अमरीका लगाएगा ईरान पर फिर से प्रतिबंध

ट्रंप प्रशासन ने कहा है कि ईरान पर जो संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध लगे थे, वे फिर से लगाए जाएंगे और हथियारों पर लगा पुराना प्रतिबंध अक्तूबर में खत्म नहीं होगा.

ट्रंप सरकार में ईरान के लिए प्रतिनिधि एलियट अब्राम्स ने बताया कि शनिवार-रविवार रात 12 बजे से ही ये प्रतिबंध फिर से लागू हो जाएंगे.

लेकिन चीन, रूस और अमरीका के अपने यूरोपीय सहयोगी भी इस फ़ैसले का विरोध कर रहे हैं.

क्या है ये प्रतिबंध

मार्च 2007 में सुरक्षा परिषद ने ईरान पर हथियारों के व्यापार को लेकर प्रतिबंध लगा दिया था.

परिषद ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम में शामिल सभी लोगों के आने-जाने पर भी प्रतिबंध लगा दिया था और उनकी संपत्ति को भी फ़्रीज़ कर दिया था.

2010 में भी प्रतिबंध लगाया गया कि ईरान भारी हथियार नहीं खरीद सकता जैसे हमलावर हेलीकॉप्टर और मिसाइलें.

ईरान का परमाणु समझौता

साल 2015 में ईरान ने अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, रूस और जर्मनी के साथ समझौता (जेसीपीओए) किया था जिसके मुताबिक़ ईरान अपने परमाणु कार्यक्रमों को सीमित करेगा और उसके बदले उस पर लगे संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाएंगे.

इसी जेसीपीओए समझौते के मुताबिक़ हथियारों पर लगा प्रतिबंध अक्तूबर 2018 में ख़त्म होना था.

लेकिन उससे पहले 2018 में अमरीका की ट्रंप सरकार ने इस समझौते से खुद को बाहर कर लिया. लेकिन बाकी देशों का मत था कि वे इस समझौते को मानने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

अमरीका पहुंचा सुरक्षा परिषद

इस मामले पर अमरीका के अपने सहयोगी भी उसके साथ नहीं आ रहे हैं.

ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी ने शुक्रवार को सुरक्षा परिषद से कहा कि 20 सितंबर से ईरान को संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों से राहत मिलेगी. रॉयटर्स के मुताबिक़ इन देशों के प्रतिनिधियों ने सुरक्षा परिषद को एक चिट्ठी लिखकर अपनी राय बताई है.

अमरीका ने पिछले महीने सुरक्षा परिषद में इस प्रतिबंध को आगे बढ़वाने की कोशिश की थी लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. अमरीका का कहना था कि ईरान ने 2015 के समझौते का उल्लंघन किया है.

यहां तक कि अमरीका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने अपने सहयोगी देशों पर ही आरोप लगाया कि वे ईरान का साथ दे रहे हैं.

20 अगस्त को 'स्नैपबैक' की घोषणा कर दी जिसका मतलब था एक महीने बाद ईरान के ख़िलाफ़ सब प्रतिबंधों को फिर से लगाना.

लेकिन जानकार कहते हैं कि अमरीका के इस फ़ैसले का कोई क़ानूनी आधार नहीं है.

अगस्त में सुरक्षा परिषद में अध्यक्ष इंडोनेशिया ने कहा भी था कि परिषद इस मामले पर कोई कार्रवाई करने की स्थिति में नहीं है क्योंकि देशों के बीच सहमति ही नहीं बनी.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के 15 सदस्यों में से 13 सदस्य इस फ़ैसले को अमान्य ठहरा रहे हैं और राजनयिकों का भी कहना है कि कम ही देश इन प्रतिबंधों को दोबारा लगाएंगे.

क्या करेगा अब अमरीका

पोम्पियो ने इस हफ़्ते कहा था कि हम ये सुनिश्चित करने के लिए हर चीज़ करेंगे कि ये प्रतिबंध लगाए जाएं.

"हम हर वो चीज़ करेंगे...हमने किया भी है...कि ईरान चीनी टैंक और रूसी डिफेंस सिस्टम नहीं खरीद पाएगा."

इस वजह से अतंरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव बढ़ गया है.

अमरीका चाहे तो संयुक्त राष्ट्र के किसी प्रस्ताव को ना मानने के लिए किसी देश या संस्था पर प्रतिबंध लगा सकता है जैसे अपने बाज़ारों में उन्हें एंट्री ना देकर या कोई और ऐसा फ़ैसला जिससे आर्थिक तौर पर नुक़सान हो.

हालांकि सिर्फ़ अमरीका को ही लगता है कि संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध अब भी जारी हैं. वो खुद को 2015 के समझौते से अलग भी कर चुका है और स्नैपबैक लगाने के लिए इस समझौते में खुद को शामिल भी समझ रहा है.

उसका तर्क है कि समझौते में तो अमरीका का नाम अब भी लिखा है.

रॉयटर्स न्यूज़ एजेंसी को ईरान के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि ईरान परमाणु समझौता बनाए रखेगा इस उम्मीद में कि आने वाले चुनावों में जो बाइडन जीत जाएं और समझौते को बचा लेंगे.

बाइडन ने ही ओबामा सरकार के दौरान इस समझौते पर काम किया था. बाइडन के कैंपेन प्रवक्ता एंड्रयू बेट्स का कहना है कि वो इस समझौते में दोबारा शामिल होंगे अगर ईरान सख्ती से समझौते का पालन करता है तो.

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