69 सरकारी बैंकों के 10 लाख कर्मचारी निजीकरण के सरकार के फ़ैसले के खिलाफ़ हड़ताल पर हैं. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट में घोषणा की थी कि दो और सरकारी बैंकों का निजीकरण किया जाएगा.
सरकार ने एक बीमा कंपनी में भी शेयर बेचने का फैसला किया है. पिछले चार सालों में दर्जन भर से अधिक सरकारी बैंकों का विलय किया गया है, जिसकी वजह से इन बैंकों में हज़ारों नौकरियां गई हैं.
ऑल इंडिया बैंक्स इम्प्लॉयीज़ एसोसिएशन के महासचिव सीएच वेंकटाचलम ने बीबीसी संवाददाता फ़ैसल मोहम्मद अली से कहा कि सरकार ज़िद पर अड़ी रही तो लड़ाई लंबी खिंच सकती है.
सीएच वेंकटाचलम ने कहा, "उनका लक्ष्य होना चाहिए कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को कैसा बनाना है. उनको किस तरह से जीवंत बनाया जा सकता है. उसमें हम सहयोग कर सकते हैं. हम उनसे बात कर सकते हैं. लेकिन सरकार निजीकरण के रास्ते पर बढ़ेगी तो लड़ाई तेज़ होगी. हमारी लड़ाई लंबी भी हो सकती है. अभी हमने दो दिनों की हड़ताल बुलाई है. इसके बाद चार दिनों की करेंगे, दस दिनों की करेंगे, बीस दिनों की करेंगे, अनिश्चितकालीन करेंगे. ऐसा हो सकता है."
सरकारी बैंक के कर्मचारियों की ये हड़ताल सरकार के उस निर्णय के विरूद्ध है जिसमें दो सरकारी बैंको की हिस्सेदारी बेचने की बात कही गई है. सरकार ने दो साल पहले इंडस्ट्रियल डेवेलपमेंट बैंक ऑफ़ इंडिया में अपना बड़ा हिस्सा बेच दिया था.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ पिछले चार सालों में 14 सरकारी बैंकों का विलय किया गया है. इसमें कई बैंकों को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में मिलाया गया, उसी तरह से विजया बैंक और देना बैंक को बैंक ऑफ बड़ौदा में मिला दिया गया था.
जनवरी 2019 में एलआईसी ने आईडीबीआई बैंक की 51 फ़ीसदी हिस्सेदारी ख़रीदी थी जिसको केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अगस्त 2018 को मंज़ूरी दी थी. एलआईसी अभी सरकारी हाथों में है इसलिए आईडीबीआई को पूरी तरह निजी बैंक नहीं माना जाता है.
हालांकि, अनुमान लगाया गया है कि एलआईसी आईडीबीआई की अपनी हिस्सेदारी धीरे-धीरे बेच सकती है. दो दिनों की हड़ताल का असर एटीएम सेवाओं, बैंक से चेक और कैश की निकासी और कर्ज़ देने जैसे कामों पर पड़ा है.
बैंक कर्मचारी यूनियन के मुताबिक़ दो दिनों की हड़ताल के दौरान चार करोड़ चेक जिनकी वैल्यू 30 हज़ार करोड़ थी, वो क्लियर नहीं हो सकी. निजी बैंकों से उलट सरकारी बैंको की सेवा ग्रामीण इलाकों में भी है और पूरे मुल्क में उसके 80 से 85 करोड़ खातेदार हैं.
ख़बरों के मुताबिक़ बैंक कर्मचारी यूनियन और अधिकारियों की मामले को सुलझाने की लिए मार्च के पहले और दूसरे हफ्ते में बैठकें भी हुईं लेकिन मामले का किसी तरह का हल नहीं निकल सका. सरकारी बैंकों के निजीकरण के पीछे एक तर्क है कि वो घाटे में जा रही हैं और उन्होंने बहुत सारे ऐसे कर्ज़ दे रखे हैं जो वापिस नहीं होंगे.
लेकिन सीएच वेंकटाचलम कहते हैं कि सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "मैं आपको 2009 से ऑपरेटिंग मुनाफ़े का आंकड़ा दे सकता हूं. 76 हज़ार करोड़, 99 हज़ार करोड़, एक लाख 16 हज़ार करोड़, 1 लाख 21 हज़ार करोड़, 1 लाख 27 हज़ार करोड़, एक लाख 38 हज़ार करोड़, एक लाख 59 हजार करोड़, एक लाख 49 हजार करोड़ और पिछले साल ये एक लाख 74 हज़ार करोड़ था, लेकिन मुश्किल ये है कि हमें वैसे कर्ज देने पड़ते हैं जिन्हें बैड लोंस कह जाता है. वो नफ़ा से ज़्यादा होता है इसलिए नेट लॉस या घाटा हो जाता है. लेकिन जो भी ख़राब कर्ज या बैड लोंस हैं, वो बैंकों विरासत में मिले हैं बैंकों. लेकिन अगर सरकार हमें इस कर्ज़ को वापिस हासिल करने में मदद करती है तो किसी तरह का नुकसान नहीं रह जाएगा. सरकार उन कॉरपोरेट्स के खिलाफ़ कदम उठाए, जिन्होंने ये कर्ज़ ले रखे हैं. वैसे भी अगर सरकारी बैंकों का निजीकरण होता है तो यही लोग होंगे जो इन बैंको को खरीदेंगे."
वेंकटाचलम दावा करते हैं कि एक तरफ तो सरकारी बैंकों को ये कहकर बेचा जा रहा है कि वो घाटे में हैं, दूसरी तरफ सरकार निजी बैंकों को जनता के पैसे से फिर से खड़ा करने में मदद कर रही है.
उन्होंने कहा, "जनता के पैसे से डूबे हुए निजी बैंकों को राहत दी जा रही है. उदाहरण के तौर पर येस बैंक, सब जानते हैं कि इसे कितनी खराब तरीके से चलाया गया था और बैंक डूब गया लेकिन कहा गया कि नहीं इसे बचाना है. स्टेट बैंक को उनकी मदद करनी पड़ी और वो इस हालात से उबर पाए. उसी तरह के एक दूसरा प्राइवेट बैंक लक्ष्मी विलास बैंक डूब गया लेकिन उसे एक दूसरे बैंक के हवाले कर दिया गया."
हालांकि ये अभी तक साफ नहीं है कि सरकार ने जिन दो बैंकों में हिस्सेदारी कम करने की बात कही हैं वो कौन से हैं. समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने कहा है कि ये बैंक ऑफ महाराष्ट्र, बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज़ बैंक और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में से कोई दो हो सकते हैं.