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अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव 2020: ट्रंप या बाइडन, किसकी जीत चाहता है चीन
- Author, जॉन सडवर्थ
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, बीजिंग
अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में चीन की वामपंथी सरकार की लंबे समय से दिलचस्पी रही है और ये उसके लिए परेशानी का कारण भी बनता रहा है.
अमरीकी चुनावों को कई बार लोकतांत्रिक व्यवस्था में सबसे अहम चुनाव कहा जाता है. इस चुनाव पर चीन के सरकारी अधिकारियों की क़रीब से नज़र रहती है.
हालांकि, चीन में मीडिया कवरेज पूरी तरह से नियंत्रित है और उनके अपने लोगों के पास अपना राजनीतिक भविष्य चुनने के भी बहुत कम विकल्प हैं.
बात अगर अमरीकी चुनाव की करें तो इस पर बढ़ती कोरोना वायरस महामारी, कमज़ोर अर्थव्यवस्था और गहरे राजनीतिक धुव्रीकरण का प्रभाव है. क्योंकि जिस तरह से दुनिया की सबसे समृद्ध अर्थव्यवस्था ने कोरोना महामारी के आगे घुटने टेक दिए उसकी उम्मीद नहीं थी.
वहीं, चीन ने शुरुआत में भले ही कोरोना वायरस के संकट को छिपाने की कोशिश की लेकिन इसके बाद वहां कड़े लॉकडाउन, सख़्त नियमों और बड़े स्तर पर टेस्टिंग की गई और इससे बहुत हद तक महामारी पर क़ाबू पाया गया.
अब वहां फ़ैक्ट्री, दुकानें, रेस्टोरेंट, स्कूल और विश्वविद्यालय खुल चुके हैं. सार्वजनिक वाहन चल रहे हैं. सड़कों पर भले ही लोग औसत से कम हों लेकिन ये एकमात्र ऐसी अर्थव्यवस्था है जो इस साल संकुचन के बजाय वृद्धि कर रही है. चीन में पिछले महीने आयोजित हुए कार शो भी इसी की एक बानगी हैं.
लेकिन, ये सबकुछ बिना किसी बातचीत और सार्वजनिक चर्चा के हुआ.
यहां तक कि कड़ी सेंसरशिप और लगा दी गई. लोगों को सरकार के किसी भी फ़ैसले पर अपनी सहमति या असहमति ज़ाहिर करने की इजाज़त ही नहीं थी.
हालांकि, चीन जिस तरह महामारी से उभरकर निकला है उसे चीन की वामपंथी पार्टी अपनी उपलब्धि मानती है. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पिछले महीने स्वास्थ्यकर्मियों के लिए आयोजित एक इवेंट में कह चुके हैं कि चीन को कोविड-19 की लड़ाई से जो बड़ी रणनीतिक उपलब्धि मिली है वो चीन की वामपंथी पार्टी के नेतृत्व की श्रेष्ठता को दिखाती है.
चीन और अमरीका के संबंध
चीन के साथ संबंध बढ़ाने को लेकर लगभग हर अमरीकी राष्ट्रपति की सोच रही है कि ये सिर्फ़ चीन के फ़ायदे में नहीं बल्कि ये अमरीका और पूरी दुनिया के हित में है.
ये सोच भी रही है कि ये न सिर्फ़ वैश्विक समृद्धि को बढ़ाएगा बल्कि चीन को उदारवादी वैश्विक व्यवस्था की ओर ले जाएगा. साथ ही उसे राजनीतिक सुधार करने के लिए भी प्रेरित करेगा.
लेकिन, असल में चीन इसे बहुत अलग तरीक़े से देखता है. वह वैश्विक मंच पर अपनी शर्तों पर अपनी सही जगह का दावा करने के एकमात्र उद्देश्य के साथ चलता है.
2016 के अमरीकी चुनाव के दौरान चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था और अमरीका के लिए सबसे बड़ा निर्यातक देश था. अब चीन पर अपनी कंपनियों के ज़रिए डेटा चोरी करने से लेकर वीगर मुसलमानों को प्रताड़ित करने तक के आरोप लग चुके हैं.
