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यूक्रेन युद्धः भारतीय डॉक्टर को छोड़ने ही पड़े अपने पालतू जैगुआर
युद्धग्रस्त यूक्रेन में अपने घर के बेसमेंट में रहने को मजबूर एक भारतीय मूल के डॉक्टर को अपने पालूत जैगुआर से अलग होना पड़ा है.
इस साल फ़रवरी में जब रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण किया और भीषण युद्ध हुआ तब भारतीय मूल के डॉक्टर गिरिकुमार पाटिल ने कहा था कि वो अपने पालतू जानवरों को अकेला छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे.
अविवाहित गिरिकुमार हड्डी के डॉक्टर हैं और पूर्वी यूक्रेन के लुहांस्क क्षेत्र के एक छोटे से क़स्बे स्वावतोफ़ के एक अस्पताल में काम करते थे.
42 वर्षीय गिडिकुमार पाटिल ने साल 2016 में यूक्रेन की नागरिकता ले ली थी. उन्होंने राजधानी कीएफ़ के एक चिड़ियाघर से दो साल पहले इन जानवरों को ख़रीदा था.
इनमें एक 24 महीना का नर लेपजैग है जो नर लैपर्ड और मादा जैगुआर की दुर्लभ हाईब्रिड औलाद है. उनके पास एक 14 महीने की मादा ब्लैक पैंथर भी है.
दो महीने पहले जब पाटिल के पास पैसे ख़त्म हो गए तो वो पड़ोसी देश पोलैंड आ गए और यहां काम करने लगे ताकि वो अपनी इन दो प्यारे जानवरों को खाना खिलाते रहें.
जिस अस्पताल में पाटिल काम करते थे वो युद्ध के शुरुआती महीनों में ही बंद हो गया था. अब ये अस्पताल बम हमले में बर्बाद हो चुका है. बीते कुछ सप्ताह में यूक्रेन के सैन्य बलों ने तेज़ी से रूसी सेना पर हमले किए हैं और बड़े इलाक़ों को अपने नियंत्रण में वापस लिया है. इसी अभियान में ये अस्पताल भी बमों का निशाना बन गया.
फ़िलहाल पाटिल पोलैंड की राजधानी वारसा के एक हॉस्टल की डोरमेट्री में अन्य यूक्रेनी शरणार्थियों के साथ रह रहे हैं.
वो यहां काम करके पैसा कमाने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि अब उन्हें अपने जानवरों की चिंता सता रही है.
जानवरों की चिंता
वो कहते हैं कि दो सप्ताह पहले स्वावतोफ़ में इंटरनेट बंद हो गया था और अब उन्हें अपने जानवरों की हालत पता करने के लिए रोज़ाना एक स्थानीय किसान को फ़ोन करना पड़ता है जो उनकी देखभाल कर रहे हैं.
वारसा से फ़ोन पर बात करते हुए पाटिल ने बीबीसी को बताया, "देखभाल कर रहे किसान ने मुझे बताया है कि जानवर मेरी कमी महसूस कर रहे हैं. लीपजैग ने पिछले एक सप्ताह से ठीक से खाना नहीं खाया है. ब्लैक पैंथर असमंजस में है. मैं जानवरों को बचाना चाहता हूं और उन्हें वहां से निकालना चाहता हूं. लेकिन मुझे नहीं पता कि मैं ऐसा कैसे करूं."
पाटिल बताते हैं कि उन्हें बेहद मुश्किल हालात में सिर्फ़ एक बैग और लगभग सौ डॉलर साथ रखकर अपना घर छोड़ना पड़ा. इसके अलावा उनके पास कुछ हज़ार रूबल ही थे.
पाटिल अब तक अपनी सारी बचत ख़र्च कर चुके हैं और उन्हें अपनी ज़मीन का कुछ हिस्सा भी बेचना पड़ा है. इसके अलावा उन्होंने अपने दो अपार्टमेंट, दो कारें और अपनी मोटरसाइकिल और कैमरा भी बेच दिया है. इसके बदले में उन्हें सिर्फ़ लगभग एक लाख डॉलर ही मिले हैं.
वो कहते हैं कि युद्ध शुरू होने के बाद वो रोज़ाना अपने जानवरों के खाने पर 300 डॉलर ख़र्च करते हैं. वो उन्हें पांच किलो मीट रोज़ाना खिलाते हैं.
वो कहते हैं, "जैसे-जैसे हालात ख़राब होते गए और युद्ध हमारे घर के क़रीब आता गया, मेरे पैसे भी ख़त्म हो गए. मैंने जानवरों को एक केयरटेकर के पास छोड़कर यूक्रेन से बाहर जाने और नौकरी करके पैसा कमाने का फ़ैसला लिया."
