दुनिया जहान: डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति की कुर्सी छोड़ने के बाद क्या करेंगे?

    • Author, टीम बीबीसी हिन्दी
    • पदनाम, नई दिल्ली

वो शनिवार की सुबह थी. वक़्त था 11 बजकर 25 मिनट और जगह थी अमेरिका के वर्जीनिया में ट्रंप नेशनल गोल्फ़ कोर्स.

सफ़ेद रंग की बेसबॉल कैप लगाए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वहां मौजूद थे. उनकी टोपी पर लिखा था, 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन.'

ट्रंप तीन लोगों के साथ गंभीर क़िस्म की चर्चा में मशगूल थे. थोड़ी देर पहले ही ख़बर मिली थी कि अमेरिका का अगला राष्ट्रपति बनने की रेस में वो जो बाइडन से हार गए हैं.

कुछ देर बाद ट्रंप की कैंपेन टीम की ओर से एक लंबा बयान जारी किया गया. इसमें चुनाव नतीजों को ख़ारिज कर दिया गया.

इसके कुछ एक घंटे बाद राष्ट्रपति ट्रंप व्हाइट हाउस लौटे. उनके क़ाफ़िले को लोगों की नारेबाज़ी झेलनी पड़ी.

कड़ी सुरक्षा वाली इमारत की चाहरदीवारी पर हाथ से बने पोस्टर लगे हुए थे. एक काग़ज़ पर लिखा था, 'बेदख़ल किए जाने का नोटिस.'

झटकेपर झटका

एक जगह कई सारे काग़ज़ चस्पा किए गए थे. उन सब पर नीली, नारंगी और काली स्याही से एक ही शब्द लिखा था, 'लूज़र.'

ट्रंप की कैंपेन टीम ने कई जगह नतीजों को चुनौती दी लेकिन उनके ज़्यादातर दावे ख़ारिज हो गए. रिपब्लिकन पार्टी के आला लोगों में शुमार होने वाले कार्ल रोव का कहना है कि चुनाव के नतीजे अब नहीं बदलेंगे.

ये साफ़ है कि डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रपति की कुर्सी छोड़नी होगी. अब सवाल ये है कि वो आगे क्या करेंगे?

ट्रंप के समर्थक ही नहीं कई विशेषज्ञ भी इसे लेकर माथापच्ची में जुटे हैं और कई तरह के अनुमान लगा रहे हैं.

राष्ट्रपति ट्रंप की बेस्ट सेलर बॉयोग्राफ़ी 'ट्रंप रिवील्ड' के लिए उनका इंटरव्यू कर चुके लेखक मार्क फ़िशर की राय है कि ट्रंप को हारे हुए व्यक्ति की छवि रास नहीं आती.

छवि बचाने की रणनीति?

चुनाव नतीजों पर ट्रंप ने जो प्रतिक्रिया दी उस पर मार्क फ़िशर कहते हैं, "वो इन घटनाओं पर वैसी ही प्रतिक्रिया दे रहे हैं जैसे कि वो अपनी दूसरी नाकामियों पर देते रहे हैं. वजह ये है कि बचपन से अब तक ट्रंप को जो पहचान सबसे ज़्यादा खलती है, वो है 'लूज़र' यानी नाकाम कहा जाना."

फ़िशर आगे कहते हैं, "जीत नहीं मिलने से डोनाल्ड ट्रंप एक कमतर इंसान दिखने लगते हैं. उन्हें इस स्थिति में होना मंज़ूर नहीं होता. ऐसे में वो ख़ुद को या तो विजेता घोषित करते हैं या फिर पीड़ित या फिर दोनों".

चुनाव के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने ऐसा ही किया. उन्होंने अपनी जीत का दावा किया और ये भी ज़ाहिर करने की कोशिश की कि चुनाव में धांधली हुई है.

मार्क फ़िशर की राय में ये वो रणनीति है जिससे उन्हें 'लूज़र' के तमगे से बचाया जा सके.

मार्क फ़िशर कहते हैं कि कामयाबी को लेकर जुनून ट्रंप को विरासत में मिला है. ट्रंप के पिता ने सिखाया कि उन्हें 'सिर्फ़ जीत हासिल नहीं करनी बल्कि जीत छीन लेनी है.'

