केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बुधवार को लोकसभा में कहा कि एक भ्रांति फैलाई गई है कि सरकार मणिपुर पर चर्चा
नहीं करना चाहती है.
उन्होंने कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि मणिपुर में हिंसा का तांडव हुआ है. अब तक 152 लोग मारे गए हैं लेकिन इस मामले को राजनीति का विषय नहीं बनाना चाहिए.
उन्होंने कहा कि गृह मंत्रालय के कंट्रोल रुम में कोई आंख मूंदकर नहीं सोया है.
उन्होंने कहा, " मई में 107 लोग मारे गए और अगस्त में चार लोग मारे गए हैं."
'मैं कहना चाहता हूं कि हिंसा लगातार कम हो रही है लेकिन तेल न डालें.'
उन्होंने कहा कि मणिपुर मामले में वहां के नस्लीय हिंसा के स्वभाव को जनता को जानना पड़ेगा.
अमित शाह ने कहा कि मणिपुर में करीब साढ़े छह साल से भारतीय जनता पार्टी की
सरकार है.
उन्होंने कहा, " तब से तीन मई तक एक भी दिन कर्फ्यू नहीं लगा. मणिपुर में एक भी दिन बंद नहीं रहा. ब्लॉकेड (नाकेबंदी) नहीं
रहा.ये छह साल का भारतीय जनता पार्टी का इतिहास था."
उन्होंने कहा कि दिक्कत की शुरुआत तब हुई, जब म्यामांर में सत्ता परिवर्तन हुआ.
अमित शाह ने कहा, " (म्यामांर में) कुकी डेमोक्रेटिक फ्रंट है, उसने आंदोलन चालू
किया. वहां की मिलेट्री शासन ने कड़ाई शुरू की. म्यामांर की बॉर्डर फ्री बॉर्डर है,
वहां फ्री बॉर्डर से कुकी भाइयों का आना शुरू हुआ. हज़ारों की
संख्या कुकी आदिवासी आना शुरु हुए. वो जंगल में बसने लगे. मणिपुर के बाकी हिस्सों में
चिंता शुरू हुई."
गृह मंत्री अमित शाह ने बताया कि उनकी सरकार ने म्यामांर बॉर्डर पर 2022 में फेंसिंग का निर्णय किया.
उन्होंने बताया, "10
किलोमीटर फेंसिंग हो चुकी है. साठ किलोमीटर का काम चालू है.ताकि घुसपैठ को रोका जा सके."
अमित शाह ने कहा, " मणिपुर में घाटी में मैतेई रहते हैं.
पहाड़ पर कुकी रहते हैं. जनसंख्या में बदलाव का दवाब रहता है, जनवरी से
शरणार्थियों को परिचय पत्र देना शुरू किया. "
उन्होंने कहा, " अप्रैल में अफवाह फैल गई कि जंगल गांव घोषित कर
दिया गया. घाटी में अनरेस्ट शुरू हो गया. अफवाह जब फैलती है, तब फैलती है."
अमित शाह ने कहा, " आग में तेल डालने का काम मणिपुर हाई कोर्ट के एक
फैसले ने किया.कोर्ट ने न भारत सरकार के ट्राइबल डिपार्टमेंट का शपथ पत्र
लिया. न गृह मंत्रालय का शपथ पत्र लिया और 29 अप्रैल के पहले मतैई जाति को
ट्राइबल घोषित कर दिया.कानूनी प्रक्रिया के बिना ऑर्डर दे दिया गया."
उन्होंने कहा, " तीन
मई को संघर्ष हो गया और दंगे चालू हो गए. कोर्ट के फैसले के विरोध में जुलूस निकला. देखते
देखते घाटी और पहाड़ पर हिंसा और झगड़े शुरू हो गए."