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जब मिल बैठेंगे ट्रंप-किम तो कितनी होगी सुलह?
- Author, हेलेना मेरीमेन
- पदनाम, द इन्क्वायरी
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप 12 जून को उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग-उन से मिलने वाले हैं, हालांकि इस मुलाकात के होने को लेकर संशय भी बना हुआ है.
लेकिन गुरुवार को उत्तर कोरिया ने अपने प्रमुख परमाणु परीक्षण स्थल की सुरंगों को 'नष्ट कर' अमरीका और दुनिया को ये संकेत देने की कोशिश की है कि वो शांति चाहता है और अमरीकी राष्ट्रपति के साथ होनेवाली मुलाकात को लेकर गंभीर है.
ये किसी अमरीकी राष्ट्रपति और उत्तर कोरियाई नेता के बीच पहली बैठक होगी. दो ऐसे शख़्स जो कुछ महीनों पहले ही एक-दूसरे को गालियां दे रहे थे, अब गलबहियां डालने की तैयारी में हैं.
मुलाक़ात का दिन और जगह तय होने से पहले दोनों ही नेताओं के बयानों में ऐसी चाशनी घुल गई थी कि लोग हैरान थे कि अभी कुछ महीने पहले यही नेता एक-दूसरे को अनाप-शनाप बक रहे थे.
दोनों के बीच 12 जून को मुलाक़ात तय हुई. उससे पहले उत्तर कोरिया ने तीन अमरीकी क़ैदियों को रिहा कर दिया. किम ने उत्तर कोरिया के एटमी हथियार और एटमी टेस्ट करने वाले ठिकाने को नष्ट करने का भी एलान कर दिया.
लीबिया से उत्तर कोरिया की तुलना
मामाला बन ही रहा था कि इस कामयाबी से इतरा रहे अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने उत्तर कोरिया की तुलना लीबिया से कर दी. किम और उनका देश इस पर एक बार फिर भड़क उठे.
धमकी दी कि अमरीका का रवैया ऐसा ही रहा तो 12 जून को दोनों नेताओं की होने वाली मुलाक़ात रद्द भी हो सकती है.
कुल मिलाकर डोनल्ड ट्रंप और किम जोंग उन की हालत 'पल में तोला, पल में माशा' वाली है.
ऐसे में दुनिया ये सवाल कर रही है कि क्या 12 जून को ट्रंप और किम की मुलाक़ात होगी भी या नहीं? सवाल ये भी कि मुलाक़ात हुई तो, दोनों नेताओं में समझौता होगा या नहीं?
बीबीसी की रेडियो सिरीज़ 'द इन्क्वायरी' में हेलेना मेरीमेन ने इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की.
आधी सदी से ज़्यादा वक़्त बीत गया, जब से उत्तर कोरिया और अमरीका एक-दूसरे के दुश्मन बने हुए हैं.
ये दुश्मनी अचानक पिछले महीने दोस्ती में तब्दील होनी शुरू हुई. अप्रैल महीने में उस वक़्त अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए के डायरेक्टर रहे माइक पोम्पियो एक ख़ुफ़िया मिशन पर उत्तर कोरिया गए.
इसके एक महीने बाद वो फिर से उत्तर कोरिया गए. इस बार वो अपने साथ बरसों से उत्तर कोरिया में क़ैद तीन अमरीकियों को लेकर लौटे.
तभी उत्तर कोरिया और अमरीका के बीच बढ़ती दोस्ती की ख़बर बाक़ी दुनिया को हुई.
पर, क्या ये दोस्ती पक्की है?
ख़ुफ़िया मुलाक़ातों से क्या किसी बड़े समझौते की बुनियाद रखी जा सकती है. ट्रंप और किम के बर्ताव के इतिहास को देखें, तो यक़ीन करना मुश्किल है.