अब चुनाव में हार के मायने ये हैं कि ट्रंप को दूसरा कार्यकाल नहीं मिलेगा. अमेरिका में बीते क़रीब 30 साल से ऐसा नहीं हुआ है कि कोई राष्ट्रपति दूसरा कार्यकाल हासिल करने में नाकाम रहा हो. लेकिन मार्क का कहना है कि ट्रंप तमाम नकारात्मक भावनाओं पर क़ाबू पाते हुए इस स्थिति का मुक़ाबला करेंगे.

मार्क फ़िशर कहते हैं," ट्रंप का रुख़ क्या होगा, जब आप ये समझने की कोशिश करते हैं तो आपको एक अहम बात याद रखनी होगी. वो सिर्फ़ वर्तमान में जीते हैं. उनके लिए अतीत और भविष्य के मायने नहीं हैं. उनके पास वर्तमान में जीने की असाधारण कला है. इसलिए वो अतीत के मुश्किल भरे दौर को ख़ारिज करते जाते हैं. मसलन, चाहे वो हार जाएं, उनकी कंपनी दीवालिया हो जाए, उनका कारोबार नाकाम हो जाए, उनके वैवाहिक जीवन में दिक्क़त आ जाए. जो चला गया वो उसके बारे में नहीं सोचते हैं."

वो आगे कहते हैं, "जब आप उनसे इसके बारे में पूछते हैं तो उनके चेहरे पर पहेली का भाव होता है. वो पूछते हैं कि आप इस बारे में मुझसे क्यों पूछ रहे हैं, ये सब तो पहले ही गुज़र चुका है. जो दौर चल रहा है, वो उसी पल में होंगे. बाक़ी दूसरे लोगों की तरह वो अपनी हार से चिपके नहीं रहेंगे."

कितना आसान होगा हैंडओवर?

ट्रंप चाहे हार मंज़ूर करें या नहीं, उनका कार्यकाल 20 जनवरी को ख़त्म हो जाएगा. अब उन्हें निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन को सत्ता सौंपनी है और ये काम कितना आसान या मुश्किल होने जा रहा है?

यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्सस में इतिहास और जन मामलों के प्रोफ़ेसर जेरेमी सूरी इस सवाल का जवाब देते हैं.

वो कहते हैं, "मैं लोगों को याद दिलाता हूं कि पहले भी कुर्सी सौंपे जाने के दौरान दिक्क़तें देखने को मिली हैं."

जेरेमी सूरी राष्ट्रपतियों के बीच सत्ता सौंपे जाने से जुड़ी जानकारियों का अध्ययन करते हैं और उनकी राय है," जो शख्स राष्ट्रपति रहा हो, उसके लिए ये एक मुश्किल वक़्त होता है. उन्हें हर दिन बताया जाता हो कि आप दुनिया के सबसे ताक़तवर व्यक्ति हैं और एक दिन चुनाव के बाद उन्हें पता चलता है कि उन्हें वो तमाम ताक़त किसी और को सौंप देनी है."

जो बाइडन की टीम सत्ता हस्तांतरण की योजना पर कई महीने से काम कर रही है. लेकिन अभी बाइडन ने राष्ट्रपति का कार्यभार नहीं संभाला है. जेरेमी सूरी कहते हैं कि जब तक ट्रंप कुर्सी पर हैं उनके पास बहुत शक्तियां होंगी और वो बाइडन की टीम की योजनाओं को प्रभावित कर सकते हैं.

'राजनीतिक असर ख़त्म'

वो कहते हैं, "चुनाव से पहले राष्ट्रपति के तौर पर ट्रंप के पास जो शक्तियां थीं, वो अब भी मौजूद हैं. देखा जाए तो वो अमरीकी सेना को जंग के मैदान में भेज सकते हैं. वो आपातकालीन फ़ंड भेज भी सकते हैं और उस पर रोक भी लगा सकते हैं. कई ऐसे मोर्चे हैं जहां राष्ट्रपति ने कोई फ़ैसला लिया तो उसका असर लाखों लोगों की ज़िंदगी पर लंबे अर्से तक दिख सकता है."

ये सही है कि ट्रंप के पास शक्तियां हैं लेकिन राजनीतिक तौर पर उनका असर ख़त्म सा हो गया है. जेरेमी सूरी कहते हैं कि जो लोग लोग ट्रंप के लिए काम करते हैं, वो जानते हैं कि 20 जनवरी के बाद वो उन्हें बचाने के लिए नहीं होंगे. दूसरी बात ये है कि वो किसी दीर्घकालिक योजना को लेकर कोई वादा नहीं कर सकते क्योंकि वो उसे पूरा करने के लिए कुर्सी पर नहीं रहेंगे.

