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चीन क्या नए ‘मिसाइल साइलो’ बना रहा है जिससे अमेरिका चिंतित है
अमेरिका ने कहा है कि चीन का परमाणु हथियारों का ज़ख़ीरा बढ़ाना चिंता का विषय है और चीन को इस मुद्दे पर अमेरिका के साथ बातचीत करनी चाहिए.
अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता नेड प्राइस ने पत्रकारों से बात करते हुए गुरुवार को कहा है कि 'चीन को असंतुलित करने वाली हथियार प्रतिस्पर्धा का व्यवहारिक हल निकालने के लिए अमेरिका से बात करनी चाहिए.'
अमेरिकी अख़बार वॉशिंगटन पोस्ट ने एक रिपोर्ट में दावा किया है कि चीन अपने पश्चिमी प्रांत के रेगिस्तानी इलाक़े में सौ से अधिक मिसाइल साइलोज़ (मिसाइल रखने के ठिकाने) बना रहा है.
इसी पर पूछे गए सवाल पर नेड प्राइस ने कहा कि चीन के लिए अपने हथियारों के ज़ख़ीरे को छिपाना मुश्किल हो गया है.
उन्होंने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि चीन अपनी दशकों पुरानी न्यूनतम प्रतिरोध की परमाणु नीति से अलग रास्ता अपना रहा है.
'चीन का हथियार इकट्ठा करना चिंताजनक'
नेड प्राइस ने कहा कि 'इन रिपोर्टों और हाल के घटनाक्रम से संकेत मिलते हैं कि चीन के परमाणु हथियारों का ज़ख़ीरा तेज़ी से बढ़ेगा, और जितना पहले अनुमान लगाया गया था उससे कहीं अधिक बढ़ेगा.'
उन्होंने ये भी कहा कि हथियार इकट्ठे करना चिंताजनक है और इससे चीन के इरादों पर भी शक पैदा होता है.
नेड प्राइस ने कहा कि इससे परमाणु ख़तरों को कम करने के लिए व्यवहारिक उपायों की आवश्यकता भी रेखांकित होती है.
वहीं चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स के एक लेख में कहा गया है कि इस साल की शुरुआत से ही कुछ अमेरिकी और पश्चिमी संस्थान लगातार आकलन पेश करके दावा कर रहे हैं कि चीन अपने परमाणु हथियार बढ़ा रहा है, न्यूक्लियर ट्रायड (जमीन, आसमान और समंदर से परमाणु हथियार दागने की क्षमता) विकसित कर रहा है और नए मिसाइल साइलो बना रहा है.
ग्लोबल टाइम्स ने कहा, अमेरिका कयासों से मिली जानकारी के आधार पर ये मुद्दा उठाता रहा है. उनका मक़सद स्पष्ट है. वो चीन के परमाणु हथियारों पर जनता की राय का दबाव बनाना चाहते हैं और चीन को इस पर प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर करना चाहते हैं.
लेख में कहा गया है, उनका मक़सद चीन को अपनी परमाणु क्षमता को मज़बूत करने से रोकना है और इस पर विवाद पैदा करना है.
हालांकि अभी तक चीन ने इन रिपोर्टों पर कोई अधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है. लेकिन ग्लोबल टाइम्स को चीन की सरकार का ही मुखपत्र माना जाता है.
चीन के अख़बार की रिपोर्ट में कहा गया है कि ये स्पष्ट नहीं है कि वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट वास्तविक स्थिति के आधार पर है या नहीं.
क्या होते हैं साइलो
ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक़ चीन में आमतौर पर साइलो का इस्तेमाल लिक्विड फ्यूल इंटरकॉन्टीनेंटल मिसाइल को रखने के लिए किया जाता है. ये मिसाइलें अत्याधिक ऊर्जा पैदा करके लंबी दूरी तय करती हैं. इनमें भारी परमाणु हथियार लगे होते हैं.
साइलो में रखी मिसाइलों की मरम्मत और देखभाल आसानी से की जा सकती है और ज़रूरत पड़ने पर उन्हें आसानी से दागा जा सकता है.
वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन गांझू प्रांत के यूमेन शहर के पास रेगिस्तान में 119, एक जैसे दिखने वाले साइलो बना रहा है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन सौ से अधिक मिसाइल साइलो बना रहा है और यदि ये पूरे हो जाते हैं तो ये चीन की परमाणु नीति में ऐतिहासिक बदलाव होगा.
