चीन की कोरोना वैक्सीन कई देशों के लिए बनी सिर दर्द, परेशानी बढ़ी

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- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
चीन में बनी कोरोना वायरस की वैक्सीन को लेकर कई देशों में सवाल उठाए जा रहे हैं. सऊदी अरब, फिलीपींस, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैस देशों में इस वैक्सीन की मान्यता और इसके प्रभाव पर शंका जताई गई है.
इस समय चीन की दो वैक्सीन चलन में है, सिनोफार्मा और सिनोवैक. दोनों ही वैक्सीन को विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ से मान्यता भी मिल चुकी है. लेकिन, कुछ देशों की शंकाएं इसे लेकर बनी हुई हैं.
सबसे पहले सऊदी अरब तो चीन की वैक्सीन लगने का सर्टिफिकेट ही स्वीकार नहीं कर रहा है. इससे हज या कारोबार या नौकरी के लिए सऊदी अरब जाने वाले उन लोगों के लिए मुश्किल हो गई है जिन्होंने चीन की वैक्सीन लगवाई है.
सऊदी अरब भी उन देशों में है जिसने चीन में बनी वैक्सीन को मान्यता नहीं दी है.
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ सऊदी अरब ने फ़ाइज़र, एस्ट्राज़ेनेका, मॉडर्ना और जॉनसन एंड जॉनसन की कोविड वैक्सीन को अपने यहाँ मंजूरी दी है.

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पाकिस्तान की मुश्किलें
इससे पाकिस्तान के लिए भी परेशानियां बढ़ गई हैं क्योंकि वहाँ लोगों को चीन की वैक्सीन ही दी जा रही है.
पाकिस्तानी मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ गृह मंत्री शेख़ राशीद ने इस्लामाबाद में रविवार को पत्रकारों से कहा कि प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ख़ुद इस मसले पर मध्य-पूर्व के उन देशों से बात कर रहे हैं जिन्होंने चीन में बनी वैक्सीन को अब तक मान्यता नहीं दी है.
लेकिन, बात सिर्फ़ मान्यता तक नहीं है बल्कि कुछ देशों में वैक्सीन की एफिकेसी पर भी सवाल उठे हैं.

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चीन को वापस की दान में मिली वैक्सीन
फिलीपींस के राष्ट्रपति रोड्रिगो डुटार्टे को चीन की वैक्सीन लगाने को लेकर आलोचना झेलनी पड़ी थी. उन्होंने इसके लिए माफ़ी भी मांगी थी.
रोड्रिगो डुटार्टे ने चीन से दान की हुई अपनी वैक्सीन वापस लेने के लिए भी कह दिया था. इस वैक्सीन को फिलीपींस में मंज़ूरी नहीं मिली है. यहाँ सिर्फ़ सिनोवैक को मंज़ूरी दी गई है.
राष्ट्रपति रोड्रिगो डुटार्टे ने कहा कि चीन सिर्फ़ सिनोवैक वैक्सीन ही भेजे. देश में लोगों को यही वैक्सीन लग रही है.
राष्ट्रपति डुटार्टे ने बताया था कि उन्होंने कंपेशनेट यूज क्लॉज के तहत सिनोफार्मा की खुराक ली थी क्योंकि उनके डॉक्टर ने उन्हें वैक्सीन लेने की सलाह दी थी. कंपेशनेट यूज क्लॉज में कुछ लोग बहुत ज़रूरी होने परी ही अप्रमाणित दवाओं की ख़ुराक लेते हैं.
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उन्होंने लोगों से कहा कि वो उनका अनुसरण ना करें. स्थानीय मीडिया ने इसे ख़तरनाक बताया है क्योंकि इसे लेकर कोई अध्ययन नहीं है. हो सकता है कि ये शरीर के लिए सही ना हो. ये वैक्सीन लगाने वाला मुझे अकेला व्यक्ति ही रहने दें.
फिलीपींस में इस समय एस्ट्राजेनेका और सिनोवैक वैक्सीन को ही मंज़ूरी प्राप्त है. हालांकि, ये साफ़ नहीं है कि राष्ट्रपति डुटार्टे ने इन दोनों वैक्सीन का इस्तेमाल क्यों नहीं किया.
फिलीपींस दक्षिण पूर्व एशिया में सबसे ज़्यादा प्रभावित देशों में से एक है. यहाँ मई के पहले हफ़्ते तक कोरोना के लगभग 10 लाख मामले आ चुके थे और 18 हज़ार से ज़्यादा मौतें हो चुकी थीं.