हालांकि, जेरेमी सूरी ये भी दावा करते हैं कि राष्ट्रपति के रूप में बचे कार्यकाल के दौरान अगर डोनाल्ड ट्रंप कुछ भी नहीं करते हैं तो वो आने वाले प्रशासन को ज़्यादा नुक़सान पहुंचा सकते हैं.

दोहराया जाएगा इतिहास?

जेरेमी सूरी कहते हैं, "ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि पद छोड़ने वाले राष्ट्रपति आने वाले राष्ट्रपति के लिए तब सबसे ज़्यादा नुक़सानदेह होते हैं जब वो कोई क़दम ही नहीं उठाते. इस मामले में हर्बर्ट हूवर और फ्रेंकलिन रुज़वेल्ट का उदाहरण देखा जा सकता है. 1932 के चुनाव के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था गिर रही थी. बैंक नाकाम हो रहे थे और बंद हो रहे थे. फ़ेडरल रिज़र्व ने राष्ट्रपति हूवर से मदद की गुज़ारिश की. उन्होंने इनकार कर दिया. इसका नतीजा ये हुआ कि अमेरिका के लाखों नागरिकों ने अपनी जीवन भर की बचत गंवा दी."

वो आगे कहते हैं, "मुझे आशंका है कि कहीं ये भी वैसा ही दौर साबित न हो. सर्दियों के मौसम में अमेरिका में कोविड संक्रमण बढ़ गया है. शुरुआती मदद के बाद से इस मामले में कोई संघीय सहायता उपलब्ध नहीं हुई है. अगर अपने कार्यकाल के आख़िरी महीनों में ट्रंप कोई कदम नहीं उठाते हैं तो हज़ारों और लोग वायरस की चपेट में आ सकते हैं. हज़ारों लोगों की नौकरियां और जान जा सकती हैं. जो नुक़सान होगा उसकी भरपाई नामुमकिन होगी."

क्षमादान

इस बीच ऐसे अनुमान भी लगाए जा रहे हैं कि डोनाल्ड ट्रंप इस दौर का इस्तेमाल ख़ुद को और अपने करीबियों को महफ़ूज़ बनाने के लिए कर सकते हैं. इसके लिए वो राष्ट्रपति के पास मौजूद क्षमादान की शक्ति का इस्तेमाल कर सकते हैं. हालांकि वो ऐसा करने वाले पहले राष्ट्रपति नहीं होंगे. उनके पहले जॉर्ज एचडब्लू बुश और बिल क्लिंटन ऐसा कर चुके हैं. ट्रंप भी अपने दोस्त रोजर स्टोन समेत दूसरे लोगों को माफी दे चुके हैं.

लेकिन किसी राष्ट्रपति ने ख़ुद को माफ़ी दी हो, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. क्या ऐसा मुमकिन है, ये एक पेचीदा क़ानूनी सवाल है. अगर ट्रंप के पास ऐसा करने की शक्ति हो तो भी इस रास्ते में कई रुकावटें हैं.

जेरेमी सूरी इन रुकावटों को गिनाते हुए कहते हैं, "पहली बात तो ये है कि आप किसी को ऐसे अपराध के लिए क्षमा नहीं कर सकते जिसके आरोप अब तक नहीं लगाए गए हों और राष्ट्रपति ट्रंप और उनके परिवार के सदस्यों पर अभी आरोप तय नहीं हुए हैं. सबसे अहम बात ये है कि राष्ट्रपति उन्हीं मामलों में क्षमादान दे सकते हैं जिनमें संघीय स्तर पर अपराध के आरोप तय हुए हों. राज्य स्तर पर जिन अपराधों के आरोप तय हुए हैं, उनमें माफी नहीं मिल सकती है."

राष्ट्रपति ट्रंप के ख़िलाफ़ महाभियोग लाया गया था तब उनकी कुर्सी सलामत रही. लेकिन आर्थिक मोर्चे पर भी वो कई सवालों का सामना कर रहे हैं. ऐसे में आगे क्या हो सकता है?

क्या जेल जाएंगे ट्रंप?

इस सवाल का जवाब सूसन हेनेसी देती हैं, जो वाशिंगटन के ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट में सीनियर फ़ेलो हैं. सूसन अमेरिकी राष्ट्रपति को हासिल कार्यकारी शक्तियों से जुड़े मामलों की विशेषज्ञ भी हैं.

