जब अमरीका ने ग्रीनलैंड के लिए लगाई थी 100 मिलियन डॉलर की बोली

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हाल में अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को ख़रीदने की इच्छा ज़ाहिर की थी. उनका कहना था कि अमरीका दुनिया के सबसे बड़े द्वीप को ख़रीद ले तो उन्हें अच्छा लगेगा.

ट्रंप के इस बयान पर कई लोगों ने आश्चर्य जताया है.

इस संबंध में अख़बार में एक लेख पढ़ने के बाद अमरीकी रेडियो ओनपीआर पर डेनमार्क के लिए पूर्व अमरीकी राजदूत रूफ़स गिफोर्ड कहते हैं, "मुझे इतनी हंसी आई कि मेरी आंखों में पानी आ गया."

अख़बार वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार ट्रंप का ये कहना कि उत्तर अटलांटिक और आर्कटिक के बीच के इस द्वीप को अमरीका को खरीदना चाहिए, ये बयान "थोड़ा संजीदा भी है और नहीं भी."

देश के कई और अख़बारों ने भी इस बयान को प्रकाशित किया. हालांकि कुछ ने कहा कि ट्रंप मज़ाक कर रहे थे, जबकि कुछ का कहना था कि ट्रंप इस मामले में बिल्कुल संजीदा हैं.

इधर ग्रीनलैंड के अधिकारियों ने ने तुरंत की ट्रंप के बयान का उत्तर दिया है, "हम व्यवसाय के लिए खुले तैयार हैं, लेकिन आपको बता दें कि हम बिकाऊ नहीं है."

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फिलहाल चर्चा का मुद्दा जो कुछ भी हो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ये पहली बार नहीं है जब अमरीका ने ग्रीनलैंड को खरीदने की इच्छा दिखाई है.

रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण इलाक़ा

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अमरीका के ग्रीनलैंड को ख़रीदने की बात सबसे पहली बार 1860 के दशक में चर्चा में आई थी. उस वक्त एंड्र्यू जॉनसन अमरीका के राष्ट्रपति हुआ करते थे.

1867 में अमरीकी विदेश विभाग की एक रिपोर्ट आई थी जिसमें कहा गया था कि ग्रीनलैंड अमरीका के लिए रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण है. साथ ही यहां पर बड़ी मात्रा में संसाधन भी उपलब्ध हैं जिस कारण अमरीका इसे ख़रीद ले तो इसका लाभ होगा.

इस रिपोर्ट में लिखा था कि "राजनीतिक तौर पर और व्यापार के लिए अमरीका को आइसलैंड और ग्रानलैंड को ख़रीद लेना चाहिए."

काफी बड़ा समुद्रतट होने के कारण ग्रीनलैंड की फिशिंग इंडस्ट्री (मत्स्य उद्योग) बहुत बड़ा है. यहां कई बड़े बंदरगाह हैं और यहां की ज़मीन के नीचे कोयला का ज़खीरा दबा हुआ है. इसके अलावा कीमती खनिजों में भी ग्रीनलैंड भरपूर है जिसका लाभ दुनिया में अमरीका के प्रभुत्व को बढ़ाने के लिए किया जा सकता है.

हालांकि, इस संबंध में किसी तरह का "औपचारिक प्रस्ताव" 1946 तक नहीं पेश किया गया.

बिज़नेस इनसाइडर में छपी एक ख़बर के अनुसार इसके सालों बाद पूर्व राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने डेनमार्क को ख़रीदने के लिए 10 करोड़ डॉलर (सोने में) की पेशकश की थी. आज के हिसाब से क़रीब 130 के बराबर होगी.

समाचार एजेंसी एपी के अनुसार राष्ट्रपति रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण ग्रीनलैंड के कुछ इलाकों के बदले वो अलास्का के कुछ हिस्सा देने के बारे में सोच रहे थे.

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क्यों अहम है ग्रीनलैंड

  • ग्रीनलैंड दुनिया का बारहवां सबसे बड़ा भूभाग और दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है. ये एक भूभाग यूनाइटेड किंगडम से क़रीब दस गुना बड़ा है.
  • 20 लाख वर्ग किलोमीटर का ये इलाका पत्थरों से भरा हुआ है और बर्फ़ की चादर से ढका रहता है.
  • हालांकि यहां की जनसंख्या काफ़ी कम है. इस बड़े भूभाग में मात्र 57 हज़ार लोग रहते हैं.
  • ग्रीनलैंड एक स्व-शासित देश है लेकिन ऊपरी तौर पर डेनमार्क का उस पर नियंत्रण है. ग्रीनलैंड के पास अपनी अलग सरकार है.
  • ग्रीनलैंड के बजट का दो तिहाई हिस्सा डेनमार्क देता है. बाक़ी की आय का मूल स्रोत मत्स्य उद्योग है.
  • ग्रीनलैंड के प्राकृतिक संसाधन, जैसे कोयला, तांबा, जस्ता और लौह-अयस्क है जिस कारण कई कंपनियों की दिलचस्पी इस इलाके में है.
  • ग्रीनलैंड में आत्महत्या और शराबखोरी के मामले बहुत अधिक हैं. इसके साथ ही यहां बेरोज़गारी भी चरम पर है.
  • माना जा रहा है जलवायु परिवर्तन का सीधा असर ग्रीनलैंड पर पड़ रहा है. यहां जमी बर्फ़ की चादर तेज़ी से पिघल रही है जिस कारण यहां की ज़मीन के नीचे के प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंच की उम्मीद भी बढ़ रही है.
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'ग्रीनलैंड बन गया था ख़तरनाक'

औपचारिक तौर पर ग्रीनलैंड को खरीदने का सबसे पहला प्रस्ताव नवंबर 1945 को आया था.

