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BREXIT: यूरोपीय संघ से अलग हुआ ब्रिटेन, ख़त्म हुआ 47 साल का नाता
ब्रिटेन आधिकारिक तौर पर यूरोपीय संघ से अलग हो गया है. इसके साथ ही दोनों के बीच के लगभग आधी सदी पुराने रिश्ते का अंत हो गया है.
ब्रिटेन के मतदाताओं ने साढ़े तीन साल पहले यूरोपीय संघ से अलग होने के लिए हुए जनादेश दिया था जिसे ब्रेग्ज़िट कहा गया.
23 जून 2016 को जनमत संग्रह में 52 प्रतिशत मतदाताओं ने ब्रेग्ज़िट का समर्थन और 48 प्रतिशत ने इसका विरोध किया था.
31 जनवरी 2020 को ब्रिटेन की घड़ी में रात के 12 बजने के साथ ही ब्रिटेन यूरोपीय संघ से अलग हो गया.
इस ऐतिहासिक मौक़े पर लंदन में जहाँ ब्रेग्ज़िट के समर्थकों ने बड़ी संख्या में संसद के पास जमा होकर इसका स्वागत किया. वहीं स्कॉटलैंड में इसके विरोध में कैंडल-मार्च निकाला गया. स्कॉटलैंड के मतदाताओं ने यूरोपीय संघ में बने रहने के लिए मतदान किया था मगर पूरे देश की राय इससे अलग आई.
क्या कहा ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने
2016 में ब्रेग्ज़िट पर हुए जनमत संग्रह के बाद ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने की प्रक्रिया शुरु हुई मगर इसमें काफ़ी अड़चनें आईं और तब से ब्रिटेन में दो बार प्रधानमंत्री भी बदले.
ब्रेग्ज़िट पर आए फ़ैसले के फ़ौरन बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने प्रधानमंत्री का पद छोड़ दिया था.
इसके बाद टेरीज़ा मे देश की प्रधानमंत्री बनीं जिनका मुख्य दायित्व ब्रेग्ज़िट को लागू करवाना था.
मगर ब्रेग्ज़िट की शर्तों पर संसद का समर्थन हासिल ना हो पाने के बाद उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा और फिर ये ज़िम्मेदारी वर्तमान प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के पास आई.
बोरिस जॉनसन ने ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने के एक घंटे पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो संदेश जारी किया जिसमें उन्होंने लिखा -
"बहुत सारे लोगों के लिए ये उम्मीद की एक बहुत बड़ी घड़ी है, ऐसी घड़ी जो उन्हें लगा था कि कभी नहीं आएगी."
"हालांकि बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो चिंतित हैं और नुकसान होने जैसा महसूस कर रहे हैं."
"निश्चत रूप से एक तीसरा समूह भी है जो सबसे अधिक परेशान था कि आख़िर ये राजनीतिक गतिरोध कभी ख़त्म भी होगा या नहीं."
''मैं सभी की भावनाओं को समझता हूं और बतौर सरकार ये हमारी ख़ासतौर पर मेरी ज़िम्मेदारी है कि मैं इस देश को साथ लेकर चलूं और इसे आगे बढ़ाऊं.''
क्या-क्या हुआ?
ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने के मौक़े पर जगह-जगह पार्टियाँ हुईं.
लंदन के पार्लियामेंट स्क्वायर के पास सैकड़ों लोग जमा हुए और उन्होंने देशभक्ति के गाने गाए और समर्थकों ने भाषण दिए.
उधर बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ के संस्थानों से ब्रिटेन का झंडा हटा दिया गया है.
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के कार्यालय और आवास 10, डाउनिंग स्ट्रीट पर विशेष लाइट जलाई गई.
साथ ही इस मौक़े पर 50 पेंस का एक विशेष सिक्का भी जारी किया गया.
वैसे ब्रेग्ज़िट लागू होने के बावजूद कई पुराने क़ानून पहले की ही तरह रहेंगे. मसलन, दिसंबर तक ब्रिटेन और यूरोप के बीच आवाजाही यथास्थिति बनी रहेगी.
साढ़े तीन साल पहले हुआ था फ़ैसला
साल 2016 में ब्रेक्ज़िट के तहत फ़ैसला लेने के लिए जनमत संग्रह कराया गया था.
इस सिलसिले में हुए जनमत संग्रह में यूरोपीय संघ से अलग होने का 51.9 प्रतिशत लोगों ने समर्थन किया था जबकि 48.1 प्रतिशत ने ईयू के साथ रहने का समर्थन किया.
लेकिन क्या वजहें रहीं कि लोगों ने ईयू से अलग होने का समर्थन किया.
1. आर्थिक चेतावनी से चिढ़ गए लोग
ईयू से अलग होने को लेकर आर्थिक चेतावनियां धीमे धीमे शुरु हुईं लेकिन फिर इन चेतावनियों की बाढ़ सी आ गई. ईएमएफ़, ओईसीडी, आईएफ़एस, बिज़नेस प्रमोशन से जुड़ी सीबीआई जैसी बड़ी-बड़ी वित्तीय संस्थाओं ने चेताया कि आर्थिक स्थिति ख़राब होगी, बेरोज़गारी बढ़ेगी और ब्रिटेन अलग-थलग पड़ जाएगा.
यहां तक कि तत्कालिक अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और तब के ब्रितानी वित्त मंत्रालय ने भी ईयू से अलग होने के नुक़सान बताए. ईयू के साथ रहने का समर्थन करने वाले कई लोग मानते हैं कि ये चेतावनियां कुछ ज़्यादा ही हो गईं.
