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बदली दुनिया बदले समीकरण, कब बदलेगा संयुक्त राष्ट्र
- Author, संदीप सोनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दूसरा विश्वयुद्ध ख़त्म हो चुका था, लेकिन लड़ने वाले देशों से तबाही का धुआं अभी भी उठ रहा था. लड़ाई के ज़ख़्म सहलाते देश अब शांति चाहते थे.
शांति की तलाश में 50 से अधिक देश सेन फ्रांसिस्को में एकजुट हुए और उन्होंने एक दस्तावेज़ पर दस्तख़त किए.
ये दस्तावेज़ एक चार्टर था, जिससे एक नए संगठन का जन्म हुआ. तारीख़ थी 24 अक्तूबर साल 1945.
आज सारी दुनिया इसे संयुक्त राष्ट्र संघ के नाम से जानती है.
51 देशों के साथ अपने सफ़र की शुरुआत करने वाला संयुक्त राष्ट्र अब एक विशाल परिवार बन चुका है. इस परिवार में आज 193 सदस्य हैं. लेकिन दबदबा हमेशा पांच सदस्यों का रहा है.
संप्रभुता का अहसास
चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमरीका- ये पांच देश मिलकर सुरक्षा परिषद कहलाते हैं. संयुक्त राष्ट्र में इन्हीं देशों की तूती बोलती है.
बाकी सदस्यों को अपनी बात कहने का मौका साल में एक बार मिलता है, जब संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य सालाना विमर्श के लिए न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय में एकजुट होते हैं.
संयुक्त राष्ट्र के इस सालाना आयोजन में हर सदस्य देश को अपनी बात कहने के लिए 15 मिनट मिलते हैं. चर्चा होती है दुनिया को बेहतर कैसे बनाया जाए, आने वाली चुनौतियों से कैसे निपटा जाए.
भारत के पूर्व विदेश मुचकुंद दुबे को संयुक्त राष्ट्र को क़रीब से जानने-समझने का मौक़ा मिला.
मुचकुंद दुबे बताते हैं, ''जलवायु परिवर्तन एक बहुत बड़ा विषय है लेकिन 10-15 साल पहले संयुक्त राष्ट्र में कोई इसकी बात तक नहीं कर रहा था. दुनिया में यही एकमात्र मंच है जिसमें ग़रीब से ग़रीब देशों के नेताओं को अपनी बात कहने का मौक़ा मिलता है. ये मंच उन्हें अपनी संप्रभुता का अहसास कराता है. अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में इस अहसास की बड़ी भूमिका है.''
वीटो पर झगड़ा
संयुक्त राष्ट्र के आम सदस्य और सुरक्षा परिषद के पांच स्थाई सदस्यों के बीच ज़मीन-आसमान का फ़र्क रहा है.
मुचकुंद दुबे इसकी वजह बताते हुए कहते हैं, ''संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव बुतरस बुतरस घाली ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि जहां संयुक्त राष्ट्र को वाकई काम करना था, वहां उसको काम नहीं करने दिया गया. स्थायी सदस्यों ने संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में ये सुनिश्चित किया है कि ये संगठन उसी हद तक जाए जो उनके हित में है. यही वजह है कि बीते 20-25 साल में संयुक्त राष्ट्र में जो सुधार हुए हैं, वो असल मुद्दों को छोड़कर हुए हैं.''
संयुक्त राष्ट्र की असल ताक़त सुरक्षा परिषद में हैं और सुरक्षा परिषद के सदस्यों की असल ताक़त वीटो शक्ति में है. किसी भी मुद्दे पर किसी एक सदस्य के वीटो का मतलब है बात आगे नहीं बढ़ेगी.
संयुक्त राष्ट्र का दावा है कि वैश्विक शांति और सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का पालन, मानवाधिकारों की रक्षा और लोकतंत्र को बढ़ावा देने में उसकी अहम भूमिका है.
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफेसर एसडी मुनि का मानना है कि जो विषय और मुद्दे संयुक्त राष्ट्र के मंच पर होना चाहिए, उनमें से कई मुद्दे उसके दायरे से बाहर निकल गए हैं.
प्रोफेसर मुनि कहते हैं, ''संयुक्त राष्ट्र की अवधारणा विश्व में शांति और स्थिरता के मुद्दे पर की गई थी और इसी एक बड़े मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र अपनी चुनौती पर खरा नहीं उतर पाया है. चरमपंथ से लड़ाई में संयुक्त राष्ट्र का कहीं कोई बड़ा सहयोग नहीं है. इसी तरह जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा ज़रूरतों के बड़े मुद्दे संयुक्त राष्ट्र से बाहर हल करने की कोशिश हो रही है.''
संयुक्त राष्ट्र में लोकतंत्र
संयुक्त राष्ट्र भले ही ख़ुद को एक लोकतांत्रिक ताक़त बताता हो, लेकिन इसके भीतर लोकतंत्र पर ही सवाल उठते रहे हैं.
सुरक्षा परिषद के विस्तार का मुद्दा इन्हीं सवालों के दायरे में आता है.