चीन के साथ व्यापार और अन्य संबंध बढ़ाने को लेकर पहले ही कमज़ोर पड़ती सहमति 2016 के चुनाव के बाद पूरी तरह ख़त्म हो गई है.
चीन पर आक्रामक डोनाल्ड ट्रंप
डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता में आते ही ये संदेश दे दिया कि चीन आर्थिक सुपरपावर बनने के लिए मुक्त-व्यापार प्रतिबद्धताओं का पालन नहीं कर रहा है. इस कारण कई अमरीकियों को नौकरियां भी गंवानी पड़ी हैं.
राष्ट्रपति तब से लेकर अब तक इसी बात को दोहरा रहे हैं.
ट्रंप के कार्यकाल में चीन और अमरीका के बीच एक लंबा व्यापार युद्ध चला और दोनों देशों ने बढ़-चढ़कर एक-दूसरे के उत्पादों पर टैरिफ़ लगाए.
इस साल अमरीकी राष्ट्रपति चीन को लेकर और आक्रामक हो गए. डोनाल्ड ट्रंप ने चीन पर कोरोना वायरस की गंभीरता को छुपाने और जैविक हथियार बनाने के आरोप लगाए.
साथ ही वो वीगर मुसलमानों के संदर्भ में बार-बार चीन में मानवाधिकार हनन का मसला भी उठाते रहे हैं.
अमरीका ने हॉन्ग-कॉन्ग में हो रहे विरोध प्रदर्शनों पर चीन की कार्रवाई का विरोध भी किया है. अमरीका दूसरे देशों से गठजोड़ बनाकर भी चीन को घेरने की कोशिश में लगा हुआ है.
ऐसे में चीन के नेताओं के पास विकल्प हो तो वो डोनाल्ड ट्रंप को दुबारा सत्ता में नहीं लाना चाहेंगे.
अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसियों का निश्चित तौर पर ये कहना है कि चीन को लेकर डोनाल्ड ट्रंप के सख़्त रुख़ को देखते हुए चीन की वामपंथी सरकार उन्हें दोबारा सत्ता में नहीं देखना चाहती.
लेकिन, बीजिंग की शिंघुआ यूनिवर्सिटी में इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंटरनेशनल रिलेशंस के डीन, प्रोफ़ेसर यैन स्वीतॉन्ग ऐसा नहीं मानते.
वे कहते हैं, "अगर आप मुझसे पूछेंगे कि चीन के हित किसके साथ हैं तो मेरी प्राथमिकता जो बाइडन की बजाए डोनाल्ड ट्रंप होंगे."
"इसलिए नहीं कि ट्रंप चीन को कम नुक़सान पहुँचाएंगे बल्कि इसलिए कि वो ख़ुद अमरीका के लिए बाइडन के मुक़ाबले ज़्यादा नुक़सानदायक साबित होंगे."
चीन में विशेषज्ञ साफ़तौर पर ये मानते हैं कि अमरीका का आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमज़ोर होना एक उभरती ताक़त के तौर पर चीन के लिए फ़ायदेमंद है.
कुछ जानकार ये भी कहते हैं कि चीन को विश्वास है कि अमरीका के वैश्विक प्रभुत्व को ख़त्म करने में कोरोना वायरस और राष्ट्रपति ट्रंप दोनों की भूमिका होगी.
इस नज़रिए से देखें तो डोनाल्ड ट्रंप चीन के लिए बेहतर विकल्प हैं. इसकी वजह ये नहीं कि राष्ट्रपति ट्रंप लोकतांत्रित मूल्यों का समर्थन करते हैं बल्कि इसलिए कि वो ख़ुद इन मूल्यों को ख़ारिज कर देते हैं.
उदाहरण के लिए स्वतंत्र मीडिया पर डोनाल्ड ट्रंप के हमले चीन को एक मधुर संगीत की तरह लगते हैं क्योंकि वहां ख़ुद मीडिया और इंटरनेट पर कड़ा सरकारी नियंत्रण हैं.
वहीं, जब ट्रंप प्रशासन चीन पर मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप लगाता है तो उसके पीछे की वजह व्यापार और आर्थिक फ़ायदे नज़र आते हैं.
