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हांगकांग के 'लोकतंत्र' को कैसे कुचल रहा है चीन
- Author, एंड्रीयाज़ इल्मर
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
चीन हांगकांग की चुनावी प्रक्रिया को बदल रहा है. इस शहर पर चीन के बढ़ते प्रभाव से डरने वाले लोग इसे हांगकांग के लिए एक निर्णायक मोड़ मान रहे हैं.
हाल ही में किए गए बदलाव ये सुनिश्चित करेंगे कि चीन के प्रति वफ़ादार लोग ही सत्ता तक पहुंच पाएं. जो लोग ये समझते थे कि हांगकांग में लोकतंत्र और मज़बूत होगा उनके लिए ये ताबूत में आख़िरी कील की तरह हैं.
अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों ने चीन के इस क़दम की आलोचना की है लेकिन हांगकांग में प्रतिक्रिया क्या है इसका सही आकलन करना भी आसान नहीं हैं. हांगकांग में अब अधिकतर लोग इस बारे में बात ही नहीं करना चाहते हैं.
वास्तव में, पिछले कुछ सालों में चीन के साथ रिश्तों पर हांगकांग के लोगों की राय ले पाना ही मुश्किल से मुश्किल होता जा रहा है.
'सत्तावादी शासन ऐसे ही काम करता है'
जब हांगकांग के एक मित्र के सामने ये राय रखी तो उन्होंने हंसते हुए 'लोल' (LOL) कहा और फिर एक अल्पविराम के बाद उन्होंने कहा, 'सत्तावादी शासन ऐसे ही काम करता है.'
सिंगापुर की नानयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर ली झांगयुक ने बीबीसी से कहा कि ऐसी परिस्थितियों में संवेदनशील मुद्दों पर बातचीत प्राकृतिक रूप से ख़त्म हो जाएगी.
वो कहते हैं, 'लोग स्वयं ही अपने आप पर अंकुश लगाने लगेंगे और ऐसा वो जानबूझकर करेंगे.'
वो कहते हैं, 'बहुत संभावना है कि चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी आम लोगों के बीच विश्वास ही ख़त्म कर दे. वो लोगों को दूसरे लोगों की गतिविधियों के बारे में जानकारी देने के लिए कई तरह के प्रोत्साहन दे सकते हैं.'
तो फिर देशभक्त हांगकांग में हालात कैसे हैं और लोग भविष्य को लेकर क्या सोच रहे हैं?
'हांगकांग बीस साल पीछे चला जाएगा'
नए बदलावों से विपक्ष के नेता सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं और वो ही इसके ख़िलाफ़ अभी भी बोल रहे हैं, भले ही ये कुछ समय के लिए ही हो. विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के चेयरमैन किन हीई कहते हैं कि इन बदलावों से हांगकांग बीस साल पीछे चला जाएगा.
'हम ये जानते हैं कि हमारी भागीदारी के लिए जगह पहले से बहुत कम हो गई है और हम य भी जानते हैं कि नई व्यवस्था के तहत पास होना आसान नहीं होगा.'
किन हीई दरअसल नए बदलावों की तरफ़ इशारा कर रहे थे जिनके तहत ये तय किया जाएगा कि कौन चुनाव लड़ने लायक है और कौन नहीं.
उनकी पार्टी के वित्तीय सचिव रेमोन युएन होई मान कहते हैं कि चीन का नेतृत्व हांगकांग में लोकतंत्र को कुचल रहा है और शहर के संविधान में लोगों को जो वोट देना का अधिकार मिला है उसे भी तोड़ रहा है.
हांगकांग के संविधान को बेसिक लॉ भी कहा जाता है.
लो किन हीई और दूसरे लोकतंत्र समर्थक नेताओं के सामने अब ये मुश्किल सवाल है कि क्या वो चुनावों में भागीदारी करते रहेंगे या फिर कोई दूसरा रास्ता अपनाएंगे.
नानयांग टेक्नीकल यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर ली कहते हैं कि हो सकता है उनके लिए राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव की कोई जगह ही ना बचे.
प्रोफ़ेसर ली कहते हैं, 'मुझे लगता है कि अब बहुत देर हो चुकी है. चीन की सरकार जनता के या फिर अंतरराष्ट्रीय दबाव में आकर कभी भी अपना फ़ैसला वापस नहीं लेगी.'
हांगकांग में अब लोगों से बात करना बहुत मुश्किल है, लेकिन असंभव नहीं है. आईटी सेक्टर में काम करने वाले केन लियू कहते हैं, 'हम बहुत से लोगों को शहर छोड़कर जाने की बातें करते हुए सुन रहे हैं.'
लियू कहते हैं कि वो हांगकांग में ही रहना चाहते हैं. वो कहते हैं, 'जब तक मेरे पास क़ानूनी तौर पर अपनी बात रखने का अधिकार रहेगा मैं खुलकर बोलूंगा.'
लेकिन उन्हें डर है कि बहुत से लोग अपने लिए अच्छा सोचते हुए हांगकांग को छोड़कर चले जाएंगे.
ब्रिटेन ने हांगकांग के लोगों के लिए अपने दरवाज़ें खोल दिए हैं. 1999 में हांगकांग को चीन को सौंपने से पहले पैदा हुए लोग ब्रिटेन का विशेष वीज़ा ले सकते हैं जिसके तहत आगे चलकर ब्रिटेन की नागरिकता मिलने की संभावना भी होगी.