सूसन हेनेसी कहती हैं, "राष्ट्रपति ट्रंप 20 जनवरी को जैसे ही कुर्सी छोड़ेंगे, उन्हें राष्ट्रपति के तौर पर मिलने वाली इम्युनिटी ख़त्म हो यानी क़ानूनी कवच हट जाएगा. अमेरिका के राष्ट्रपति के पास विशेष शक्तियां होती हैं. वो जाँच प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं जो लोग उनके ख़िलाफ़ गवाही दे सकते हैं, वो उन्हें प्रभावित कर सकते हैं. लेकिन कम ही वक़्त में ये शक्तियां जाने वाली हैं. "

जेरेमी सूरी के मुताबिक़ राष्ट्रपति सिर्फ़ संघीय अपराधों के मामले क्षमादान दे सकते हैं. सूसन का कहना है कि ऐसे मामलों की एक लंबी लिस्ट है जो इस दायरे से बाहर हैं और ट्रंप के पद से हटते ही शुरु हो सकते हैं.

वो कहती हैं, "राष्ट्रपति के कारोबार से जुड़े वित्तीय और टैक्स मामलों की राज्य स्तर पर कई जाँच होनी है. कुछ गंभीर मामले भी हैं. इनमें मानहानि के मामले प्रमुख हैं. महिलाओं ने राष्ट्रपति ट्रंप पर यौन दुर्व्यवहार के आरोप लगाए हैं. अब वो राष्ट्रपति पर मुक़दमे कर रही हैं."

आर्थिक मामले

संघीय स्तर पर भी कई अनसुलझे मामले हैं. जो राष्ट्रपति के तौर पर उनके कार्यकाल से जुड़े हैं. सूसन कहती हैं कि सवाल बतौर राष्ट्रपति शक्तियों के दुरुपयोग को लेकर भी हैं.

लेकिन उन पर मुक़दमा चलाए जाने की कितनी संभावना है, इस सवाल पर सूसन हेनेसी कहती हैं, "मुझे लगता है कि इस बात की संभावना कम है कि अमेरिका की संघीय सरकार राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ आपराधिक आरोप लगाए. इसकी एक बड़ी वजह ये है कि वो नहीं चाहेंगे कि ऐसी राय बने कि ऐसी जांच राजनीति से प्रेरित है. बाइडन प्रशासन ऐसा करने में हिचकेगा. राज्यों के स्तर पर अलग स्थिति हो सकती है. ख़ासकर न्यूयॉर्क में ट्रंप ऑर्गनाइजेशन से जुड़ी जांच के मामले में. लेकिन वहां आपराधिक आरोप लगाए जाएं, इसकी संभावना भी कम है. वहां धोखाधड़ी और टैक्स से जुड़े सिविल मामले दायर हो सकते हैं. हालांकि, अभी हमारे पास सही जानकारी नहीं है. हम अनुमान के आधार पर कह रहे हैं. ज़रूरी ये है कि इस बारे में स्पष्ट जानकारी हो."

डोनाल्ड ट्रंप के कई दुश्मन उम्मीद लगाए बैठे हैं कि वो जेल जाएंगे. सूसन हेनेसी को इसे लेकर संदेह है. उनका कहना है कि ट्रंप को जेल जाने की चिंता शायद ही होगी. अगर डोनाल्ड ट्रंप अपने ख़िलाफ़ दायर कोई सिविल केस हार जाते हैं तो भी उन्हें जेल नहीं जाना होगा. ऐसे मामलों में आर्थिक दंड लगाया जाता है. उनके आर्थिक मामलों को लेकर भी अटकलें लगाई जा रही हैं.

क़र्ज़ का बोझ

सूसन हेनेसी कहती हैं, "राष्ट्रपति के टैक्स से जुड़े जो दस्तावेज़ लीक हुए हैं, वो सीमित हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स ने उन टैक्स रिटर्न पर रिपोर्ट की है. लेकिन ये राष्ट्रपति के बीते कई दशक के वित्तीय लेन देने की सीमित तस्वीर ही सामने लाता है. टैक्स क़ानून और बैंक धोखाधड़ी मामलों के विशेषज्ञों ने इशारा किया है कि उनकी राय में इन दस्तावेज़ों में दिक्क़तों की जानकारी मिलती है. इनमें गंभीर अनियमितताएं हैं. लेकिन इसके मायने ये नहीं हैं कि राष्ट्रपति अभी किसी तरह के क़ानूनी मामले का सामना कर रहे हैं लेकिन भविष्य में उन पर लाखों डॉलर की देनदारी आ सकती है."

