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नागेंद्रन धर्मालिंगम जिन्हें सिंगापुर में हुई फांसी- पूरा मामला
- Author, यवेट टान
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, सिंगापुर
शर्मिला धर्मालिंगम किसी चमत्कार की दुआ कर रही थीं. उनके भाई नागेंद्रन धर्मालिंगम को सिंगापुर की चांगी जेल में फांसी पर चढ़ाया जाना था. लेकिन उनकी दुआएं काम नहीं आई और नागेंद्रन धर्मालिंगम को सिंगापुर में फांसी पर चढ़ा दिया गया.
नागेंद्रन को फांसी लगने से पहले बीबीसी ने शर्मिला से बात की थी.
शर्मिला बीबीसी से कहा था, "जब मैं अकेली होती हूं और अपने भाई के बारे में सोचती हूं तो मुझे बहुत पीड़ा होती है. लेकिन हमें हौसला बरकरार रखना होगा और प्रार्थना करते रहना होगा. कुछ भी हो सकता है."
2009 में तब 21 साल के रहे नागेंद्रन को मलेशिया से सिंगापुर में हेरोइन की तस्करी करते हुए पकड़ा गया था.
नागेंद्रन को 26 अप्रैल की सुबह फांसी पर चढ़ाया जाना था लेकिन अंतिम समय में उनकी फांसी पर स्टे लग गया. मंगलवार को उनके कोविड से संक्रमित होने की पुष्टि हुई थी और इसी वजह से फांसी टाल दी गई.
लेकिन इसके अगले दिन यानी 27 अप्रैल को उन्हें मौत की सज़ा दे दी गई.
सिंगापुर की सरकार का तर्क है कि उन्हें अपने किए के बारे में पता था और उनमें अच्छे और बुरे की स्पष्ट समझ थी.
सिंगापुर में दुनिया के सबसे कठोर ड्रग्स क़ानून हैं और स्थानीय स्तर पर फांसी की सज़ा पर कोई बड़ा विवाद नहीं होता है. लेकिन नागेंद्र के मामले में इस वहाँ के लोग सकते में हैं.
लोगों में आक्रोश
अब तक साठ हज़ार से अधिक लोग एक याचिका पर हस्ताक्षर कर सिंगापुर के राष्ट्रपति से नागेंद्र की सज़ा को माफ़ करने की अपील की थी.
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत मानसिक रूप से कमज़ोर लोगों को फांसी देने पर प्रतिबंध है.
याचिका पर हस्ताक्षर करने वाले एक व्यक्ति ने बीबीसी से कहा, "ये दिल को झकझोरने वाली बात है कि अहिंसक अपराध के लिए एक मानसिक कमज़ोर व्यक्ति को फांसी पर चढ़ाया जा रहा है."
सोशल मीडिया पर भी इस अभियान को समर्थन मिल रहा था जहां लोग आक्रोश प्रकट कर रहे थे और नागेंद्रन से सहानुभूति रख रहे थे.
शर्मिला कहती हैं कि उन्हें नहीं पता कि उनके 33 वर्षीय भाई को हालात की गंभीरता का अंदाज़ा होगा या नहीं.
वो कहती हैं, वो कई बार हमें फोन करता था कि उसे बस फांसी दी ही जाने वाली है और उसे इसके लिए तैयार होना है.
"और कई बार वो कहता है कि उसे घर आना है और घर पर बना खाना खाना है. मुझे नहीं पता कि वो चीज़ों को समझता है या नहीं."
मानसिक सेहत पर बहस
2009 में नागेंद्रन को मलेशिया से सिंगापुर में घुसते हुए पकड़ा गया था. उनकी जांघ से 43 ग्राम हेरोइन बंधी थी.
सिंगापुर के क़ानून के मुताबिक 15 ग्राम से अधिक हेरोइन के साथ पकड़े जाने पर फांसी की सज़ा है.
अपने मुक़दमे की सुनवाई के शुरुआती दिनों में नागेंद्रन ने कहा था कि उन्हें हेरोइन के साथ सीमा पार करने के लिए मजबूर किया गया था.