कयास लगाया गया है कि इन साइलो में चीन की अंतरमहादेशीय डीएफ-41 मिसाइलों को रखा जाएगा. ये मिसाइलें एक साथ कई परमाणु हथियार ले जा सकती हैं और अमेरिका तक मार कर सकती हैं.
वहीं ग्लोबल टाइम्स का कहना है कि डीएफ़-41 सॉलिड फ्यूल मिसाइल है और हाई मोबिलिटी लॉन्चर व्हिकल से लॉन्च किया जाता है.
मिसाइल साइलो किसी भी देश का टॉप सीक्रेट होते हैं. दुश्मन देशों को भ्रम में डालने के लिए नकली साइलो भी बनाए जाते हैं. चीन के ज़मीन से मार करने वाली मिसाइलों के ठिकाने कहां-कहां है ये एक नेशनल सीक्रेट है जिसके बारे में बाहरी देशों को कम ही जानकारी है.
रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिका के पास कम से कम 450 मिसाइल साइलो हैं. ज़मीन से मार करने वालीं मिसाइलें महत्वपूर्ण न्यूक्लियर डिटेरेंट (परमाणु हमला रोकना की क्षमता) होती हैं.
जिनपिंग का संदेश
हाल ही में चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी के सौ साल पूरे होने पर दिए गए भाषण में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा था कि चीन को डराने का प्रयास करने वाली विदेशी ताक़तों का सिर कुचल दिया जाएगा.
जिनपिंग ने ये भी कहा था कि चीन अपनी सैन्य शक्ति को बढ़ाएगा. जिनपिंग ने ताइवान को चीन में मिलाने और हॉन्ग कॉन्ग में सामाजिक स्थिरता लाने के प्रति भी प्रतिबद्धता ज़ाहिर की.
इस पर पूछे गए सवाल पर नेड प्राइस ने कहा कि अमेरिका ने जिनपिंग की टिप्पणी पर ध्यान दिया है. हालांकि उन्होंने कहा कि अभी इस बारे में इससे अधिक कुछ नहीं कहा जाएगा.
चीन की परमाणु शक्ति के बारे में अनुमान
पेंटागन ने अमेरिकी कांग्रेस के समक्ष 2020 में पेश रिपोर्ट में आकलन किया था कि चीन के पास 200 के क़रीब परमाणु हथियार हो सकते हैं. रिपोर्ट में ये भी कहा गया था कि चीन अपनी सेना का आधुनिकीकरण कर रहा है और इस दौरान हथियारों की संख्या दोगुनी हो सकती है.
विश्लेषकों के मुताबिक अमेरिका के पास 3800 के क़रीब परमाणु हथियार हैं. इनमें से 1357 के क़रीब हथियारों को तैनात रखा गया है.
अमेरिका चीन पर रूस के साथ हुए नए आर्म्स कंट्रोल समझौते में शामिल होने का दबाव बना रहा है. इसी साल मई में अमेरिका के अशस्त्रीकरण दूत ने एक टिप्पणी में कहा था कि चीन अपने ज़ख़ीरे को बढ़ाने के बावजूद इस समझौते में शामिल नहीं हो रहा है.
चीन ये कहता रहा है कि रूस और अमेरिका के मुक़ाबले उसके पास परमाणु हथियार बेहद कम संख्या में हैं.
चीन का तर्क है कि आपसी सम्मान और बराबरी के आधार पर होने वाली बातचीत में शामिल होने के लिए वह हमेशा तैयार है.
वहीं ग्लोबल टाइम्स ने अपने लेख में सुझाव दिया है कि चीन को पश्चिमी देशों की राय की परवाह किए बिना अपनी सुरक्षा ज़रूरतों के हिसाब से हथियार बनाने चाहिए.
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, "ये सच है कि चीन कहता रहा है कि वह न्यूनतम प्रतिरोध की नीति पर चल रहा है और उसके पास अपनी ज़रूरत के हिसाब से ही हथियार हैं. लेकिन जैसे-जैसे सुरक्षा हालात बदलेंगे, ये ज़रूरत भी बदलेगी. अमेरिका चीन को अपना शीर्ष प्रतिद्वंदी बताता रहा है, ऐसे में चीन को तेज़ी से अपनी परमाणु क्षमता बढ़ानी चाहिए ताकि अमेरिका के कूटनीतिक जोश से निबटा जा सके. चीन के पास जवाबी कार्रवाई करने की विश्वस्नीय परमाणु क्षमता होनी ही चाहिए."
कॉपी - दिलनवाज़ पाशा
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