दी गई थी. इस हमले की जांच करने वाले एक ट्राइब्यूनल ने 1983 में अरियल शेरॉन को रक्षा मंत्री के पद से हटा दिया. इस ट्राइब्यूनल ने पाया कि हत्याओं के लिए अरियल शेरॉन परोक्ष रुप से ज़िम्मेदार थे. राजनीति में वापसी कई राजनेताओं पर इस तरह के आरोप साबित होने का मतलब होता है उनके राजनीतिक जीवन की समाप्ति. लेकिन अरियल शेरॉन दक्षिण पंथी गुट में प्रसिद्ध रहे. उन्हें लगा कि बस उन्हें अपनी धीरज नहीं खोना चाहिए और समय एक बार फिर उनका होगा. 1990 की शुरुआत में उन्होंने आवास मंत्री की हैसियत से पश्चिमी तट और ग़ज़ा पट्टी में बड़े पैमाने पर यहूदी बस्तियाँ बसाने की मुहिम सफलतापूर्वक चलाई. इन इलाकों पर छह दिन के युद्ध में इसराइल ने कब्ज़ा किया था. 1996 में बेन्यामिन नेतन्याहू के दक्षिण पंथी गठबंधन के सत्ता में आने के बाद नए इसराइली प्रधानमंत्री ने दबाव में आकर अरियल शेरॉन को अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया. 1998 में उन्हें विदेश मंत्री नियुक्त करने के बाद बेन्यामिन नेतन्याहू ने कहा कि अरियल शेरॉन इस पद के लिए सबसे अनुकूल व्यक्ति हैं. "हमें अतीत पर नहीं जाना चाहिए" उन्होंने कहा. "सार्वजनिक जीवन में सेवा करने का उनका लंबा अनुभव है और उस पर लोगों को गर्व होना चाहिए." 1999 के आम चुनावों में बेन्यामिन नेतन्याहू की हार के बाद अरियल शेरॉन दक्षिण पंथी लिकुड पार्टी के नेता के रुप में विपक्ष के नेता बने. पिछले साल कैंप डेविड बातचीत विफल हो जाने के बाद अरियल शेरॉन ने एहूद बराक के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ दी. उन्होंने आरोप लगाया कि बराक शांति समझौते के लिए इसराइल के हितों को दांव पर लगा रहे हैं. उन्होंने संसद के एक सत्र में कहा ''बराक को कोई अधिकार नहीं है कि वो इतिहास की विरासत यरूशलम को दाँव पर लगाएं'' सुरक्षा सर्वोपरि पिछले साल उन्होंने पूर्वी यरूशलम में अल-अक्स मस्जिद का विवादास्पद दौरा भी किया. इस मस्जिद को यहूदी भी पवित्र मानते हैं. उनकी यात्रा से फ़लस्तीनियों में ग़ुस्सा भड़का. आलोचकों का कहना है कि अरियल शेरॉन को ये पता था कि उनकी यात्रा से हिंसा भड़केगी. शायद उनका मक़सद भी यही था क्योंकि वो अपनी छवि संकटों को मजबूती से संभालने वाले नेता के रूप में बनाना चाहते थे. लेकिन एक बार फिर उन्हें इस बात की परवाह नहीं है कि उनके आलोचक या फिर कोई और क्या कहता है. हाल ही के चुनावी अभियान में उन्होंने कहा कि वे अरबों के साथ शांति स्थापित करने के लिए तैयार हैं लेकिन किसी धमकी के आगे नहीं झुकेंगे. सबसे बड़ी बात ये है कि वे 'अपनी ही ज़मीन पर रह रहे यहूदियों के अधिकारों की उपेक्षा नहीं करेंगे.' अरियल शेरॉन के लक्ष्य को उनके शत्रु ख़तरनाक बताते हैं. उनका लक्ष्य है इसराइल की सुरक्षा के लिए लड़ना और फिर उसके लिए चाहे कोई भी तरीका क्यों न उठाना पड़े. |
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