अफ़ग़ानिस्तान में सिख समुदाय किन मुश्किलों से गुज़र रहा है?

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- Author, तारेंद्र किशोर
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
हाल ही में अफ़ग़ानिस्तान में एक सिख नेता निदान सिंह सचदेवा को क़रीब एक महीने तक बंधक बनाकर रखने के बाद 18 जुलाई को रिहा किया गया था. उन्हें अगवा करने का आरोप अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान पर लगाया गया था, लेकिन तालिबान ने इस आरोप से इनकार किया है.
हाल के वर्षों में अफ़ग़ानिस्तान में सिख और हिंदू समुदाय के लोगों पर हमले बढ़े हैं और उनकी संख्या में तेज़ी से गिरावट आई है. सिख और हिंदू अफ़ग़ानिस्तान में बहुत छोटे अल्पसंख्यक समुदाय हैं.
भारत के विदेश मंत्रालय ने अब बयान दिया है कि, "भारत ने अफ़ग़ानिस्तान में अपनी सुरक्षा को लेकर ख़तरा महसूस कर रहे हिंदू और सिख समुदाय के लोगों को भारत वापस आने में सहायता प्रदान करने का फ़ैसला किया है."
मंत्रालय ने अपने बयान में चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में बाहरी समर्थन के बलबूते चरमपंथियों का अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाना और उनका उत्पीड़न करना गंभीर चिंता का विषय है.
इस साल ही मार्च के महीने में काबुल के एक गुरुद्वारे पर चरमपंथी हमला हुआ था, जिसमें कम से कम 25 लोगों की मौत हो गई थी. इस्लामिक स्टेट ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली थी. दो साल पहले भी अफ़ग़ानिस्तान में सिखों पर इस्लामिक स्टेट ने हमला किया था, जिसमें 19 लोग मारे गए थे.
कौन हैं निदान सिंह सचदेवा

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55 साल के निदान सिंह सचदेवा का परिवार 1990 में ही अफ़ग़ानिस्तान से भारत आ गया था. वो दिल्ली में रहते हैं लेकिन वो अक़्सर अफ़ग़ानिस्तान जाया करते हैं. जब उन्हें अगवा किया गया था तब वो चमकनी ज़िले के गुरुद्वारा में सेवा कर रहे थे.
अगवा होने के बाद उनकी पत्नी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर मदद मांगी थी. उन्होंने अपनी चिट्ठी में ये आशंका जताई थी कि चरमपंथियों ने उनके पति को अगवा कर लिया है.
जंग का ख़ामियाजा भुगतना पड़ा है सिखों को

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अफ़ग़ानिस्तान के जंग का ख़ामियाजा वहाँ रह रहे सिख समुदाय को बड़े पैमाने पर उठाना पड़ा है. सिख परिवार बड़ी तदाद में सुरक्षित स्थान की तलाश में दूसरे देशों में जाकर बस गए.
बीबीसी अफ़ग़ान सेवा के सईद अनवर काबुल से बताते हैं, "जंग शुरू होने से पहले अफ़ग़ानिस्तान में सिखों की अच्छी तदाद थी. काबुल के अलावा कंधार, ग़ज़नी, नंगरहार, खोस्त और पक्तिया जैसे प्रांतों में सिखों के कारोबार और ज़मीन थे लेकिन जंग शुरू होने के बाद जैसे कई दूसरे लोग देश छोड़ कर चले गए वैसे ही सैकड़ों सिख दूसरे देश जाने पर मजबूर हो गए. इनमें से कुछ यूरोपीय देशों में तो कुछ भारत चले गए. ज़्यादातर सिख समुदाय के लोग यहाँ से धीरे-धीरे चले गए."
वो बताते हैं कि सिखों की अफ़ग़ानिस्तान में मज़बूत मौजूदगी रही है लेकिन जंग से पहले 70 के दशक में भी इनकी एक बड़ी संख्या देश छोड़कर चली गई थी. अब यहाँ सिखों के कुछ सौ परिवार ही बचे रह गए हैं.
वो कहते हैं, "माना जाता है कि क़रीब 30-40 साल पहले अफ़ग़ानिस्तान में लगभग ढाई लाख सिख समुदाय के लोग रहते थे. उस दौरान सिख समुदाय के लोग सरकारी नौकरियों और राजनीति में भी थे. सिख अफ़ग़ान की आर्मी में जनरल के ओहदे पर भी रह चुके हैं."
अफ़ग़ानी समाज में अहम मौजूदगी रही है सिखों की
सिख सदियों से अफ़ग़ानी समाज का हिस्सा रहे हैं. अफ़ग़ानिस्तान के व्यापारिक जगत में सिखों का मज़बूत दखल रहा है. वो कभी साहूकारी के काम से भी जुड़े हुए थे.
राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में भी सिखों की एक अहम मौजूदगी अफ़ग़ानिस्तान के अंदर रही है. जंग के बाद इसमें भी बहुत कमी आई है.
सईद अनवर बताते हैं, "ज़्यादातर पढ़े-लिखे लोग जो हुकूमत में थे, वो अफ़ग़ानिस्तान से चले गए. सिखों को प्रतिनिधित्व देने को लेकर तीन साल पहले अफ़ग़ानिस्तान की हुकूमत ने पहली बार फ़ैसला किया कि संसद में एक सीट सिखों के लिए रिज़र्व होगी. इसके बाद पहली बार एक सिख सांसद बना है. उनका नाम नरिंदर सिंह खालसा है. इसके अलावा छोटे स्तरों पर भी कुछ सिखों का नुमाइंदगी है."
राजनीति में आने से पहले नरिंदर सिंह खालसा पेशे से एक व्यापारी थे और राजनीति का कोई तजुर्बा उनको नहीं था. वो अवतार सिंह खालसा के बड़े बेटे हैं.
अवतार सिंह खालसा ने अफ़ग़ानिस्तान में 2018 में संसदीय चुनाव के लिए नामांकन किया था लेकिन नामांकन के कुछ ही दिन बाद 2018 के जून में जलालाबाद में हुए एक आत्मघाती हमले में उनकी मौत हो गई थी.
पिता की मौत के बाद नरिंदर सिंह खासला ने हिंदू और सिख समुदाय के सहयोग से उनकी जगह पर संसदीय चुनाव के लिए नामांकन किया था. अवतार सिंह खालसा ने बीबीसी को दिए अपने आख़िरी इंटरव्यू में कहा था, "अपने परिवार के आठ लोगों को अब तक खो चुका हूं और अगर बाक़ी 14 लोगों को अफ़ग़ानिस्तान के लिए जान देनी पड़ी तो हम इसके लिए पीछे नहीं हटेंगे."
"हम इसी मुल्क में रहेंगे और कभी अफ़ग़ानिस्तान छोड़कर नहीं जाएँगे. अपने वतन के लिए सीने में गोली खाने पर हमें गर्व होगा."
अफ़ग़ानिस्तान में हिंदू और सिख चुनाव में पूरे देश में केवल एक ही सीट के लिए चुनाव लड़ सकते हैं.
अफ़ग़ानिस्तान में जंग के बाद आई नई हुकूमत में एक दशक पहले अनारकली कौर होनरी सीनेट सदस्य बनी थीं.
अफ़ग़ान सरकार की ओर से उठाए गए क़दम