हालांकि बाद में उन्होंने कहा था कि उन्हें पैसों की ज़रूरत थी जिसे पूरा करने के लिए उन्होंने अपराध किया.
अदालत ने कहा कि नागेंद्रन ने अपने बचाव में झूठे तर्क पेश किए. बाद में उन्हें फांसी की सज़ा दे दी गई.
2015 में नागेंद्रन ने अपनी मानसिक सेहत के आधार पर फांसी की सज़ा को माफ़ करने की अपील की. उन्होंने कहा कि वो मानसिक रूप से कमज़ोर हैं.
2017 में एक मनोचिकित्सक डॉक्टर केन उंग ने कहा कि नागेंद्रन को मध्यम स्तर की मानसिक विकलांगता है और वो शराब पीने की लत के भी शिकार हैं.
यदि डॉक्टर केन के ये तर्क स्वीकार कर लिए जाते तो नागेंद्रन के मामले को काफ़ी हद तक प्रभावित कर सकते थे.
बाद में अदालत में सवाल-जवाब के दौरान डॉक्टर ने अपने तर्क को पलटते हुए कहा कि उन्हें लगता है कि नागेंद्रन बॉर्डरलाइन इंटेलेक्चुअल फंक्शनिंग से प्रभावित हैं.
जबकि तीन अन्य मनोवैज्ञानिकों ने अदालत से कहा कि नागेंद्रन को किसी तरह की मानसिक बीमारी नहीं है.
एक मनोवैज्ञानिक ने तर्क दिया कि उनकी बॉर्डरलाइन इंटेलिजेंस ने ही उनके अपराध करने के निर्णय को प्रभावित किया होगा.
अदालत ने लंबी बहस के बाद ये तय किया कि वो मानसिक रूप से कमज़ोर नहीं हैं. बीते साल राष्ट्रपति ने भी उनकी दया याचिका ख़ारिज कर दी.
एमनेस्टी इंटरनेशनल औ ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने अदालत के फ़ैसले की आलोचना की है.
मलेशिया में प्रदर्शन
इस मामले में मलेशिया में भी लोगों को आक्रोशित किया है जहां नागेंद्रन के समर्थन में प्रदर्शन हुए हैं.
मलेशिया के प्रधानमंत्री इस्लाइल याकूब साबरी ने सिंगापुर के प्रधानमंत्री से व्यक्तिगत तौर पर नागेंद्रन को माफ़ करने की अपील की थी.
शर्मिला कहती हैं, "मैं इसे स्वीकार ही नहीं कर पाई, मैं बहुत रो रही थी. मैं पूरा दिन रोती ही रही. मैं इस बारे में अपनी मां को बताने से बहुत डर रही थी क्योंकि उनकी सेहत ठीक नहीं है. मैं उनकी आंखों में देख ही नहीं पा रही थी."
परिवार को नागेंद्रन से मिलने के लिए सिंगापुर आने के इंतज़ाम करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया था. इसी दौरान उन्हें होटल बुक करने से लेकर कोविड के नियमों के तहत यात्रा की सभी व्यवस्थाएं करनी थीं.
परिवार के लिए ऑनलाइन पैसा जुटाने का अभियान शुरू करने वाली कार्यकर्ता क्रिस्टीन हान कहती हैं कि परिवार को स्वास्थ्य से जुड़े दस्तावेज़ बनवाने थे, अपने लिए रहने की जगह खोजनी थी और अपने ख़र्चे स्वयं ही उठाने थे.
शर्मिला और उनके परिवार के लिए क़रीब 12600 डॉलर का फंड जुटा. वो कहती हैं कि इस पैसे के बिना उनका परिवार नागेंद्रन से मिलने नहीं जा पाता.
परिवार पिछले सप्ताह सिंगापुर आ गया था लेकिन शर्मिला नहीं आई थीं. वो कहती हैं कि किसी को तो परिवार का कामकाज संभालने के लिए रुकना ही था.
अपने भाई को फांसी पर चढ़ाए जाने से पहले वो उन्हें देख नहीं पाई हैं. वो कहती हैं कि वो हर दिन प्रार्थना करती हैं कि कोई चमत्कार हो जाए और उनका भाई बच जाए.
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