भारत के पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दुबे कहते हैं, ''अमरीका चाहता है कि विस्तार हो तो उसमें चार-पांच से ज्यादा नए सदस्य ना हों. लेकिन इतनी कम संख्या से दुनिया के विकासशील देशों का सही प्रतिनिधित्व नहीं हो सकता. स्थाई सदस्य चाहते हैं कि नए सदस्य यदि बनाए जाएं तो उन्हें वीटो करने का अधिकार नहीं दिया जाए. जबकि वो ख़ुद अपना वीटो अधिकार छोड़ने के लिए तैयार नहीं होंगे.''
प्रोफेसर मुनि वीटो पॉवर से निपटने का एक तरीका सुझाते हैं, ''किसी मुद्दे पर दो स्थाई सदस्यों में विरोध हो तो उसे संयुक्त राष्ट्र महासभा में लाया जाए. बहुमत के फ़ैसले को माना जाए और उसे सुरक्षा परिषद उसे लागू करे. लेकिन संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली में इतना बड़ा परिवर्तन कभी हो पाएगा, ये भी अपने आप में एक बड़ा सवाल है.''
जानकार मानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र में वीटो का सदुपयोग कम दुरुपयोग अधिक हुआ है. जानकार ये भी कहते हैं कि तमाम आलोचनाओं के बावजूद संयुक्त राष्ट्र अपरिहार्य और कई मायनों में अद्वितीय संगठन है, लेकिन इसमें सुधार की बहुत अधिक आवश्यकता है.
सुरक्षा परिषद में विस्तार से सुधार की शुरुआत की जा सकती है. 74 वर्षों में दुनिया की ज़रूरतें बहुत बदल गई हैं और बदलते समीकरणों में संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली को बदलना भी अनिवार्य हो गया है.
वैश्विक शांति, सुरक्षा, मानवाधिकारों की रक्षा, संघर्ष वाले क्षेत्रों में मानवीय मदद, अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का पालन, जलवायु परिवर्तन और सतत विकास जैसे लक्ष्यों की पूर्ति के लिए संयुक्त राष्ट्र को किसी साफ्टवेयर की तरह अपडेट करने की ज़रूरत है.
विफलताएं
सफलता की तमाम कहानियों के बीच संयुक्त राष्ट्र की विफलताएं अक्सर छिप जाती हैं और उन पर ज्यादा बात भी आमतौर पर नहीं होती है.
पच्चीस साल पहले अफ्रीका के रवांडा में 100 दिन के भीतर लगभग आठ लाख लोगों की हत्या कर दी गई.
इस नरसंहार के दौरान संयुक्त राष्ट्र के शांति रक्षक रवांडा में मौजूद थे. लेकिन उनकी भूमिका सरकारी अधिकारियों और हमवतन लोगों को निकालने तक सीमिति थी.
संयुक्त राष्ट्र की बड़ी नाकामी का दूसरा चेहरा यूरोप में सरबेनीसा में नज़र आया.
जुलाई 1995 में, बोस्नियाई सर्ब सुरक्षाबलों ने सरबेनीसा में आठ हज़ार से अधिक मुसलमानों की हत्या कर दी.
मारे गए लोगों ने उस जगह पनाह ली थी, जहां उन्होंने संयुक्त राष्ट्र शांति-रक्षकों के पहरे में ख़ुद को महफ़ूज़ समझा था.
दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप की धरती पर इतने बड़े पैमाने पर सामूहिक हत्या का ये पहला मामला था.
इसी तरह यूगोस्लाविया के संघर्ष में संयुक्त राष्ट्र की सुस्ती साफ़ नज़र आई. वियतनाम और इराक़ युद्ध में संयुक्त राष्ट्र को पूरी तरह से दरकिनार किया गया.
सीरिया में गृहयुद्ध के दौरान भी संयुक्त राष्ट्र शांति वार्ता की राह खोलने में नाकाम रहा. कई मौकों पर ऐसा भी हुआ जब संयुक्त राष्ट्र, समाधान के बजाए समस्या का हिस्सा बना.
यहां तक कि ब्लू हैलमेट वाले शांतिरक्षकों पर बलात्कार के गंभीर आरोप लगे. इन तमाम घटनाओं की पृष्ठभूमि में संयुक्त राष्ट्र को अपनी कार्यप्रणाली के बारे में विचार करना चाहिए.
लेकिन ऐसा कम ही देखने को मिलता है जब संयुक्त राष्ट्र को इसके लिए वक्त मिला हो.
संयुक्त राष्ट्र, सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की बीच अक्सर अखाड़े की शक़्ल में नज़र आया है जहां एक तरफ़ अमरीका-ब्रिटेन और दूसरी तरफ़ रूस-चीन देखे गए हैं.
खेमों में बंटे सुरक्षा परिषद की झलक उसके आम सदस्यों में भी नज़र आती है. नतीजा ये होता है कि भारत जब सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता की दावेदारी करता है, तो पाकिस्तान इसका विरोध करता है और अपने लिए भी यही दर्जा मांगता है.
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