रीजनल कॉम्परहेंसिव इकनॉमिक पार्टनर्शिप यानी RCEP को लेकर 15 देशों के बीच बुधवार को सहमति बन गई. लंबे समय से इसे लेकर वार्ता चल रही थी लेकिन अब इस रविवार को सभी 15 देश हस्ताक्षर कर देंगे.
भारत के आने के विकल्प अभी खुले रखे गए हैं. भारत इसमें शामिल होने को लेकर अनिच्छुक है. मलेशिया को कारोबार और उद्योग मंत्री मोहम्मद अज़मिन ने बयान जारी कर कहा है कि 15 देशों के बीच वार्ता में सहमति बन गई है और इस रविवार को सभी देश हस्ताक्षर कर देंगे.
इसमें असोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन नेशन्स के 10 देशों के अलावा जापान, चीन, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड हैं. आरसीईपी एशिया का सबसे बड़ा ट्रेड ज़ोन होगा. इसमें दुनिया की 30 फ़ीसदी जीडीपी और ट्रेड की भागीदारी होगी. जापान पहली बार चीन और दक्षिण कोरिया के साथ मुक्त व्यारपार फ्रेमवर्क में आ रहा है.
अज़मिन ने कहा, ''आठ सालों की वार्ता, जिसमें ख़ून, पसीना और आँसू सब लगे, उसके बाद हम मंज़िल तक पहुंचने जा रहे हैं.'' अज़मिन ये बात कैबिनेट की ऑनलाइन बैठक में कही है. 2013 में आरसीईपी को लेकर जब वार्ता शुरू हुई तो इसमें भारत भी शामिल था लेकिन पिछले साल भारत इससे बाहर हो गया था.
जापान ने भारत को आरसीईपी में लाने की कोशिश की लेकिन भारत को डर था कि कहीं इससे देश के व्यापारियों और किसानों को नुक़सान नहीं उठाना पड़े. RCEP के प्रभाव में आ जाने के बाद और देश इसमें शामिल नहीं हो सकता है. निक्केई एशिया रिव्यू के अनुसार भारत को लेकर यह नियम लागू नहीं होगा.
RCEP के सदस्य एक दस्तावेज़ जारी करने पर विचार कर रहे हैं जिसमें भारत के लिए विशेष छूट होगी कि वह कभी भी इसमें शामिल हो सकता है. RCEP के तहत टैरिफ में कटौती होगी. इसके अलावा क्रॉस बॉर्डर डेटा समेत अलग-अलग 20 क्षेत्रों के लिए नियम बनेंगे. कृषि उत्पादों को लेकर छूट दी गई है. RCEP असोसिएशन ऑफ साउथ एशियन नेशन्स के सदस्यों से आयात पर शुल्कों में 61 फ़ीसदी की कटौती करेगा.
भारत RCEP में क्यों नहीं आना चाहता?
अगर भारत भी होता तो RCEP में कुल 16 देश होते. भारत समेत RCEP के 16 देशों के बीच आर्थिक और सांस्कृतिक विषमता बहुत बड़ी है. कुछ विषमताएं ऐसी हैं जो बाधा हैं. ऑस्ट्रेलिया अमीर देश है जहां की प्रति व्यक्ति न्यूनतम जीडीपी 55 हज़ार डॉलर से ज़्यादा है.
कंबोडिया प्रति व्यक्ति 1,300 डॉलर के साथ आख़िरी नंबर पर है. दूसरी तरफ़ भारत के बारे में कहा जा रहा है कि उसके लिए आरसीईपी किसी चुनौती से कम नहीं है. भारत की सबसे बड़ी चिंता इलेक्ट्रॉनिक डेटा शेयरिंग और लोकल डेटा स्टोरेज की मांग है. सुरक्षा कारणों, राष्ट्र हित और गोपनीयता के लिहाज़ से इसे साझा करना आसान नहीं है. पर्यवेक्षकों का मानना है कि इन ज़रूरतों के कारण कई तरह की दिक़्क़ते आएंगी.
पिछले स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि भारत अगर इसमें शामिल होता है तो घरेलू उत्पाद बुरी तरह से प्रभावित होंगे. एसबीआई की रिपोर्ट तब आई थी जब RCEP की अहम बैठक थाईलैंड में चल रही थी.
एसबीआई की रिपोर्ट में कहा गया था, ''2018-19 में आरसीईपी के 15 में से 11 सदस्य देशों के साथ भारत का घाटे का व्यापार रहा. भारत का 2018-19 में व्यापार घाटा 184 अरब डॉलर का था. आरसीईपी के देशों से भारत का आयात 34 फ़ीसदी था और निर्यात महज 21 फ़ीसदी था.'' भारत में इसे लेकर मैन्युफ़ैक्चरर्स और यहां तक कि किसानों के बीच भी डर है.
फ़्री ट्रेड अग्रीमेंट को लेकर भारत का अतीत का अनुभव ठीक नहीं रहा है. भारत का इन सभी देशों के साथ घाटे का व्यापार है और हर साल बढ़ता जा रहा है. इन देशों में भारत का कुल निर्यात 20 फ़ीसदी है जबकि आयात 35 फ़ीसदी है. अमरीका से जारी ट्रेड वॉर के बीच चीन आरसीईपी की वकालत कर रहा है.
चीन भारत में बड़ा निर्यातक देश है. केवल चीन के साथ ही भारत का व्यापार घाटा बहुत बड़ा है. हर साल चीन इलेक्ट्रिकल मशीनरी, उपकरण, प्लास्टिक उत्पाद, इस्पात, एल्युमीनियम, कृत्रिम फाइबर और फर्नीचर भारतीय बाज़ार में जमकर बेचता है. डर है कि अगर आरसीईपी डील हुई तो चीन के ये उत्पाद भारतीय मार्केट में और बढ़ जाएंगे.