ऑक्सफ़र्ड-एस्ट्राज़ेनेका की वैक्सीन के दो वर्ज़न के आपात इस्तेमाल को WHO ने दी अनुमति
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने ऑक्सफ़र्ड युनिवर्सिटी की बनाई कोरोना वायरस वैक्सीन के दो वर्जन के आपात इस्तेमाल को अनुमति दे दी है.
एस्ट्राज़ेनेका कंपनी द्वारा बड़े पैमाने पर बनाई जा रही इस वैक्सीन को डब्ल्यूएचओ के कोवैक्स कार्यक्रम के तहत मुल्कों को दिया जाएगा.
इस वैक्सीन का उत्पादन कोरिया की एस्ट्राज़ेनेका-एसके बायो और भारत के पुणे की सीरम इंस्टीट्यूट कर रही है.
कोवैक्स कार्यक्रम के तहत डब्ल्यूएचओ सभी मुल्कों तक कोरोना वैक्सीन की बराबर पहुंच के लिए कोशिश कर रहा है. संगठन से जुड़ी डॉक्टर मारियांगेला साइमन ने कहा है, "जिन देशों को अब तक कोरोना की वैक्सीन नहीं मिली है वो भी अब अपने स्वास्थ्यकर्मियों और हाई रिस्क नागरिकों का टीकाकरण शुरू कर सकते हैं."
इससे पहले 31 दिसंबर 2020 को डब्ल्यूएचओ ने फ़ाइज़र-बायोएनटेक की बनाई कोरोना वैक्सीन के आपात इस्तेमाल को इज़ाज़त दी थी.
किसे दी जा सकती है ये वैक्सीन?
डब्ल्यूएचओ का कहना है कि स्ट्रैटेजिक एडवायज़री ग्रूप ऑफ़ एक्सपर्ट ने 8 फरवरी को इन दोनों वैक्सीन की गुणवत्ता, सुरक्षा और इससे जुड़े डेटा का अध्ययन करना शुरू किया था. ये काम चार सप्ताह तक चला जिसके बाद ही इसके आपात इस्तेमाल की इजाज़त दी गई है.
जानकारों का ये ग्रूप टीकाकरण से जुड़े सवालों के संबंध में सलाह देता है. ग्रूप बताता है कि कोई टीका किस उम्र के लोगों को दिया जाना चाहिए, दो टीकों के बीच की समयसीमा कितनी होनी चाहिए और गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिला को टीका दिया जाना चाहिए या नहीं.
इस ग्रूप की राय है कि 18 साल से अधिक की उम्र के लोगों ऑक्सफ़र्ड-एस्ट्राज़ेनेका की दोनों वैक्सीन दी जा सकती है.
एस्ट्राज़ेनेका की ये वैक्सीन 63.09 फीसदी कारगर पाई गई है और इसे स्टोर करना आसान है. इस कारण कम आय वाले देशों के लिए ये वैक्सीन बेहतर मानी जा रही है.