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मंगलवार, 07 अक्तूबर, 2003 को 19:18 GMT तक के समाचार
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बदहाल कश्मीरी अर्थव्यवस्था
कश्मीर घाटी
कश्मीर की वादियाँ देश-विदेश के पर्यटकों से भरी रहती थीं

भारत की कश्मीर घाटी न सिर्फ़ अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर है बल्कि यह मज़बूत अर्थव्यवस्था की एक प्रमुख निशानी भी है.

कश्मीर घाटी फलों और हस्तकला के लिए तो मशहूर है ही साथ ही यहाँ पन बिजली की भी संभावनाएँ हैं.

लेकिन तेरह वर्षों से चली आ रही चरमपंथी गतिविधियों की वजह से कश्मीर के अधिकतर उद्योग-धंधे तबाह हो चुके हैं और भविष्य अच्छा नहीं दिखाई देता.

ऐसे में जबकि भारत के दूसरे राज्य वैश्वीकरण की राह पर चल रहे हैं कश्मीर अब भी संघर्ष कर रहा है.

श्रीनगर के पास एचएमटी का घड़ी बनाने का कारख़ाना जैसे-तैसे चल रहा है.

यह किसी समय कश्मीर घाटी में काम करने वाले कई भारी उद्योगों में से बचने वाले उद्योगों में से एक है.

लेकिन वहाँ लगे उपकरण पुराने हो चुके हैं और करोड़ों रुपए की सरकारी मदद के बावजूद कारख़ाने की हालत पतली है.

इस कारख़ाने में काम करने वाली एक महिला ने मुझे बताया कि उसे वेतन के लिए महीनों इंतज़ार करना होता है. कई बार तो उसे वेतन के लिए गिड़गिड़ाना पड़ता है.

उसका कहना है कि "सरकारी मदद अगले साल समाप्त हो जाएगी. उसके बाद मुझे नहीं पता कि क्या होगा."

"सरकार हमारा साथ इसलिए छोड़ रही है क्योंकि घाटी से सभी हिंदू चले गए हैं और अब यहाँ सिर्फ़ मुसलमान कर्मचारी ही बचे हैं."

धीमी वृद्धि दर

सारी कश्मीर घाटी में अर्थव्यवस्था की हालत ख़राब है और लोग परेशान हैं.

अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार पर्यटन बिलकुल ख़त्म हो चुका है.

मुठभेड़ से होटल में लगी आग
कभी-कभी चरमपंथियों और सुरक्षाकर्मियों की भिड़ंत व्यावसायिक प्रतिष्ठानों तक पहुँच जाती है

यहाँ की होटलों में अब सिर्फ़ पत्रकार ठहरते हैं जो यहाँ की हिंसक घटनाओं का ब्यौरा लेने आते हैं.

कश्मीर की कई खूबियाँ हैं जैसे- इसका लुभावना मौसम, इसकी ख़ूबसूरती और इसके प्रतिभाशाली नौजवान. इसके बावजूद कश्मीर आर्थिक तरक्की की सीढ़ियाँ नहीं चढ़ सका है.

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि अर्थव्यवस्था की तस्वीर जितनी ख़राब दिखती है उतनी ख़राब है नहीं.

हालाँकि कश्मीर घाटी के नागरिक प्रशासन के लिए ज़िम्मेदार परवेज़ दीवान मानते हैं कि अब भी समस्याएँ हैं.

उनका कहना है कि "पिछले बारह वर्षों में प्रति व्यक्ति आमदनी में कमी नहीं आई है. प्रति व्यक्ति आमदनी में 1990 से हर वर्ष चार फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हो रही है."

"चार प्रतिशत की वृद्धि दर उतनी बुरी भी नहीं है."

लेकिन अगर यह सोचा जाए कि इन वर्षों में भारत के अन्य राज्यों में अर्थव्यवस्था में भारी उछाल आया है और औसत वृद्धि दर साढ़े छह फ़ीसदी है, चार फ़ीसदी कोई अधिक वृद्धि दर नहीं है."

बुनियादी ढाँचे की कमी

कश्मीर की भौगोलिक संरचना भी एक बड़ी समस्या है.

कश्मीर भारत के साथ सिर्फ़ एक सड़क से जुड़ी है. इसलिए सामान की आवाजाही एक बड़ी समस्या है.

राज्य में बुनियादी सुविधाएँ मुहैया कराने में यह एक बड़ी परेशानी है.

लेकिन जम्मू-कश्मीर राज्य सहकारी बैंक में विश्लेषक अनीस मक़बूल का कहना है कि निवेशकों के घाटी में न आने के और भी कारण हैं.

"राजनीतिक अस्थिरता की वजह से कोई भी कश्मीर घाटी में निवेश नहीं करना चाहता.''

'समृद्ध' श्रीनगर

श्रीनगर आने पर यह जान कर हैरानी होती है कि यहाँ चरमपंथ के अलावा बिगड़ी अर्थव्यवस्था की शिकायत की जाती है.

इसके बावजूद लगता है कि श्रीनगर अपने-आप में काफ़ी समृद्ध शहर है.

जब आप हवाई अड्डे से बाहर निकलते हैं तो वहाँ आप कई बड़े मकानों का निर्माण होता देखते हैं.

बाज़ार उपभोक्ता वस्तुओं से पटे पड़े हैं. लगता है कि वहाँ काफ़ी संपत्ति है.

लेकिन अनीस मक़बूल का कहना है कि श्रीनगर की स्थिति को देखकर कश्मीर घाटी की स्थिति का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता है.

"यह संपत्ति सिर्फ़ कुछ लोगों के पास ही है. गाँवों में स्थिति बहुत ख़राब है और उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं जाता."

"इसीलिए अमीर लोग श्रीनगर आकर रहना बर्दाश्त कर सकते हैं."

'मदद नहीं स्थिरता की दरकार'

भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी हाल में जब कश्मीर आए तो उन्होंने घाटी में कई परियोजनाओं के लिए छह हज़ार एक सौ पैंसठ करोड़ रुपए का एक आर्थिक पैकेज घोषित किया था.

 राजनीतिक अस्थिरता की वजह से कोई भी कश्मीर घाटी में निवेश नहीं करना चाहता

अनीस मक़बूल

मैंने मक़बूल से पूछा कि क्या इस तरह की सरकारी मदद से ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले लोगों को मदद होगी?

क्या यह रकम वास्तव में बुनियादी ढाँचा बनाने में काम में आएगी? यह रकम किस तरह ख़र्च होगी?

उन्होंने बताया कि "प्रधानमंत्री वाजपेयी द्वारा घोषित किया गया पैकेज बहुत अजीब है."

उन्होंने कहा कि ज़्यादातर रकम मौजूदा रक्षा परियोजनाओं में जाएगी.

कुछ रकम सुरक्षा अधिकारियों, पुलिस, शरणार्थियों और ग्रामीण रक्षा समिति को भी मिलेगी. साथ ही मृतक अधिकारियों के परिवारवालों को भी मुआवज़ा दिया जाएगा.

"इस तरह ज़्यादातर रकम इधर-उधर हो जाएगी. लेकिन असली प्रश्न यह है कि क्या यह रकम ज़रूरतमंद लोगों तक पहुँचेगी? उस मोर्चे पर कुछ भी नहीं हो रहा है."

कश्मीर की दूसरी समस्याओं की तरह अर्थव्यवस्था की समस्या को भी राजनीतिक हल की दरकार है.

कश्मीरियों को सरकारी मदद नहीं बल्कि स्थिरता चाहिए.

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