अफ़ग़ान सरकार ने सिखों पर हो रहे इस प्रताड़ना को देखते हुए कुछ क़दम भी उठाए हैं.
सईद अनवर बताते हैं कि कई प्रांतों में सिखों के लिए अलग स्कूल तीन-चार सालों में बनाए गए हैं. जंग के दौरान सिखों के गुरुद्वारे तोड़ दिए गए थे. अफ़ग़ान हुकूमत ने इस साल फैसला किया है कि इन गुरुद्वारों को फिर से बनाने के लिए राष्ट्रीय बजट में स्पेशल फ़ंड दिया जाएगा.
सिख समुदाय के जो लोग अपनी जायदाद छोड़कर बाहर चले गए हैं, उनकी ज़मीनों और घरों का क्या हुआ.
इस बारे में सईद अनवर बताते हैं, "जिन सिखों का पूरा खानदान यहाँ से चला गया है, उनकी ज़मीन और घर पर माफ़िया लोगों ने क़ब्ज़ा कर लिया है. पिछले दो सालों से अफ़ग़ान सरकार इस कोशिश में लगी हुई है कि इन ज़मीनों को माफ़िया से छुड़ाया जाए ताकि दोबारा से अगर ये सिख परिवार आएँ, तो उन्हें उनकी संपत्ति वापस दी जाए. इस बाबत गर्वनरों को हिदायत भी दी गई है. पिछले दो सालों में ख़ोस्त और पक्तिया में कुछ सिख परिवार वापस भी आए हैं."
क्या धर्म परिवर्तन भी है मुद्दा

पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यक समुदायों का ज़बरन धर्म परिवर्तन कराने का मुद्दा अक़्सर सुर्ख़ियों में रहता है. क्या मुस्लिम बहुल देश अफ़ग़ानिस्तान में भी कोई यह मुद्दा है.
सईद अनवर बताते हैं कि यहाँ अफ़ग़ानों के साथ हिंदू और सिख अल्पसंख्यकों का रिश्ता बेहद दोस्ताना है. यहाँ यह ख़्याल भी नहीं है कि किसी का ज़बरत धर्म परिवर्तन करवाया जाए.
वो बताते हैं, "यहाँ जितने यहूदी रहते थे, वो सब अफ़ग़ानिस्तान छोड़कर चले गए लेकिन सिर्फ़ एक यहूदी काबुल में बचा रह गया है. उसकी इबादतगाह काबुल में है और वो अकेला उसमें जाकर अपनी इबादत करता है. पिछले दो दशकों से ऐसी कोई शिकायत मुझे यहाँ नहीं दिखी है जिसमें मजहब बदलने को लेकर दबाव की बात कही गई हो."
पिछले साल दिसंबर में भारत की संसद में नागरिकता संशोधन क़ानून पारित किया गया था, जिसका मक़सद पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से आए ग़ैर-मुसलमान अवैध प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्रदान करना है.
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