वो कहते हैं कि वो लगभग तीन महीनों का मांस फ़्रिज में रखकर आए हैं और केयरटेकर को वेतन के रूप में उन्होंने तीन महीनों के लिए 2400 डॉलर चुकाए हैं.
हालांकि उनकी ये योजना भी बहुत कामयाब नहीं हो सकी.
जब रूसी सैनिकों ने की पूछताछ
पाटिल बताते हैं कि उन्होंने एक मिनी बस में युद्धग्रस्त क्षेत्र में 12घंटे सफ़र किया. सीमा के पास रूसी सैनिकों ने उन्हें वाहन से बाहर उतार लिया और तीन दिनों तक पूछताछ के लिए एक भूमिगत कमरे में रखा.
पाटिल कहते हैं, "मुझे बस से उतार लिया गया और आंखों पर पट्टी बांधकर एक भूमिगत बने पूछताछ कक्ष में ले जाया गया. जहां उन्होंने मुझे खाने के लिए सूप और ब्रेड दिया और फिर पूछताछ की. उन्होंने मेरे पहचान पत्र देखे जो कीएफ़ में बने थे. इसकी वजह से उन्हें मेरे जासूस होने का शक हुआ. उन्हें लग रहा था कि मैं जानकारियां यूक्रेन की सेना को पहुंचा रहा हूं."
पाटिल ने रूसी सैनिकों को बताया कि उन्होंने यूक्रेन युद्ध में किसी का पक्ष नहीं लिया है. उन्होंने अपना यूट्यूब चैनल भी दिखाया जिस पर वो अपने जानवरों के बारे में पोस्ट करते हैं. इस पर क़रीब साठ हज़ार फ़ॉलोवर भी हैं.
वो कहते हैं कि मैंने उन्हें अपना यूट्यूब चैनल और उस पर पोस्ट किए गए वीडियो दिखाए.
"मेरी हिरासत की तीसरी रात एक रूसी अधिकारी मेरे पास आए और बताया कि उनकी पत्नी ने मेरे जानवरों के वीडियो देखें है और कहा है कि मैं कोई जासूस नहीं हूं बल्कि एक पशु प्रेमी हूं. उस रात मुझे चैन की नींद आई."
अगली सुबह पाटिल को आज़ाद कर दिया गया. पाटिल बताते हैं कि रूस के सैनिकों ने उनका पासपोर्ट ज़ब्त कर लिया और उन्हें एक पहचान पत्र जारी किया.
पाटिल को पोलैंड की सीमा के पास छोड़ दिया गया जहां पाटिल ने अपनी बायोमैट्रिक पहचान के ज़रिए अपनी पहचान की पुष्टि की और अपनी कहानी सुनाई. उन्हें बॉर्डर पार करने दिया गया.
परिवार से मिली मदद
पोलैंड के अधिकारियों ने उन्हें पेपर वीज़ा दिया है जिसके तहत वो 90 दिनों तक पोलैंड में रह सकते हैं. उसी रात उन्होंने वारसा के लिए एक बस पकड़ ली.
अब उनके शहर में हालात और भी ख़राब हो रहे हैं. पाटिल कहते हैं कि उन्हें नहीं पता है कि वो अपने जानवरों के पास कब वापस लौट सकेंगे.
पाटिल का जन्म दक्षिणी भारतीय राज्य आंध्र प्रदेश में हुआ था, उनका परिवार अब उन्हें आर्थिक मदद भेज रहा है.
पाटिल कहते हैं, "मैंने कई बार कीएफ़ में भारतीय दूतावास में फ़ोन किया और अपने जानवरों को यूक्रेन से निकालकर भारत ले जाने का आग्रह किया. मुझसे कहा गया कि दूतावास जंगली जानवरों के मामले नहीं देखता है."
पाटिल कहते हैं कि इस सप्ताह उन्होंने वारसा के एक चिड़ियाघर का दौरा किया और वहां अधिकारियों से अपने जानवरों को रखने की अपील भी की.
"मैं किसी भी तरह अपने पालतू जानवरों को वापस चाहता हूं. अगर भारत सरकार उन जानवरों को किसी तरह वहां से निकाल लेती है और उन्हें भारत के किसी चिड़ियाघर या जंगल में भी छोड़ देती है तो मैं इसमें भी ख़ुश हूं. मैं बस किसी भी तरह उनकी जान बचाना चाहता हूं."
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