अब माना जाता है कि लोग इन चेतावनियों से चिढ़े और इस पूरे मामले को व्यवस्था के खिलाफ़ एक क्रांति के तौर पर लिया. लोगों का ये भी मानना था कि जो लोग चेतावनी दे रहे हैं ईयू के साथ रहने में उनके हित जुड़े हुए हैं. नतीजा ये हुआ कि उन्होंने ईयू से अलग होने पर मुहर लगाई.
2. राष्ट्रीय स्वास्थ्य स्कीम का 350 मिलियन पाउंड ब्रिटेन को मिलेगा
ईयू से अलग होने वालों को एक बहुत ही मज़बूत नारा मिला. वो ये कि अगर ब्रिटेन ईयू से हटता है तो हर हफ्ते राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना के लिए 350 मिलियन पाउंड की राशि ब्रिटेन इस्तेमाल कर सकेगा.
हालांकि जांच से पता चलता है कि ये सही आकड़ा नहीं है लेकिन अलग होने वालों के लिए ये एक ज़बर्दस्त राजनीतिक नारा रहा क्योंकि आकड़ा बड़ा था. समझने में आसान था और लोगों से जुड़ा हुआ था.
3. प्रवासियों के मुद्दे को प्रमुखता से उठाना
यूके इंडिपेंडेंस पार्टी यानी यूकिप के प्रमुख नाइजल फ़राज ने प्रवासियों के मुद्दे को ज़ोर शोर से उठाया था. आगे चलकर ये मु्द्दा ब्रिटेन की संस्कृति, पहचान और राष्ट्रीयता से जुड़ता चला गया.
परिणाम दिखाते हैं कि पिछले दस साल में दूसरे देशों से ब्रिटेन में आकर बसने वालों की बढ़ती संख्या से स्थानीय लोग बहुत प्रसन्न नहीं हैं. संभवत उन्होंने आने वाले 20 सालों में बढ़ते प्रवासियों के प्रभाव के बारे में सोचा होगा और अलग होने का निर्णय किया होगा.
4. लोगों ने प्रधानमंत्री की बात सुननी बंद कर दी
तत्कालिक प्रधानमंत्री डेविड कैमरन का क़िस्मत ने साथ नहीं दिया.
ईयू के साथ रहने के अभियान का वो प्रमुख चेहरा थे और उन्होंने इस पूरे मसले को प्रधानमंत्री पर भरोसे से जोड़ दिया था. कहने का मतलब ये है कि उन्होंने इस मुद्दे पर अपना राजनीतिक करियर दांव पर लगाया और इसी कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा.
5. लेबर पार्टी मतदाताओं से जुड़ने में नाकामयाब
ईयू में साथ रहने के अभियान को हमेशा से ही लेबर पार्टी के मतदाताओं का समर्थन चाहिए था लेकिन शायद ही ऐसा हुआ. इस मसले पर आगे लंबा पोस्टमार्टम चलेगा.
लेबर पार्टी के नेता अपने मतदाताओं का मूड तक ठीक से भांप नहीं सके. हालांकि जब तक उन्हें समझ में आया और उन्होंने इसका सामना करने के लिए प्रवासियों पर नियंत्रण जैसे क़दम सुझाए तब तक देर हो चुकी थी.
6. बोरिस जॉनन और माइक गोव जैसे नेताओं का ईयू से अलग होने को समर्थन देना
ऐसा अक्सर होता है कि किसी बड़े मुद्दे को कुछ बड़े नेता समर्थन देते हैं लेकिन बोरिस जॉनसन और माइकल गोव जैसे बड़े नेताओं ने अलग होने को समर्थन देकर मुद्दे को और बड़ा कर दिया.
जहां जॉनसन ने मतदाताओं से अलग होने की अपील को लेकर पूरे ब्रिटेन में बस से यात्राएं कीं वहीं गोव ने ईयू से अलग होने के बाद ब्रिटेन का एजेंडा क्या होगा. इसका मसौदा तैयार करने में समय लगाया.
7. बुजुर्ग मतदाताओं ने एक साथ वोटिंग की
मतदान कैसे हुआ, जवानों ने महिलाओं ने कैसे वोट किया इस पर एक्सपर्ट्स चर्चा करते रहेंगे लेकिन एक बात बिल्कुल स्पष्ट दिखी कि बुजुर्गों ने एकसाथ जमकर वोट किया और उन्हीं के वोट से जीत मिली है.
ये सच है कि आप जितने बुजुर्ग होते हैं आप वोटिंग को लेकर उतने ही ज़्यादा जागरूक भी हो जाते हैं. 2015 के चुनाव में 65 साल से ऊपर की उम्र वाले 78 प्रतिशत लोगों ने वोट दिया था.
8. यूरोप हमेशा से थोड़ा सा दूसरे ग्रह जैसा रहा
ब्रिटेन और यूरोप के संबंध कभी भी अच्छे और सामान्य नहीं रहे.
यूरोपीय समुदाय से जुड़ने में भी ब्रिटेन को भी बहुत समय लगा. 1975 में वोटिंग के दौरान भी ब्रिटेन बहुत प्रसन्न नहीं था.
हालांकि ये माना जाता है कि युवा ईयू के समर्थक हैं लेकिन वोटों के विश्लेषण के बाद ही ये स्पष्ट हो पाएगा.