जाँच के ज़रिए जानकारी मिली है कि 2016 और 2017 में संघीय आयकर के तौर पर सिर्फ़ 750 डॉलर का भुगतान किया गया. अब मीडिया ट्रंप के वित्तीय मामलों की छानबीन में जुटी है.

सूसन हेनेसी का ये भी कहना है कि न्यूयॉर्क टाइम्स को जो दस्तावेज़ मिले हैं, उनसे लगता है कि राष्ट्रपति पर लाखों डॉलर क़र्ज़ है.

ट्रंप का अगला मिशन

उधर, डोनाल्ड ट्रंप अपने वित्तीय मामलों को लेकर किए गए दावों को हंसी में उड़ा चुके हैं. ट्रंप के मुताबिक उन पर जो क़र्ज़ है, वो उनकी कुल हैसियत के मामूली हिस्से के बराबर है. ट्रंप की आर्थिक स्थिति चाहे जैसी हो लेकिन तमाम दूसरे पूर्व राष्ट्रपतियों की तरह उन्हें कुछ ऐसा कामकाज तलाशना होगा जो वो व्हाइट हाउस छोड़ने के बाद कर सकें.

लेकिन, वो क्या हो सकता है? द स्पेक्टेटर मैगज़ीन की वॉशिंगटन एडिटर अंबर एथी की मानें तो ट्रंप दूसरे राष्ट्रपतियों की तरह नहीं रहेंगे. वो ख़ामोशी के साथ लोगों की नज़रों से दूर नहीं होंगे.

डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति पर अंबर ने क़रीबी नज़र रखी है. उनकी राय में ट्रंप राजनीति के केंद्र रहना पसंद करते हैं और अगले एक या दो साल इसी स्थिति में रहना चाहेंगे.

'राजनीति में बने रहेंगे'

वो कहती हैं, "ट्रंप राजनीति में बने रहना चाहेंगे. चाहे वो किसी मुद्दे को उठाएं, मीडिया के जरिए ऐसा करें या फिर दूसरे चुनावों में लोगों की मदद करें."

अमेरिका में ऐसी चर्चाएं भी शुरू हो चुकी हैं कि डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर राष्ट्रपति उम्मीदवार बन सकते हैं. रिपब्लिकन पार्टी में उनकी आवाज़ सबसे बुलंद और लोकप्रिय है. अमेरिका के लाखों लोगों के लिए वो एक हीरो हैं.

अंबर एथी कहती हैं, "अभी लोग सोच रहे हैं कि वो 2024 में उम्मीदवार होंगे. जो लोग राष्ट्रपति के क़रीब हैं, उनका कहना है कि वो रिपब्लिकन पार्टी में इतने लोकप्रिय हैं कि उनके लिए ऐसा करना आसान होगा. लेकिन चार साल एक लंबा अर्सा है. उस स्तर का राजनीतिक जोश बनाए रखना मुश्किल है. खासकर जब आप किसी पद पर न हों. इसलिए उन्हें राजनीति में सक्रिय रहने के दूसरे रास्ते तलाशने होंगे. ताकि वो लोगों की नज़र में बने रहें और पार्टी पर भी उनका प्रभाव बना रहे.इस तरह की बातें सुनने में आ रही हैं कि ट्रंप मीडिया कंपनी शुरू कर सकते हैं. नाम हो सकता है ट्रंप टीवी."

बाक़ी है करिश्मा

याद करें तो सितंबर में चुनाव प्रचार के दौरान नॉ़र्थ केरोलाइना की एक रैली में मौजूद लोगों से राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा था कि अगर वो जो बाइडन से चुनाव हार गए तो पता नहीं वो क्या करेंगे? उनका कहना था कि ऐसी स्थिति होने पर वो कभी दोबारा उन लोगों से मुख़ातिब नहीं होंगे. वो उन्हें कभी दिखाई नहीं देंगे.

अंबर बताती हैं कि राष्ट्रपति चुनाव के बाद 2024 के संभावित उम्मीदवारों को लेकर एक सर्वेक्षण हुआ. उसमें माइक पेंस सबसे ज़्यादा लोकप्रिय थे. डोनाल्ड ट्रंप दूसरे नंबर पर थे. उन्हें क़रीब 25 फ़ीसदी वोट हासिल हुए.

ये ज़ाहिर करता है कि डोनाल्ड ट्रंप फ़िलहाल जिस भी मुक़ाम पर ठहरें लेकिन अपने लाखों समर्थकों के दम पर वो एक प्रभावी आवाज़ बने रहेंगे.

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