डोनाल्ड ट्रंप के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन के मुताबिक़, राष्ट्रपति ट्रंप ने एक बार शी जिनपिंग को कहा था कि वो वीगर मुसलमानों की प्रताड़ना को लेकर अपनी सहमति देते हैं. हालांकि, राष्ट्रपति ने इस आरोप से इनकार कर दिया था.
जो बाइडन बन सकते हैं मुश्किल
डोनाल्ड ट्रंप चीन के साथ मज़बूत आर्थिक संबंधों का समर्थन करने को लेकर जो बाइडन की आलोचना करते आए हैं.
लेकिन, चीन को ये भी डर हो सकता है कि जो बाइडन लोकतांत्रिक मूल्यों पर खड़े रहने के मामले में उसके लिए ज़्यादा ख़तरनाक साबित हो सकते हैं.
जो बाइडन अलग-थलग रहने वाले राष्ट्रपति ट्रंप की बजाए लोकतांत्रिक सहयोगियों के साथ संबंध बेहतर बनाकर और गठबंधन के ज़रिए चीन पर दबाव बना सकते हैं.
जो बाइडन मानवाधिकारों के मामले में चीन के लिए सख़्त रुख़ अपना सकते हैं लेकिन वो टैरिफ़ को लेकर नरम पड़ सकते हैं. साथ ही वो जलवायु परिवर्तन जैसे मसलों पर भी सहयोग के इच्छुक हो सकते हैं जिसका चीन फ़ायदा उठा सकता है.
चीन और अमरीकी महत्वकांक्षाएं
अमरीका में इसी साल चीनी स्टूडेंट्स के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. अमरीकी प्रशासन को चीनी स्टूडेंट्स के सेना के साथ संबंधों होने का संदेह था.
लेकिन, इस प्रतिबंध को कुछ अमरीकी शिक्षाविद अमरीकी प्रशासन का एक फ़ोबिया मानते हैं. उन्हें लगता है कि अमरीका बेवजह विदेशी स्टूडेंट्स से डर रहा है.
इसका नतीजा क्रिश्चन जी नाम के एक स्टूडेंट को भुगतना पड़ा. वह अमरीकी राज्य अरीज़ोना में कंप्यूटर सांइस की पढ़ाई कर रहे थे लेकिन प्रतिबंधों के कारण पिछले महीने उनका वीज़ा रद्द कर दिया गया.
क्रिश्चन एक अंडरग्रेजुएट स्टूडेंट हैं और प्रतिबंधों के दायरे में नहीं आते लेकिन ग़लती से उनका भी वीज़ा रद्द हो गया. हालांकि, बाद में वीज़ा बहाल कर दिया गया.
इन परेशानियों के चलते क्रिश्चन डोनाल्ड ट्रंप के लिए तो नाराज़गी ज़ाहिर करते हैं लेकिन अमरीका के लिए उनके विचार अब भी पहले जैसे हैं.
वह कहते हैं, "मुझे अमरीका का माहौल बहुत पसंद है. यहां चीन के मुक़ाबले कम प्रदूषण है और शिक्षा विचारों पर आधारित है. जबकि चीन में ये सही या ग़लत में बंटी हुई है."
ये इस बात का संकेत है कि भले ही चीन में माना जा रहा है कि पश्चिमी लोकतंत्र ख़तरे में है लेकिन अब भी वहां कई लोग अमरीकी मूल्यों में भरोसा करते हैं.
चीन की वामपंथी सरकार कोरोना वायरस पर नियंत्रण का श्रेय अपनी एक पार्टी वाली राजनीतिक व्यवस्था को देती है लेकिन कई लोकतांत्रिक देश भी हैं जो महामारी पर क़ाबू पाने में सफल हुए हैं.
दरअसल, चीन के शासक सिर्फ़ एक चुनाव के बारे में नहीं सोच रहे बल्कि वो एक युग के अंत पर विचार कर रहे हैं जिसमें अमरीकी प्रभुत्व ना रहे.
जबकि अमरीका फिर से ख़ुद को दुनिया के माथे पर चमकते सितारे की तरह देखना चाहता है जिसका चीन को सबसे ज़्यादा डर है.
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