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फ़्रांस में भारत को झटका, क़रीब 20 संपत्तियों की ज़ब्ती का आदेश
ब्रिटेन की कंपनी केयर्न एनर्जी ने लंबे समय से चल रहे एक टैक्स विवाद में फ्रांस में दो करोड़ यूरो (लगभग 166 करोड़ रुपये) से अधिक मूल्य की भारत की सरकारी संपत्ति को ज़ब्त करने का अधिकार हासिल कर लिया है.
एक फ्रांसीसी न्यायाधिकरण ने सेंट्रल पेरिस में लगभग 20 संपत्तियों को फ्रीज़ करने का आदेश दे दिया है. केयर्न ने कहा कि वह 1.2 अरब डॉलर के विवाद का एक 'सौहार्दपूर्ण समाधान' चाहता है.
स्कॉटलैंड के एडिनबरा स्थित तेल और गैस फ़र्म केयर्न एनर्जी का टैक्स अदायगी को लेकर भारत सरकार के साथ विवाद चल रहा है.
केयर्न की भारत में चल रही एक कंपनी में दस प्रतिशत की हिस्सेदारी थी जिसे वो बेचने की कोशिश कर रहा था, उसे भारत के आयकर विभाग ने ज़ब्त कर लिया था.
केयर्न इस मुद्दे को लेकर अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण में गया था जिसने दिसंबर 2020 में भारत को आदेश दिया था कि कंपनी को 1.7 अरब डॉलर के हर्जाने का भुगतान किया जाए. भारत सरकार ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील की है.
इसी दौरान केयर्न ने भारत सरकार की उन संपत्तियों की पहचान करनी शुरू कर दी जिन्हें भारत सरकार के हर्जाना न देने की सूरत में वो ज़ब्त कर सके. इसमें एयर इंडिया की मिल्कियत वाली संपत्तियाँ शामिल हैं.
इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए भारत के वित्त मंत्रालय ने कहा है, "भारत सरकार को किसी भी फ्रांसीसी न्यायालय से इस संबंध में कोई नोटिस, आदेश या संदेश नहीं मिला है."
एक बयान में भारत के वित्त मंत्रालय ने कहा, "सरकार तथ्यों का पता लगाने की कोशिश कर रही है और जब भी ऐसा कोई आदेश प्राप्त होगा भारत के हितों की रक्षा के लिए अपने वकीलों के परामर्श करके उचित क़ानूनी उपाय किए जाएंगे."
मंत्रालय ने यह भी कहा कि हेग की अंतरराष्ट्रीय अदालत के कोर्ट ऑफ अपील में दिसंबर 2020 के जुर्माना भरने के फ़ैसले को रद्द कराने के लिए सरकार पहले ही 22 मार्च 2021 को एक आवेदन दायर कर चुकी है. भारत सरकार हेग में इसे रद्द कराने की कार्यवाही में अपना पक्ष दृढ़ता के साथ रखेगी.
वित्त मंत्रालय ने ये भी कहा है कि केयर्न के सीईओ और प्रतिनिधियों ने मामले को सुलझाने पर चर्चा के लिए भारत सरकार से संपर्क किया है.
वित्त मंत्रालय ने कहा "रचनात्मक चर्चा हुई है और सरकार देश के कानूनी ढांचे के भीतर विवाद के सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए तैयार है".
वहीं केयर्न एनर्जी के प्रवक्ता ने कहा है, "हमारी प्राथमिकता इस मामले को बंद करने के लिए भारत सरकार के साथ एक सहमत, सौहार्दपूर्ण समझौता करना है और इसके लिए हमने इस साल फरवरी से प्रस्तावों की एक विस्तृत सूची प्रस्तुत की है. हालांकि इस तरह के समझौते के अभाव में केयर्न एनर्जी को अपने अंतरराष्ट्रीय शेयरधारकों के हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कानूनी कार्रवाई करनी होगी."
क्या है मामला?
