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मंगलवार, 07 अक्तूबर, 2003 को 15:18 GMT तक के समाचार
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फ़लस्तीनियों की उम्मीद - यासिर अराफ़ात
यासिर अराफ़ात
अराफ़ात ने इसराइल के ख़िलाफ़ कई बार सैनिक अभियान का नेतृत्व किया

यासिर अराफ़ात कई दशकों से फ़लस्तीनी लोगों के निर्विवाद नेता हैं.

साथ ही वो उन लोगों के लिए अपने अलग देश की मांग का एक प्रतीक भी बन चुके हैं.

यासिर अराफ़ात ने अपने कंधों पर इस लड़ाई का बोझा भी ढोया है. लेकिन अपने अधिकारों और ज़िम्मेदारियों को किसी और के साथ न बांटने का असर उनकी सेहत पर पड़ा है.

साथ ही उनका जन समर्थन भी कम हुआ है.

इसमें कोई शक़ नहीं कि यासिर अराफ़ात फ़लस्तीनी लोगों की सबसे अमूल्य धरोहर हैं. लेकिन जब-जब शांति प्रक्रिया विफल होती है तानाशाही नेतृत्व की उनकी शैली से फ़लस्तीनी लोगों का भरोसा उठने लगता है.

क़िस्सागो

अपने जीवन की शुरुआत से ही यासिर अराफ़ात को अपने जीवन के बारे में क़िस्से गढ़ने का शौक है. जैसे वो ये कहते हैं कि उनका जन्म यरुशलम में हुआ था लेकिन वास्तव में उनका जन्म 1929 में मिस्र में हुआ था.

यासिर अराफ़ात
अराफ़ात की तस्वीर के साथ समर्थक

1959 की शुरुआत से ही कुवैत में रह रहे फ़लस्तीनियों ने फ़तह संगठन की स्थापना का काम शुरु कर दिया था. ये फ़लस्तीन मुक्ति संगठन यानी पीएलओ के भीतर बनने वाला सबसे बड़ा संगठन था. उस वक्त सामूहिक नेतृत्व की बात करने की सिर्फ़ औपचारिकता निभा रहे थे.

दो साल बाद उनके साथ के लोगों ने देखा कि किस तरह से ''उन्होंने फ़तह के ऊपर पूरी तरह से नियंत्रण स्थापित कर लिया. उन्होंने लोगों को अपने साथ जुड़ने के लिए घूस भी दी.''

लेकिन उन्हें इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने दुनिया भर में फ़लस्तीनियों के संघर्ष और उनकी लड़ाई के मक़सद के बारे में जानकारी पहुंचाई. अरब सरकारें फ़लस्तीनियों की मदद के लिए तैयार नहीं थीं.

सैनिक अभियान

यासिर अराफ़ात के नेतृत्व में पीएलओ ने हथियार उठाए. पीएलओ ने हवाईजहाज़ों का अपहरण किया और कई हिंसक वारदातें कीं.

सैनिक अभियान के नेता के रुप में उन्होंने कई बार इस्राइलियों के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ी. 1968 में करामाह में या सितंबर 1970 में जॉर्डन में या फिर 1982 में बेरुत में, यासिर अराफ़ात ने हमेशा हर मोर्चे पर हिम्मत दिखाई.

हमेशा से ही उनका सिर्फ़ एक लक्ष्य रहा है. फ़लस्तीनियों की आज़ादी और वो ख़ुद उनके राष्ट्रपति.

इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए उन्होंने कई बार धमकियों से काम लिया. उन्होंने अपने हाथ से कभी सत्ता नहीं निकलने दी.

फ़ैसलों में ग़लती

यासिर अराफ़ात ने एक ऐसी भयंकर भूल की जिसकी कीमत वो अब तक चुका रहे हैं. उन्होंने 1990 में कुवैत पर हमले में सद्दाम हुसैन का साथ दिया. इसकी वजह से उन्हें खाड़ी देशों से मिलने वाला महत्वपूर्ण समर्थन बंद हो गया था. जब खाड़ी युद्ध में इराक़ की हार हुई तो पीएलओ के तब तक न तो कोई दोस्त बचे थे और न ही उन्हें धन-दौलत की मदद करने वाले धनवान देश.

ऐसे में अराफ़ात के पास कमज़ोर हालत में इस्राइलियों से शांति स्थापित करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था. लेकिन बहुत जल्दी ही उन्होंने अपने सारे दांव चल दिए. यहूदी बस्तियों और यरुशलम के भविष्य जैसे बुनियादी मुद्दे बिना सुलझे ही रह गए.

फ़लस्तीनियों की हालत कितनी पतली हो गई थी इसका अंदाज़ा इस बात से लग सकता है कि एक इस्राइली छात्र ने यिज़ाक राबिन की हत्या कर दी. ऐसा फ़लस्तीनियों से शांति स्थापित करने के लिए उन्हें पश्चिमी तट की ज़मीन सौंपने के उनके फ़ैसले के ख़िलाफ़ किया गया था.

उसके अगले साल हुए चुनावों में दक्षिण पंथी लिकुड ब्लॉक सत्ता में आया. उसका मक़सद फ़लस्तीनियों की उम्मीदों को कम करना था. ऐसे में यासिर अराफ़ात के पास जो कुछ भी उन्हें दिया जा रहा था उसे लेने के अलावा कोई और चारा नहीं था.

ये संभव है कि अपने जीवन भर के लक्ष्य को पूरा करने से पहले ही यासिर अराफ़ात का निधन हो जाए. अगर ऐसा होता है तो उनकी मृत्यु टूटे हुए व्यक्ति की तरह होगी और इसके लिए उनका बिखरा व्यक्तित्व ही ज़िम्मेदार होगा.

यासिर अराफ़ात बहुत प्रतिभाशाली नेता हैं. लेकिन वो संगठित नहीं हैं और लेनदेन में कमज़ोर पड़ जाते हैं. जब शांति प्रक्रिया शुरु हुई तो उन्होंने किसी और को बातचीत में भेजने से इंकार कर दिया. उन्हें डर था कि अगर वो व्यक्ति बातचीत में कामयाब रहा तो इससे उनके नेतृत्व को ख़तरा पैदा हो सकता है.

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