प्रोफ़ेसर ली कहते हैं कि ये अधिकतर लोगों के लिए एक महंगा विकल्प होगा क्योंकि हांगकांग के अधिकतर आम लोगों के लिए अपनी ज़िंदगी को समेटना और फिर कहीं और जाकर बसना असंभव सा होगा.
वो कहते हैं कि भले ही बहुत से लोग चीन की तरफ से थोपे जा रहे बदलावों से नाख़ुश हों लेकिन राजनीतिक अधिकार जीवन के लिए अनिवार्य नहीं हैं.
चीन के मुख्य भूभाग के लोगों की तरफ इशारा करते हुए वो कहते हैं कि 'आर्थिक फ़ायदों के लिए राजनीतिक हितों से समझौता' करने का भी तर्क दिया जाता है क्योंकि चीन में नागरिकों ने अपने राजनीतिक अधिकारों से तब तक के लिए समझौता कर लिया है जब तक देश का नेतृत्व आर्थिक प्रगति ला रहा है.
'हांगकांग और समृद्ध होगा'
हांगकांग में अब खुले विरोध की आवाज़ों की जगह चीन का समर्थन करने वाले लोग आसानी से मिल जाते हैं.
पेनी सन एक ऑनलाइन इंफ्लुएंसर हैं जिनके सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोवर हैं. बीबीसी से बात करते हुए वो कहती हैं कि वो चीन की तरफ से किए जा रहे बदलावों का पूरा समर्थन करती हैं क्योंकि हांगकांग के राजनीतिक लोग देशभक्त होने ही चाहिए.
2019 के प्रदर्शनों की तुलना दंगों से करते हुए वो कहती हैं कि उस समय के मुकाबले वो अब अधिक स्वतंत्र महसूस करती हैं.
वो कहती हैं, 'दंगों के दौरान मुझे ये डर था कि कहीं मैं जो बोलती हूं उसकी वजह से मुझ पर ही हमले ना कर दिए जाएं. मुझे डर लगा रहता था कि कहीं मुझे कुछ हो ना जाए.'
वो कहती हैं, 'प्रदर्शनों के समय चीन का समर्थन करने वाले लोग खुलकर नहीं बोल पाते थे क्योंकि उन्हें डर होता था कि कहीं कुछ समस्या ना खड़ी हो जाए. ये वो हांगकांग नहीं था जिसे हम जानते थे.'
वो कहती हैं, 'देशभक्त राजनेता अब भी उन मुद्दों पर बात करने के लिए स्वतंत्र होंगे जो मायने रखते हैं और जो लोगों से जुड़े हैं, जैसे कि शहर की हाउसिंग की समस्या. अब हांगकांग समृद्ध होगा और हमारा जीवन पहले से बहुत बेहतर होगा.'
वहीं अन्य लोगों का ये मानना है कि ये सिर्फ़ उन लोगों के लिए ही सच होगा जिनके विचार चीन से मिले हैं, जो चीन का विरोध करते हैं उनके लिए हालात मुश्किल ही होंगे.
चीन को था प्रतिक्रिया का डर
चीन ने जिस तेजी से बदलाव लागू किए हैं उसे लेकर हांगकांग में रहने वाले बहुत से लोग और बाहर से यहां के हालात पर नज़र रखने वाले विश्लेषक हैरत में हैं. पिछले साल चीन ने नेशनल सिक्यूरिटी लॉ यानी राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून पारित किया था जो काफ़ी विवादित रहा था. इस क़ानून के तहत विरोध की भावना और विदेशी लोगों से सांठगांठ को अपराध घोषित किया गया था जिसके लिए आजीवन कारावास की सज़ा का प्रावधान किया गया है. अब सरकार चुनावों को लेकर नियम बदल रही है.
वहीं प्रोफ़ेसर ली कहते हैं कि उन्होंने उम्मीद की थी कि ये बदलाव और भी तेज़ी से किए जाएंगे. वो कहते हैं, 'चीन के नेताओं को ये डर था कि यदि वह हांगकांग पर पीछे हटते हैं तो मुख्य भूभाग में रहने वाले लोगों में भी चेन रिएक्शन हो सकता है.'
वो कहते हैं, ये हैरत की बात ही है कि चीन ने हांगकांग के प्रशासन पर हालात को काबू करने के मामले में भरोसा किया. वो कहते हैं, 'हालांक जब साल 2019 में दूसरे बड़े प्रदर्शन हुए तो वामपंथी नेताओं ने हांगकांग के मुद्दों पर सीधे दखल देने का निर्णय किया ताकि प्रजातांत्रिक प्रतिनिधित्व, सिविल नेटवर्क और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े विरोध के सूत्रों को ही ख़त्म किया जा सके.'
अब दो साल बाद चीन के ख़िलाफ़ बोलना अपराध घोषित कर दिया गया है और विपक्ष के नेताओं को आसानी से संसद के बाहर रखा जा सकता है.
प्रोफ़ेसर ली कहते हैं, 'चीन पीछे नहीं हटेगा. ये बिलकुल निश्चिंत है. कम्युनिस्ट पार्टी की सत्ता के रास्ते में वोट का अधिकार एक अवरोधक की तरह ही है.'
इस रिपोर्ट में जेफ ली और चो वाई लैम ने सहयोग किया है.
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