एक जनवरी 2018 को पुणे के पास भीमा
कोरेगांव में हुए दंगे के मामले में गिरफ़्तार प्रोफ़ेसर शोमा कांति सेन को सुप्रीम कोर्ट
ने ज़मानत दे दी है.
हालांकि सुप्रीम
कोर्ट ने कहा है कि ज़मानत अवधि के दौरान शोमा कांति सेन विशेष अदालत की अनुमति के
बिना महाराष्ट्र नहीं छोड़ेंगी.
अदालत ने उन्हें
अपने निवास स्थान के बारे में जांच अधिकारी को सूचित करते रहने और उनके मोबाइल फोन
के जीपीएस को 24 घंटे ऑन रखने का आदेश दिया है.
प्रो सेन पर यूएपीए की धारा के तहत मामला दर्ज किया गया था. पुणे पुलिस की शुरू की गई जांच पूरे देश में चर्चा में रही थी.
महिला अधिकारों के लिए काम करने वालीं प्रोफेसर शोमा सेन नागपुर विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी की प्रोफेसर थीं.
भीमा कोरेगांव दंगों में उनकी कथित भूमिका के लिए उन्हें जून 2018 में गिरफ़्तार किया गया था.
शोमा कांति सेन के ज़मानत मिलते ही इस दंगे में गिरफ़्तार कुल 16 लोगों में से अब तक छह को ज़मानत मिल गई है.
इस मामले में देश के विभिन्न राज्यों से वामपंथी विचारधारा के कार्यकर्ताओं, लेखकों, पत्रकारों और प्रोफेसरों को गिरफ्तार किया गया था.
मराठा साम्राज्य और अंग्रेज़ों की ओर से लड़े 500 महार सैनिकों के बीच 1818 में हुई लड़ाई के 200 साल पूरे होने के मौक़े पर 'एल्गार परिषद' ने एक जनवरी, 2018 को वहाँ एक कार्यक्रम का आयोजन किया था. उसी दौरान हिंसा भड़क उठी थी.
न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता वाली दो जजों की पीठ ने शोमा सेन को ज़मानत दी. हालांकि ज़मानत के लिए कई शर्तें तय की गई हैं.
ज़मानत के लिए निर्धारित शर्तें:
1. शोमा सेन स्पेशल कोर्ट की मंजूरी के बिना महाराष्ट्र नहीं छोड़ेंगी.
2. उन्हें अपना पासपोर्ट जमा करना होगा.
3. उन्हें राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को उस पते की जानकारी देनी होगी, जहां वे रहेंगी.
4. उन्हें केवल एक मोबाइल नंबर का उपयोग करने की अनुमति होगी और उस नंबर की सूचना एनआईए को देनी होगी.
5. उनका मोबाइल लगातार ऑन और चार्ज रहना चाहिए.
6. ज़मानत की अवधि के दौरान 24 घंटे उनके मोबाइल फोन का जीपीएस ऑन रहना चाहिए, ताकि जांचकर्ता को पता चल सके कि वे कहां हैं.
7. 15 दिन में एक बार उन्हें पुलिस स्टेशन में उपस्थित होना होगा.
8. यदि वे उपरोक्त शर्तों में से किसी का भी उल्लंघन करती हैं, तो विशेष न्यायालय के पास ज़मानत रद्द करने का अधिकार होगा. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट जाने की ज़रूरत नहीं होगी.