तियानमेन स्क्वायर: चीन में जब सरकार का विरोध करने पर मारे गए थे दस हज़ार लोग

चीन में सख़्त कोविड नीतियों को लेकर शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला आइफ़ोन बनाने वाली फैक्ट्री से शुरू होकर शंघाई की सड़कों पर नारेबाज़ी के बाद शीर्ष शैक्षणिक संस्थानों तक पहुंचता दिख रहा है.

चीन के सबसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान शिंघुआ यूनिवर्सिटी के छात्र एक कोरे कागज़ पर रूसी वैज्ञानिक फ्रीमेन की इक्वेशन दिखाते दिख रहे हैं जिसका उच्चारण फ्ऱी मैन यानी आज़ाद शख़्स है.

ये तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल है. हॉन्गकॉन्ग में प्रदर्शनों के नेता रहे नाथन लॉ ने भी इस तस्वीर को शेयर किया है.

इसके अतिरिक्त कई जगहों पर लोग सफ़ेद कागज के साथ देखे गए हैं जिसे इंटरनेट पर ए4 रिवॉल्युशन कहा जा रहा है.

क्योंकि लोग ए4 साइज़ के पेपर के साथ दिख रहे हैं.

चीन में इस तरह के सरकार विरोधी प्रदर्शन विरले ही देखने को मिलते हैं. इन प्रदर्शनों में चीन के सबसे ताक़तवर नेता राष्ट्रपति शी जिनपिंग के इस्तीफ़े की मांग तक की जा रही है.

शंघाई में रहने वाले फ्रैंक साई ने बीबीसी को बताया है कि वह इतने बड़े विरोध प्रदर्शन देखकर दंग हैं.

वह कहते हैं, "मैंने पिछले 15 सालों में शंघाई में रहते हुए इतने बड़े विरोध प्रदर्शन नहीं देखे हैं."

साई बताते हैं कि पिछले दो तीन दशकों में छिट-पुट विरोध प्रदर्शन देखने को मिले हैं जो मजदूरों के हकों से लेकर ज़मीनों पर कब्जे से जुड़े रहे हैं. इनमें बहुत कम मौकों पर केंद्रीय सरकार को निशाना बनाया गया है और लगभग किसी भी मामले में चीनी सत्ता को निशाना नहीं बनाया गया है.

लेकिन रविवार को शंघाई में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद कई शैक्षणिक संस्थाओं में भी सांकेतिक भाषा में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं.

चीनी सरकार ने भी इन विरोध प्रदर्शनों को रोकने की दिशा में कदम उठाना शुरू कर दिया है.

चीन की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले शंघाई शहर में सड़कों के दोनों ओर नीले रंग की अस्थाई दीवारें खड़ी कर दी गयी हैं.

चीन की पुलिस ने शंघाई में हुए विरोध प्रदर्शनों में शामिल रहे दो लोगों को गिरफ़्तार किया है.

चीनी सुरक्षा एजेंसियों इन विरोध प्रदर्शनों से निपटने के लिए आगे क्या करेंगी, ये आने वाले कुछ वक़्त में ही स्पष्ट हो पाएगा.

लेकिन इन विरोध प्रदर्शनों और उसके बाद चीनी सरकार की प्रतिक्रिया ने लोगों को अस्सी के दशक वाले विरोध प्रदर्शनों की याद दिला दी है.

अस्सी के दशक का तियानमेन स्क्वायर

अस्सी के दशक में चीन कई बदलावों से होकर गुज़र रहा था जिनमें निजी कंपनियों और विदेशी निवेश को स्वीकार्यता दिया जाना शामिल था.

तत्कालीन चीनी नेता देंग श्याओपिंग को उम्मीद थी कि इन कदमों से चीनी अर्थव्यवस्था को बल मिलने के साथ ही लोगों के जीवन स्तर में भी सुधार आएगा.

लेकिन इन कदमों के साथ भ्रष्टाचार बढ़ने के मामले सामने आए.

ठीक इसी समय आम लोगों के बीच राजनीतिक स्वतंत्रता से लेकर खुलकर बातचीत होने की आकांक्षाओं का जन्म हुआ.

ये वो दौर था जब चीन की कम्युनिस्ट पार्टी दो गुटों में बंटी थी.

एक गुट तेजी के साथ बदलाव चाहता था तो दूसरा गुट चाहता था कि चीन के मामलों में सरकार का नियंत्रण कम न हो.

इस तरह अस्सी के दशक का मध्य आते-आते चीन में छात्रों के नेतृत्व वाला विरोध प्रदर्शन सिर उठाने लगा.

इन प्रदर्शनों में उन लोगों ने हिस्सा लिया जो विदेशों में रह चुके थे और जिनका नए विचारों और उच्च जीवन स्तर से राब्ता कायम हो चुका था.

