अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में तालिबान नेता जल्द ही अफ़ग़ान सरकार के गठन की घोषणा कर सकते हैं. नई सरकार के मुखिया तालिबान
के सह-संस्थापक मुल्ला बरादर हो सकते हैं.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़, तालिबान से जुड़े
सूत्रों ने ये जानकारी दी है.
वहीं, काबुल के उत्तर में स्थित पंजशीर घाटी में
तालिबान के लड़ाकों और अफ़ग़ानिस्तान की पूर्व सरकार के समर्थकों के बीच एक हिंसक संघर्ष जारी है.
कहा जा रहा है कि इस समय अफ़ग़ानिस्तान की नई सरकार की तात्कालिक
प्राथमिकता ये होनी चाहिए थी कि वह सूखे और 2.4 लाख अफ़ग़ान नागरिकों की जान लेने वाले संघर्ष की मार झेल
रही अफ़ग़ान अर्थव्यवस्था की तबाही को रोक सके.
बरादर को मिल सकती है टॉप पोस्ट
रॉयटर्कस को कम से कम तीन सूत्रों ने बताया है कि इस सरकार में
मुल्ला बरादर (तालिबान के राजनीतिक कार्यालय के प्रमुख नेता), मुल्ला मोहम्मद याक़ूब (तालिबान
के सह-संस्थापक मुल्ला उमर के बेटे) और शेर मोहम्मद अब्बास स्तनिकज़ई उच्च पद संभाल
सकते हैं.
तालिबान के एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर
बताया है, “सभी शीर्ष नेता काबुल में पहुँच चुके हैं और नई सरकार के गठन की घोषणा से जुड़ी
तैयारियां अपने अंतिम चरण में हैं.”
एक अन्य तालिबानी सूत्र ने बताया है कि तालिबान के
सुप्रीम धार्मिक नेता हेबतुल्लाह अखुंदज़ादा धार्मिक
मामलों और शरिया क़ानून के मुताबिक़ प्रशासन चलाए जाने पर ध्यान देंगे.
बीते 15 अगस्त को काबुल समेत पूरे अफ़ग़ानिस्तान पर
कब्ज़ा करने के बाद तालिबान को काबुल के उत्तर में स्थित पंजशीर घाटी में विद्रोह
का सामना करना पड़ रहा है.
तालिबान लड़ाकों और सरकार समर्थित लड़ाकों
के बीच जारी हिंसक संघर्ष में कुछ लोगों के मारे जाने की ख़बरें आ रही हैं.
पंजशीर घाटी में पूर्व मुजाहिदीन कमांडर अहमद शाह मसूद के बेटे
अहमद मसूद के नेतृत्व में हज़ारों लड़ाके और अफ़ग़ान सेना के बचे-खुचे सैनिक जमा हो गए हैं.
दोनों पक्षों में समझौता होने की स्थितियां लगभग ख़त्म
होती दिख रही हैं. दोनों ही पक्ष इसके लिए एक दूसरे को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं.
सरकार में सिर्फ़ तालिबान नेता
हालांकि, तालिबान ने एक आम सहमति वाली सरकार का गठन करने की इच्छा जाहिर की है.
लेकिन तालिबान के एक सूत्र ने बताया है कि इस समय
जिस अंतरिम सरकार का गठन हो रहा है, उसमें सिर्फ तालिबान नेता शामिल होंगे.
एक सूत्र के मुताबिक़, इसमें 23 मंत्रालय और 12
मुसलमान विद्वानों की एक शुरा होगी.
एक सूत्र ये भी बताया है कि छह से आठ महीनों में
एक लोया जिरगा यानी महासभा का गठन करने की योजना बनाई जा रही है, जिसमें अफ़ग़ान
समाज के प्रतिनिधि और शीर्ष नेता शामिल होंगे. ये सभा भविष्य की सरकार के ढांचे
और अफ़ग़ानिस्तान के नए संविधान पर चर्चा करेगी.