हेलेना मेरीमेन ने इस बारे में जब 1993 में इसराइल-फ़लस्तीन के बीच हुए ओस्लो समझौते के प्रमुख किरदार टायर रॉड लार्सन से बात की तो उन्होंने दिलचस्प बातें साझा कीं.
टायर रॉड लार्सन बताते हैं कि नब्बे के दशक में अमरीका के दबाव में इसराइल और फ़लस्तीन के बीच बातचीत हो रही थी. मीडिया की नज़र लगातार इस पर बनी हुई थी. वॉशिंगटन में हो रही इस वार्ता का हमेशा सुर्ख़ियों में रहना ही इसकी नाकामी की वजह बना.
इसके बाद नॉर्वे ने तय किया कि वो इसराइल और फ़लस्तीन के बीच समझौते का मध्यस्थ बनेगा.
इसराइल और फ़लस्तीन के बीच नॉर्वे मध्यस्थ
बेहद ख़ुफ़िया तरीक़े से नॉर्वे की राजधानी ओस्लो से दूर एक ठिकाने पर बातचीत शुरू हुई. इसमें प्रमुख भूमिका थी टायर रॉड लार्सन और उनकी पत्नी मोना जूल की. मोना उस वक़्त नॉर्वे के विदेश मंत्रालय में काम कर रही थीं.
पति-पत्नी की ये जोड़ी दो दुश्मनों को दोस्त बनाने के मिशन पर दिन-रात काम करने लगी. उनकी अपनी निजी ज़िंदगी तो कमोबेश ख़त्म ही हो गई, उन्हें असंभव को मुमकिन बनाने की ज़िम्मेदारी जो मिली थी.
टायर रॉड लार्सन उन दिनों को याद करके कहते हैं कि अगर उनकी जोड़ीदार उनकी पत्नी न होतीं, तो 1993 का ओस्लो समझौता नहीं हो पाता.
टायर रॉड लार्सन कहते हैं कि इस समझौते के होने में सबसे बड़ी बात ये रही कि ये बेहद ख़ुफ़िया तरीक़े से किया गया. वॉशिंगटन में असल समझौने के एलान से पहले महीनों तक ओस्लो में इसराइल और फ़लस्तीन के वार्ताकार गुपचुप तरीक़े से मिलते और बतियाते रहे थे.
हालांकि टायर रॉड लार्सन कहते हैं कि ये इतना आसान नहीं था. उन्हें और उनकी पत्नी मोना दोनों को पता था कि इसराइल-फ़लस्तीन में तब तक शांति नहीं हो सकती, जब तक फ़लस्तीनी संगठन पीएलओ को बातचीत में शामिल ना किया जाए. इसराइल पीएलओ को आतंकी संगठन कहता था.
लेकिन, आख़िर में इसराइल और फ़लस्तीन ने बातचीत के लिए अपने दो-दो आदमी ओस्लो भेजे. उन्हें शहर से दूर एक सुनसान जगह पर ठहराया गया था.
खाना-पीना होने के बाद टायर रॉड लार्सन और उनकी पत्नी ने इसराइल और फ़लस्तीन के वार्ताकारों को अकेले छोड़ दिया और कहा कि हम तभी कमरे में आएंगे जब आपलोग मार-पीट बंद कर देंगे, वरना आप ख़ुद बात करें, हमारा इसमें कोई रोल नहीं.
पहली मुलाक़ात अजीबो-ग़रीब थी. इसलिए खान-पान के ज़रिए दोस्ताना क़ायम करने की कोशिश की गई. फिर दोनों पक्षों को अपने परिवार को लाने के लिए कहा गया.
अनौपचारिक बातचीत से बनी बात
मज़े की बात ये रही कि इसराइल और फ़लस्तीन के उन वार्ताकारों की एक-एक बेटियों के नाम भी एक थे- माया. टायर रॉड लार्सन कहते हैं कि अनौपचारिक माहौल में हुई बातचीत के दोस्ताना होने की वजह से ही ये समझौता हो सका था.