तियानमेन स्कैव्यर पर जुटे लोग

साल 1989 में राजनीतिक स्वतंत्रता का दायरा बढ़ाए जाने की मांग के साथ विरोध प्रदर्शन शुरू हुए.

इसी बीच चीन के एक शीर्ष चीनी नेता हू याओबैंग की मौत हो गयी जो पिछले कुछ सालों में हुए आर्थिक और राजनीतिक बदलावों के साक्षी रहे थे.

याओबैंग के विरोधियों ने उनकी मौत से दो साल पहले उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी के एक शीर्ष पद से हटा दिया था.

साल 1989 के अप्रैल महीने में याओबैंग की अंत्येष्टि में लाखों लोग शामिल हुए जिन्होंने सेंसरशिप कम करने से लेकर अभिव्यक्ति की आज़ादी की मांग को उठाया.

इसके कुछ हफ़्तों बाद चीन की राजधानी बीजिंग के तियानमेन स्क्वायर में चीनी लोग जुटना शुरू हुए.

कुछ आकलनों के मुताबिक़, इस चौराहे पर जुटने वाले लोगों की संख्या दस लाख तक थी.

चीन ने कैसे कुचला ये विरोध प्रदर्शन

इस विरोध प्रदर्शन की शुरुआत में चीनी सरकार ने सीधे तौर पर कोई कार्रवाई नहीं की.

पार्टी के भीतर इस विरोध प्रदर्शन को ख़त्म कराने को लेकर चर्चाएं जारी थी.

एक पक्ष का कहना था कि प्रदर्शनकारियों को कुछ न कुछ राहत मिलनी चाहिए.

वहीं दूसरा पक्ष चाहता था कि प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ कड़ा रुख अपनाया जाना चाहिए. इस बहस में कड़े रुख के पक्षधर गुट की जीत हुई.

और सरकार ने बीजिंग में मई के आख़िरी दो हफ़्तों में मार्शल लॉ लागू कर दिया.

इसके बाद तीन से चार जून को चीनी सेना ने तियानमेन स्क्वायर की ओर बढ़ना शुरू कर दिया.

इन दिनों की एक तस्वीर दुनिया भर में पॉपुलर है जिसमें एक शख़्स चार टैंकों के सामने खड़ा दिखाई देता है. किसी को ये तो नहीं पता कि तस्वीर में दिखने वाले इस शख़्स का क्या हुआ.

लेकिन इस चौराहे पर प्रदर्शन करने वालों के साथ जो कुछ हुआ, वो आज भी चीन में संवेदनशील विषय बना हुआ है.

इसका आंखों देखा हाल उस वक़्त बीजिंग में मौजूद रहीं बीबीसी संवाददाता केट एडी ने बयां किया है.

केट ने बताया था, ''सुरक्षाबल निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध गोलियां बरसा रहे हैं लेकिन अभी भी हज़ारों लोग सड़क पर हैं जो पीछे हटने को राज़ी नहीं हैं.''

कितने लोगों की मौत हुई

अब तक ये स्पष्ट नहीं है कि इस संघर्ष में कितने लोगों की मौत हुई.

चीनी सेना ने साल 1989 के जून महीने में कहा था कि 200 आम लोगों और कई दर्जन सुरक्षाकर्मियों की मौत हुई है.

अन्य अनुमानों में ये संख्या कई हज़ार तक बताई गयी है.

लेकिन 2017 में ब्रितानी सरकार ने एक दस्तावेज़ सार्वजनिक किया है जिसके मुताबिक़, इस संघर्ष में मरने वालों की संख्या दस हज़ार बताई गई थी.

ये दस्तावेज़ तत्कालीन ब्रितानी दूतावास सर एलन डोनाल्ड का डिप्लोमेटिक केबल था.

इस केबल में राजनयिक अधिकारी ने लिखा था - 'छात्रों को लगा कि उनके पास चौराहे से हटने के लिए एक घंटे का समय है लेकिन सिर्फ़ पांच मिनट के अंदर सशस्त्र सैन्य वाहनों (एपीसी) ने हमला बोल दिया.'

इस दस्तावेज़ में यहां तक कहा गया है कि 'छात्रों ने एक दूसरे से कोहनियां मिला लीं लेकिन उन्हें कुछ सैनिकों के साथ कुचल दिया गया. इसके बाद सशस्त्र सैन्य वाहनों ने उनके पार्थिव शरीरों को एक के बाद एक कई बार कुचलना जारी रखा. उनके शरीर के अवशेषों को बुलडोज़र से बटोरकर जला दिया गया और नालियों में बहा दिया गया.'

सर एलन ने ये भी लिखा था कि 'उस दौरान स्टेट काउंसिल के कई सदस्यों को लगा था कि गृह युद्ध को अब रोका नहीं जा सकता.'

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