कुश्ती खिलाड़ी साक्षी मलिक और पहलवान सत्यव्रत कादियान ने एक वीडियो जारी कर रहा है कि उनकी लड़ाई सरकार के ख़िलाफ़ नहीं है बल्कि डब्लूएफ़आई के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के कृत्यों के ख़िलाफ़ है.
सत्यव्रत कादियान साक्षी मलिक के पति हैं.
जारी वीडियो में साक्षी मलिक ने कहा कि लोग पूछते हैं आप इतने समय से चुप क्यों थे.
इस पर हमारा जवाब है, "एकता की बहुत कमी थी. एक साथ हम कभी हो ही नहीं पाए. नाबालिग लड़की ने अपने बयान बदले क्योंकि उसके परिवार को धमकाया गया."
उन्होंने कहा कि पिछले कई दिनों से हमारे ख़िलाफ़ अफ़वाहें फैलाई जा रही हैं. साथ में मीडिया भी कई तरह की ख़बरें दिखा रहा है. इस वीडियो का मकसद सच्चाई बताना है.
वीडियो में साक्षी मलिक और सत्यव्रत कादियान ने ये बातें कहीं-
- हम पर आरोप लगे कि ये आंदोलन राजनीति से प्रेरित है और कांग्रेस नेता दीपेंद्र हुड्डा ने हमें इसके लिए उकसाया है. लेकिन जब हम जनवरी में पहली बार जंतर-मंतर पर पहुंचे थे तो प्रोटेस्ट की अनुमति जंतर मंतर थाने से बीजेपी के ही दो नेताओं तीरथ राणा और बबीता फ़ोगाट ने ली थी. जिसका सबूत भी हमारे पास है तो कैसे हो सकता है कि आंदोलन कांग्रेस ने करवाया.
- जो 28 मई को महिला सम्मान महापंचायत का आह्वान किया गया था, वो हमने नहीं किया था. हमारे खाप चौधरियों ने वो आह्वान किया था. इस फ़ैसले के बाद हमें पता चला कि 28 मई को नई संसद का उद्घाटन भी है. फिर भी हमने बड़े-बजुर्ग के आदेश का पालन किया. इसके परिणामस्वरूप हमारे साथ पुलिस ने बर्बर व्यवहार किया. उस घटना ने हमें अंदर से तोड़ दिया.
- हमने देश के लिए इतने पदक जीते, इतना मान-सम्मान बढ़ाया लेकिन हमारा सम्मान सड़कों पर रौंद दिया गया.
- इसके बाद हम सब ने मेडल को गंगा में बहाने का निर्णय लिया. वहां भी हम इस तंत्र के साजिश का शिकार हो गए.
- हम हरिद्वार पहुंचे तो वहां तंत्र का एक आदमी बजरंग को एक तरफ़ ले गया और कहा-आप रुको, आपके बारे में ही बात चल रही है. और आपको न्याय भी मिल जाएगा. सात बजे तक बजरंग को रोके रखा और उसी समय बड़ी संख्या में तंत्र से जुड़े लोग वहां पहुंच जाते हैं और वहां व्यवस्था इस तरह की बन जाती है कि अगर हम मेडल बहाते तो वहां हिंसा भी हो जाती.
- हम इस स्थिति में ही नहीं थे कि यह साजिश समझ पाते. हम आंदोलनकारी नहीं हैं, हमें इसका अनुभव नहीं है. हमने पूरी ज़िंदगी कुश्ती ही की है. इस तरह के जो माहौल पैदा होते हैं, वो हम समझ नहीं पाते.
- इस घटना के बाद हमें बिल्कुल समझ नहीं आ रहा था कि कौन हमारे साथ है, कौन हमारे ख़िलाफ़ है? कौन इस तंत्र का हिस्सा है. हम दिमागी रूप से शून्य की स्थिति में पहुंच गए थे.
- इस बीच कई लोग हमसे मिलते रहे, समझाते रहे. इसी बीच ये समझाया गया कि गृह मंत्री सर से आपको मिलना चाहिए क्योंकि समाधान वहीं से निकलेगा. हम वहां पर सिर्फ़ अपनी बात रखने गए थे.
- इसके बाद पता चला कि कई खाप हमसे नाराज हैं. तो हम हाथ जोड़कर उनसे विनती करना चाहते हैं कि आप प्लीज अफ़वाहों पर ध्यान न दें. अगर अनजाने में हमसे गलती भी हुई हो तो माफ करें.
दोनों ही पहलवानों ने इस आंदोलन में साथ देने के लिए संयुक्त किसान मोर्चा का शुक्रिया अदा किया.
उन्होंने आजाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर रावण का भी शुक्रिया अदा किया.
पहलवानों ने कहा कि पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने उनका उत्साह बढ़ाया. इसके साथ ही महिला संगठनों और छात्रों ने भी इस लड़ाई में उनका साथ दिया.
पहलवानों ने कहा, "बीजेपी लीडर बबीता जी और तीरथ राणा ने पहलवानों को एकजुट करने का काम किया. इसके बाद इन्होंने ही सरकार के साथ मध्यस्थ बनकर सरकार से आश्वसान दिलवाया. लेकिन कमेटी का आश्वासन सिर्फ़ आश्वासन ही निकला. क्योंकि उसके बाद उस कमेटी का रिजल्ट नहीं निकला. जिसके बाद हमें तीन महीने बाद फिर जंतर-मंतर पर आना पड़ा."
सरकार ने अब तक इस मामले में क्या किया?
जनवरी में इनके दिल्ली में प्रदर्शन पर बैठने के बाद खेल मंत्रालय ने आरोपों की जाँच के लिए एक 'ओवरसाइट कमेटी' का गठन किया था, जिसे कुश्ती संघ के रोज़मर्रा के काम करने का ज़िम्मा भी दिया गया.
'ओवरसाइट कमेटी' की जाँच ख़त्म होने के बाद सिफ़ारिशें सार्वजनिक नहीं की गईं लेकिन कुश्ती महासंघ के कार्यभार को दो सदस्यीय 'ऐडहॉक कमेटी' को दे दिया गया.
साक्षी समेत यौन उत्पीड़न की शिकायत करनेवाली सभी महिला पहलवानों ने 'ओवरसाइट कमेटी' के काम करने के तौर तरीके पर संदेह जताया.
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा और फिर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की.
इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई. हालाँकि गृह मंत्री और खेल मंत्री ने पहलवानों से मुलाक़ात की थी.
बीजेपी सांसद बृजभूषण के ख़िलाफ़ यौन उत्पीड़न समेत अन्य आरोपों को लेकर पहलवान विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पुनिया दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना दे रहे थे. उन्हें 28 मई को जंतर मंतर से हटा दिया गया.