आख़िरकार 1993 में इसराइल और फ़लस्तीन के नेताओं ने वॉशिंगटन में ओस्लो समझौते पर दस्तख़त किए और हाथ मिलाए. ये एक ऐतिहासिक मौक़ा था.
टायर रॉड लार्सन कहते हैं कि दो पुराने दुश्मनों को दोस्त बनाने के लिए निजी ताल्लुक़ात क़ायम करना ज़रूरी होता है. तो, क्या ट्रंप और किम की टीमों के बीच ऐसा रिश्ता क़ायम हुआ है?
इसके लिए हेलेना मेरीमेन ने एक और पूर्व राजनयिक जोनाथन पॉवेल से बात की. ब्रिटिश राजनयिक पॉवेल ने ब्रिटेन, आयरलैंड और उत्तरी आयरलैंड के बीच नब्बे के दशक में हुए गुड फ्राइडे समझौते में अहम रोल निभाया था.
जोनाथन पॉवेल की चुनौती ये थी कि वो उत्तरी आयरलैंड में तीस साल से एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक अनुयायिकों को समझौते के लिए राज़ी करें. एक तरफ़ जेरी एडम्स थे, जो उत्तरी आयरलैंड के ब्रिटेन से अलग होने के समर्थक थे. वहीं दूसरी तरफ़ थे इयान प्रेस्ले, जो ब्रिटेन के साथ बने रहने के हामी थे.
ब्रिटेन के पीएम टोनी ब्लेयर और आयरलैंड के प्रधानमंत्री बर्टी एहर्न का भी इसमें अहम रोल था.
जोनाथन पॉवेल बताते हैं कि पहले तो जेरी एडम्स और इयान प्रेस्ले साथ बैठने तक को राज़ी नहीं थे. मगर तीन दिनों की ख़ुफ़िया बातचीत के बाद आख़िरकार सभी नेता बातचीत की टेबल पर आने को राज़ी हुए. जेरी एडम्स और इयान प्रेस्ले को आमने-सामने डायमंड के आकार वाली टेबल पर बिठाया गया.
बातचीत शुरू हुई, तो फिर सही दिशा में चल निकली और आख़िर में गुड फ्राइडे समझौते से उत्तरी आयरलैंड में शांति बहाल हुई.
तो, क्या ट्रंप और किम भी ऐसा कर पाएंगे?
सवाल का जवाब मुश्किल है. वजह ये कि अमरीका और उत्तर कोरिया न सिर्फ़ दूरी के लिहाज से एकदम अलग हैं, बल्कि दोनों की सभ्यताओं और संस्कारों में भी बहुत फ़ासला है.
फिर चुनौती भाषा की भी आती है. दोनों ही नेता अपनी-अपनी भाषा में बात करेंगे, फिर उसका अनुवाद होगा. और अंग्रेज़ी में तो कहावत है 'लॉस्ट इन ट्रांसलेशन' यानी अनुवाद में असल मतलब का गुम हो जाना.
जब 12 जून को ट्रंप और किम मिलेंगे, तो उन्हें इस चुनौती को भी पार करना होगा.
ये चुनौती कितनी बड़ी है, इस बारे में बताने के लिए अल्जीरिया के राजनयिक लख़दर ब्राहिमी से बेहतर कौन होगा. करियर डिप्लोमैट ब्राहिमी ने लेबनान, सीरिया, कांगो गणराज्य, हेती और सूडान से लेकर नाइज़ीरिया और इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान तक न जाने कितने हिंसक संघर्षों को ख़त्म करने में अहम रोल निभाया है.
वो कहते हैं कि दो अलग-अलग सभ्यताओं और बोलियां बोलने वालों के बीच समझौता कराना बहुत बड़ी चुनौती है. बोली-भाषा की वजह से आप कभी भी शर्मनाक स्थिति में फंस सकते हैं और आपके लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है.