जनवरी 2014 में जब केयर्न एनर्जी केयर्न इंडिया लिमिटेड में अपनी अंतिम हिस्सेदारी बेचने की तैयारी कर रही थी तब भारत के आयकर विभाग ने रेट्रोस्पेक्टिव या पिछले वर्षों से टैक्स जांच शुरू करने का फ़ैसला किया. नतीजतन, केयर्न को सूचित किया गया कि उसे केयर्न इंडिया लिमिटेड में अपने शेष 10 प्रतिशत शेयर बेचने से प्रतिबंधित कर दिया गया है.
आयकर विभाग ने बाद में इन 10 प्रतिशत शेयरों के अधिकांश हिस्से को बेच दिया और आय और लाभांश भुगतान हासिल कर लिया.
2014 की इन घटनाओं के बाद केयर्न ने 2015 में यूके-भारत द्विपक्षीय निवेश संधि के तहत कार्रवाई शुरू की. कंपनी का कहना था कि 2014 की घटनाओं के बाद कंपनी और उसके अंतरराष्ट्रीय शेयरधारकों पर एक बड़ा हानिकारक प्रभाव पड़ा. ऐसा माना गया कि इस विवाद के कारण केयर्न को न केवल अपनी संपत्ति बेचनी पड़ी बल्कि बड़े निवेश स्थगित करने पड़े और अपने कर्मचारियों की संख्या में भारी कमी करनी पड़ी.
पांच साल से अधिक समय बीत जाने के बाद 22 दिसंबर 2020 को अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधिकरण ने केयर्न के पक्ष में एक सर्वसम्मत निर्णय दिया.
अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण ने पाया कि भारत सरकार की 2014 में शुरू की गई कार्रवाई यूके-भारत द्विपक्षीय निवेश संधि का उल्लंघन कर रही थी.
न्यायाधिकरण ने यह भी कहा कि भारत सरकार ने पिछले वर्षों के टैक्स संशोधन जारी किए वे बेहद अनुचित थे और संधि के निष्पक्ष और न्यायसंगत समाधान के मानकों का उल्लंघन करते थे.
अपने फ़ैसले में न्यायाधिकरण ने कहा कि केयर्न के ख़िलाफ़ की गई प्रवर्तन कार्रवाई के एवज़ में उसे 1.2 अरब अमेरिकी डॉलर का हर्जाना ब्याज और लागत के साथ दिया जाए. अप्रैल 2021 तक केयर्न को भुगतान में दी जानी वाली राशि 1.7 अरब अमेरिकी डॉलर थी.
भारतीय सम्पत्तियों की ज़ब्ती
अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण के फ़ैसला का सीधा मतलब यह है कि अगर भारत सरकार केयर्न का भुगतान नहीं कर पाती है तो कंपनी को 160 से अधिक देशों में भारत के स्वामित्व वाली संपत्तियों को ज़ब्त करने का अधिकार होगा.
कंपनी ने अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, सिंगापुर, मॉरीशस, फ्रांस और नीदरलैंड सहित कई अन्य देशों के न्यायालयों में भी अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण के फ़ैसले को पंजीकृत करवाया है. इसका मतलब यह है कि इन सभी देशों में केयर्न भारत सरकार की सम्पत्तियों को ज़ब्त करने के प्रक्रिया शुरू कर सकती है.
वोडाफोन मामला
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण ने भारत सरकार के ख़िलाफ़ किसी निजी कंपनी के पक्ष में इस तरह का फ़ैसला सुनाया है.
पिछले साल ब्रिटिश टेलीकॉम कंपनी वोडाफोन ने पिछले सालों के टैक्स की मांग पर भारत के ख़िलाफ़ हेग स्थित पर्मानेंट कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन में मुक़दमा जीता था. अदालत ने फ़ैसला सुनाते हुए कहा था कि भारत के कर विभाग का आचरण निष्पक्ष और न्यायसंगत व्यवहार का उल्लंघन है.
इस बात का संज्ञान लेते हुए कि वोडाफोन के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद पिछले सालों की टैक्स उगाही द्विपक्षीय निवेश संधि का उल्लंघन था अदालत ने भारत को वोडाफोन से वसूली करने का आदेश दिया था.
मौजूदा जानकारी के अनुसार भारत सरकार ने इस मामले में हेग के स्थायी न्यायालय की सिंगापुर सीट के सामने फ़ैसले को चुनौती दी है.
कॉपी - राघवेंद्र राव
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