सभी सूत्रों ने बताया है कि अंतरिम सरकार के
कैबिनेट की घोषणा जल्द हो सकती है. हालांकि, घोषणा के सटीक समय को लेकर सूत्रों के
बीच जानकारी में अंतर दिखा.
कुछ सूत्रों के मुताबिक़, शुक्रवार शाम नई सरकार
के गठन का एलान हो सकता है. वहीं, कुछ सूत्रों का कहना है कि सरकार के गठन का एलान अगले हफ़्ते तक हो
सकता है.
अफ़ग़ानिस्तान के लिए ये काफ़ी अहम होगा कि तालिबान
की नई सरकार अंतरराष्ट्रीय दानदाताओं और निवेशकों की नज़रों में कितनी वैधता हासिल
करती है.
क्योंकि मानवीय सहायता पहुँचाने वाले संगठनों ने अफ़ग़ानिस्तान
में एक बड़ा संकट आने की चेतावनी जारी की है.
इन संगठनों ने बताया है कि सालों तक विदेशी सहायता
से मिलने वाली लाखों डॉलर की राशि पर निर्भर रहने वाली अफ़ग़ान अर्थव्यवस्था अपने
पतन के क़रीब है.
इन एजेंसियों ने ये भी कहा है कि तालिबान के सत्ता हथियाने से पहले ही अफ़ग़ानिस्तान में कई लोग व्यापक सूखे की वजह से अपने परिवारों का पेट भरने में दिक़्क़त महसूस कर रहे हैं और अब लाखों लोग भुखमरी का शिकार हो सकते हैं.
वर्ल्ड फूड प्रोग्राम की निदेशक मेरी एलन मेकग्रोआर्टी ने काबुल में रॉयटर्स को बताया है कि “15 अगस्त से हमने संकट को तेज़ी से बढ़ते और व्यापक होते देखा है. ये देश आर्थिक पतन की ओर बढ़ रहा है.”
इसी समय अमेरिकी सरकार ने अमेरिका में जमा अफ़ग़ानिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार, सोने एवं अन्य निवेशित पूंजी को फ्रीज़ कर दिया है.
हालांकि, इस बीच एक ख़ुशख़बरी आई है कि वेस्टर्न यूनियन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया है कि वह मानवीय मदद के कार्यों को जारी रखने की दिशा में अपनी सेवाएं दोबारा शुरू करने जा रही है.
तालिबान ने इससे पहले अफ़ग़ानिस्तान में 1996 से 2001 तक सरकार चलाई
थी. इस दौरान तालिबान ने शरिया क़ानून लागू किया था.
लेकिन इस बार तालिबान ख़ुद को एक उदारवादी संगठन के रूप में पेश करने की कोशिश की है. तालिबान ने कहा है कि वह मानवीय अधिकारों की
रक्षा करेगा और पुराने दुश्मनों के ख़िलाफ़ बदले से भरी कार्रवाई नहीं करेगा.
हालांकि, अमेरिका, यूरोपीय संघ समेत अन्य पक्ष इन
आश्वासनों को संदेह भरी नज़रों से देख रहे हैं. इन्होंने कहा है कि सरकार को औपचारिक रूप
से स्वीकार किए जाने और उसके बाद आर्थिक मदद को जारी किया जाना तालिबान के कदमों पर टिका है.
तालिबान ने विदेशी नागरिकों एवं काबुल एयरपोर्ट पर
कई दिन तक चले एयरलिफ़्ट ऑपरेशन के बाद भी पीछे छूट गए अफ़ग़ान नागरिकों को सुरक्षित
रास्ता देने का वादा किया है. लेकिन एयरपोर्ट बंद होने के बाद से कई अफ़ग़ान
नागरिक ज़मीन के रास्ते बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं.
इसके साथ ही हज़ारों अफ़ग़ान नागरिक अलग - अलग देशों
में बनाए गए ट्रांज़िट हबों में इंतज़ार कर रहे हैं.