ब्राहिमी 1998 में अफ़ग़ानिस्तान की मिसाल देते हैं. तब तालिबान ने 9 ईरानी बंधकों को मार डाला था. इसके जवाब में ईरान ने हज़ारों सैनिक भेज दिये थे. लग रहा था कि भयंकर जंग होगी.
लखदर ब्राहिमी तब कंधार गए और तालिबान नेता मुल्ला उमर से मुलाक़ात की. 4 घंटे की इस मुलाक़ात के दौरान ब्राहिमी ने मुल्ला उमर को इस बात के लिए राज़ी करने की कोशिश की कि वो मारे गए ईरानी बंधकों की लाशें ईरान ले जाने की इजाज़त दें.
आख़िरकार मुल्ला उमर मान गए. ईरान ने अपनी सेनाएं हटा लीं. ब्राहिमी अगले दो साल तक इसे अपनी कामयाबी मानकर ख़ुश होते रहे.
दो साल बाद उनकी मुलाक़ात उस युवक से हुई, जिसने मुल्ला उमर से ब्राहिमी की बातचीत का तर्जुमा किया था. उस युवक ने ब्राहिमी से माफ़ी मांगते हुए कहा कि उसने उनके साथ छल किया था.
ब्राहिमी चौंक गए, उन्होंने पूछा क्या?
उस युवक ने कहा कि आपकी बहुत-सी बातों का मैंने ग़लत अनुवाद किया और मुल्ला उमर को बताया.
उस युवक ने कहा कि आपकी बहुत-सी बातें मुल्ला उमर को बुरी लग सकती थीं. फिर बातचीत कामयाब नहीं होती तो वो ईरान, अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर सकता था. और वो युवक अपने देश को युद्ध के रास्ते पर नहीं धकेलना चाहता था. इसलिए उसने ब्राहिमी की बातों को तोड़-मरोड़कर पेश किया.
और, मुल्ला उमर को इस बात के लिए राज़ी कर लिया कि वो मारे गए ईरानी बंधकों की लाशें ब्राहिमी को ले जाने दे.
ब्राहिमी की इस मिसाल से साफ़ है कि दो अलग भाषाएं बोलने वाले नेताओं की मुलाक़ात में अनुवादकों का कितना अहम रोल होता है. साथ ही आपको जिस नेता से बात करनी है, उसकी सभ्यता और तहज़ीब की आपको अच्छी समझ होनी चाहिए ताकि आप किसी भी तरीक़े से उसे नाराज़ न करें. ठेस न पहुंचाएं. तभी आपकी बातचीत कामयाब होगी.
ब्राहिमी कहते हैं कि किसी भी समझौते की कामयाबी के लिए उसका सही वक़्त पर होना ज़रूरी है, जब सभी पक्ष इसके लिए राज़ी और तैयार हों.
लखदर ब्राहिमी 1989 के लेबनान की मिसाल देते हैं. वो कहते हैं कि उस दौर में लेबनान में हर कोई शांति बहाली की कोशिश कर रहा था. समझौतों पर दस्तख़त भी हुए. मगर कोई कारगर नहीं हुआ. ब्राहिमी कहते हैं कि वो कामयाब इसीलिए हुए क्योंकि सभी पक्ष शांति के लिए तैयार थे.
वहीं, सीरिया में अपने तमाम तजुर्बे के बावजूद ब्राहिमी नाकाम रहे थे. वो सीरिया इस उम्मीद में भेजे गए थे कि वो सऊदी अरब, इराक, ईरान और क़तर जैसे देशों के विश्वासपात्र थे. सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद भी उन पर भरोसा करते थे. मगर ब्राहिमी सीरिया में शांति बहाल करने में नाकाम रहे.