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यूएई और बहरीन में फाइज़र का बूस्टर
वहीं, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन में सिनोफार्मा की दोनों डोज़ से प्रतिरक्षित हो चुके लोगों को फाइज़र का बूस्टर शॉट देने का फ़ैसला किया गया है.
इन देशों में दूसरी वैक्सीन आने से पहले शुरुआत में लोगों को सिनोफार्मा वैक्सीन दी गई थी. लेकिन, इसके बाद भी वहाँ कोरोना के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई.
बहरीन कोरोना वायरस की सबसे बड़ी लहर का सामान कर रहा है जबकि यूएई में सात महीने पहले जितने मामले थे उससे दोगुने मामले सामने आ रहे हैं.
यूएई में दिसंबर से ही लोगों को सिनोफार्मा वैक्सीन दी जा रही है जबकि फाइज़र का इस्तेमाल अप्रैल से शुरू हुआ है.
सिनोफार्मा की एफिकेसी यानी प्रभाव को लेकर चिंता जताई जाती रही है.
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ये वैक्सीन 78.1 प्रतिशत तक एफिकेसी देती है, हालांकि, शोधकर्ताओं का कहना है कि यूएई और बहरीन सहित अन्य देशों में किया गया अध्ययन बुज़ुर्गों और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए पर्याप्त नहीं.
बहरीन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि बड़े पैमाने पर वैक्सीनेशन के बावजूद जब कोरोना के मामले बढ़ने लगे तो रिस्क ग्रुप में आने वाले नागरिकों को फाइज़र की वैक्सीन की ख़ुराक दी जा रही है.
बहरीन स्वास्थ्य विभाग के अंडरसेक्रेट्री वलीद ख़लीफ़ा अल मानिया ने बताया कि अब तक चीन की सिनोफार्मा वैक्सीन बहरीन के 60 फ़ीसदी से ज़्यादा लोगों को दी जा चुकी है.
उन्होंने बताया कि गंभीर बीमारियों से पीड़ित, मोटापे के शिकार और 50 साल से अधिक उम्र वाले बहरीन के लोगों को फिर से छह मीहने बाद फाइज़र की वैक्सीन लगवाने के लिए कहा गया है.
वहीं, जिन नागरिकों को कोई टीका नहीं लगाया गया है उन्हें फाइज़र वैक्सीन दी जाएगी. हालांकि, चीन की वैक्सीन का विकल्प अब भी मौजूद है.

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सेशल्स में बढ़े कोरोना के मामले
सेशल्स में चीन की वैक्सीन सिनोफार्मा लगाने के बाद भी कोरोना संक्रमण के मामले तेज़ी से बढ़े हैं. सेशल्स में 57 प्रतिशत लोगों को सिनोफार्मा और 43 प्रतिशत को एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन दी गई है.
स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक जो भी पॉज़िटिव मामले मिले हैं उनमें से 63 प्रतिशत का वैक्सीनेशन नहीं हुआ था या उन्हें सिनोफार्मा और कोविशील्ड की एक ही डोज़ दी गई थी. लेकिन, 37 प्रतिशत नए मामलों में वैक्सीन की दोनों डोज़ दी जा चुकी थीं.
दस लाख की आबादी वाले इस देश में सबसे ज़्यादा वैक्सीनेशन हुआ था लेकिन यहाँ अचानक कोरोना के मामले बढ़ने लगे. 30 अप्रैल को जहां 120 नए मामले आए थे वहीं 7 और 8 मई को हर दिन 300 मामले सामने आने लगे थे.

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चीन ने दान की कितनी वैक्सीन
चीन अब तक कई देशों को वैक्सीन का निर्यात कर चुका हैं. कई देशों को वैक्सीन दान भी दी गई है. चीन मध्य पूर्व में कई देशों, कई यूरोपीय, एशियाई, अफ़्रिकी देशों और लैटिन अमेरिकी देशों को वैक्सीन दे चुका है.
की इस साल मार्च में आई एक ख़बर के मुताबिक चीन 53 विकासशील देशों को वैक्सीन दान कर चुका है और 27 देशों को निर्यात कर चुका है.
चीन ने लेबनान को वैक्सीन की 50 हज़ार डोज़ दी हैं. उसने अप्रैल तक 60 देशों में आठ करोड़ वैक्सीन दान या निर्यात किए हैं.
चीन के स्टेट काउंसलर और विदेश मंत्री वांग यी के हवाले से जानकारी दी गई है कि "चीन ने 69 विकसशील देशों को कोविड-19 वैक्सीन दान दी है और 43 देशों को निर्यात की है."
चीन के इतने बढ़े स्तर पर वैक्सीन के देने की वजह उसे स्टोरेज में होने वाली सहुलियत को भी बताया जाता है. सिनोफार्मा और सिनोवैक को फ्रीज़ में स्टोर किया जा सकता है. जबकि फाइज़र और मॉडर्ना वैक्सीन को कोल्ड फ्रीज़र्स में स्टोर करना होता है.
इससे वैक्सीन के स्टोरेज और वितरण में फायदा मिला है ख़ासकर की उन देशों में जहाँ तापमान ज़्यादा रहता है.
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वैक्सीन की एफिकेसी
चीन के दोनों की वैक्सीन निष्क्रिय वायरस से तैयार की गई हैं जबकि फ़ाइज़र को बनाने का तरीक़ा अलग है.
पहले कोरोना वायरस को मारकर वैक्सीन के ज़रिए शरीर में डाला जाता है. वायरस के ज़िंदा न होने के कारण वो शरीर को बीमार नहीं कर सकता.
इस मरे हुए वायरस से लड़ने के लिए हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली एंटीबॉडी बनाती है जिससे हमारा शरीर भविष्य में कोरोना वायरस से लड़ने के लिए तैयार हो जाता है.
फिलहाल चीन की वैक्सीन को लेकर पूरी तरह भरोसा कब बन पाएगा ये कहना मुश्किल है.
वहीं, सिनोवैक का कहना है कि वो 91 प्रतिशत तक प्रभावी है लेकिन बाद में किए गए ट्रायल में अलग नतीजे आए. ब्राज़ील में हाल में किए गए रिसर्च में इसे 50 प्रतिशत प्रभावी बताया गया.
फिलहाल कई देशों में चीन की वैक्सीन का अब भी इस्तेमाल हो रहा है. इससे उन देशों को मदद मिल रही है जिन्हें दूसरी जगहों से वैक्सीन नहीं मिल पाई है.
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