लखदर ब्राहिमी कहते हैं कि जब डोनल्ड ट्रंप और किम जोंग-उन कुछ घंटों के लिए सिंगापुर में मिलेंगे, तो हर समस्या ख़ुद ब ख़ुद हल नहीं होगी. मगर वो शांति की बुनियाद ज़रूर रख सकते हैं.
उत्तर कोरियाई बहुत मोल-भाव करते हैं. वो आसानी से किसी बात पर राज़ी नहीं होते.
इस बात की ताक़ीद करती हैं जीन ली. वो एक अमेरिकी पत्रकार हैं जिन्होंने उत्तर कोरिया की राजधानी प्योंगयांग में कई बरस बिताए हैं. जीन ली कहती हैं कि उत्तर कोरिया के लोगों को एटमी हथियार नष्ट करने के लिए राज़ी करना आसान नहीं होगा.
तो, क्या उत्तर कोरिया शांति के लिए तैयार है?
जीन ली कहती हैं कि किम जोंग उन ने एटमी हथियारों के कामयाब परीक्षण से अपने देश के लोगों को ये बता दिया है कि वो उनकी हिफ़ाज़त कर सकते हैं. वो उनके असल रहनुमा हैं.
अब वो बातचीत और समझौते के लिए तैयार दिखते हैं. अब वो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि को और चमकाना चाहते हैं. वो कहते हैं कि किम को पता है कि 65 साल पहले दोनों कोरिया के बीच युद्ध विराम हुआ था. कोई समझौता नहीं. वो चाहते हैं कि अमरीका से उनका समझौता हो जाए ताकि 65 साल पहले हुए युद्धविराम पर समझौते की मुहर लग सके.
डोनल्ड ट्रंप भी ये चाहते हैं कि वो ऐसे राष्ट्रपति के तौर पर याद किए जाएं जिसने उत्तर कोरिया से शांति समझौता किया. फिर नवंबर में अमरीका में मध्यावधि चुनाव भी होने वाले हैं. उत्तर कोरिया से शांति समझौता हुआ, तो ट्रंप चुनाव प्रचार में इसे अपने हक़ में भुना सकेंगे.
यानी जीन ली की नज़र में अमरीका और उत्तर कोरिया यानी ट्रंप और किम दोनों ही समझौते के लिए तैयार हैं.
जीन ली कहती हैं कि अमरीका को कामयाब होने के लिए उत्तर कोरिया की तहज़ीब को समझना होगा. वो किसी भी सूरत में ऐसी मुश्किल में नहीं पड़ना चाहेंगे जहां हालात शर्मनाक हो जाएं.
जीन ली कहती हैं कि ट्रंप और किम मिलकर आने वाले वक़्त में शांति बहाल करने की बुनियाद रख सकते हैं.
हालांकि दोनों पक्षों को लखदर ब्राहिमी की सलाह को याद रखना होगा. अगर किसी ने सोचा कि वो जीत रहा है, तो उसी वक़्त समझौते की नाकामी की बुनियाद रख दी जाएगी. कोई भी समझौता दोनों पक्षों की जीत होना चाहिए.
माइक पोम्पियो का उत्तर कोरिया की तुलना लीबिया से करना ये जताता है कि अमरीका इसमें अपनी जीत देख रहा है कि उत्तर कोरिया अपने एटमी हथियार नष्ट करने को राज़ी हो गया है- ये मुग़ालता अमरीका को भारी पड़ सकता है.
जीन ली कहती हैं कि उत्तर कोरिया से पहले भी समझौते हुए हैं, जो टूट गए हैं. ये बात डोनल्ड ट्रंप की टीम को याद रखनी चाहिए.
ट्रंप और किम के बीच समझौता नहीं, असल चुनौती इस पर अमल करने की होगी.
हालांकि उत्तर कोरिया ने गुरुवार को अपने प्रमुख परमाणु परीक्षण स्थल की सुरंगों को 'नष्ट कर' एक सकारात्मक संकेत दे दिया है कि वो शांति चाहता है.
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