उस वक्त रिपब्लिक पार्टी से सीनेटर ने कहा था कि जरूरत पड़ने पर इसके लिए "सेना का इस्तेमाल भी किया जाना चाहिए."

हैरी एस. ट्रूमैन

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अप्रैल 1946 में रणनीति और योजना समिति की ज्वायंट चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ की एक बैठक में अमरीकी विदेश विभाग के एक आला अधिकारी ने कहा था कि "व्यवहारिक तौर वपर सभी सदस्य मानते हैं कि ग्रीनलैंड को खरीदने के पीछे कारण डेनमार्क होना चाहिए."

समाचार एजेंसी एपी के अनुसार, "इस समिति ने कहा कि देश के पास अब काफ़ी पैसा है. डेनमार्क के लिए ग्रीनलैंड अब फ़ायदे का सौदा नहीं रह गया है और अमरीका की सुरक्षा के लिए ये ज़रूरी है कि इस इलाके को खुद में शामिल कर लिया जाए."

बराक ओबामा प्रशासन के दौरान डेनमार्क के लिए अमरीकी राजदूत रह चुके रूफ़स गिफ़ोर्ड उस वक्त के देश के हालात के बारे में बताते हैं.

एनपीआर को दिए अपने साक्षात्कार में उहोंने कहा, "1946 में हमारे लिए ये देखना महत्वपूर्ण था कि राजनीतिक और भौगौलिक तौर पर हमारी स्थिति क्या थी. ये दूसरे विश्व युद्ध के बाद और शीत युद्ध शुरु होने के पहले का दौर था. यूरोप में जारी राजनीतिक अस्थिरता को ले कर अमरीका काफ़ी चिंतित था."

"इस तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं की दुश्मन ग्रीनलैंड के रास्ते अमरीका के नज़दीक पहुंच सकते हैं. ऐसे में ग्रीनलैंड ख़तरनाक बन गया था."

गिफॉर्ड मानते हैं कि मौजूदा हालात अलग हैं. वो कहते हैं आज के वक्त में ग्रीनलैंड के साथ अमरीका के बेहतर और मज़बूत रक्षा और आर्थिक संबंध हैं.

वो मानते हैं कि ऐसा नहीं लगता कि अब अमरीका के लिए ग्रीनलैंड को ख़रीदना ज़रूरी रह गया है.

न्यूयॉर्क

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इमेज कैप्शन, द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की हार के बाद न्यूयॉर्क में समारोह

जब ग्रीनलैंड पर अमरीका ने जमाए पांव

1940 के दशक के अंत में ट्रूमैन के प्रस्ताव को लेकर डेनमार्क की प्रतिक्रिया सकारात्मक नहीं थी. लेकिन साल 1950 तक अमरीका इस तरह के आदेश हासिल करने में कामयाब रहा जिसके तहत वो ग्रीनलैंड में अपना एक सैन्य अड्डा बना सकता था. ये शीत युद्ध की शुरुआत से ठीक पहले की बात थी.

अमरीका के समुद्रतट से काफ़ी दूर स्थित उत्तर में मौजूद अमरीकी सेना का टूली हवाई अड्डा, इस बात की गवाही देता है कि अमरीका के लिए ग्रीनलैंड आज भी बेहद अहम है.

सच कहें तो चीन की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं के बीच अमरीका में कई लोग ट्रंप के इस बयान का समर्थन करते हैं कि ग्रीनलैंड को अमरीका के कब्ज़े में लाया जाना चाहिए.

आर्कटिक सर्कल से बीजिंग की दूरी 3,000 किमी. (1,800 मील) है लेकिन चीन वहां निवेश के नए आयाम ढूंढ़ रहा है. आर्कटिक की बर्फ़ से सामान की आवाजाही के रास्ते बनाने के लिए कई आइसब्रेकर्स (बर्फ़ पर चलने वाले जहाज़) चीन ने ख़रीद लिए हैं या वहां भेज दिए हैं. इनमें परमाणु शक्ति से चलने वाले आइसब्रेकर्स भी शामिल हैं.

इस काम को अंजाम देने के लिए चीन की नज़र ग्रीनलैंड पर है. यहां चीन अपने पोलर सिल्क रोड पर स्टेशन बनाने की संभावनाएं ढूंढ़ रहा है.

ग्रीनलैंड

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रिपब्लिकन पार्टी के नेता माइक गैलाघर ने ट्वीट किया, "ये एक स्मार्ट फ़ैसला है. ग्रीनलैंड अमरीका के लिए रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण है और बेहिचक इस पर विचार किया जाना चाहिए."

माना पूर्व राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन की ये कोशिश नाकाम रही थी. लेकिन दो देशों के बीच इस तरह का सौदा पहले भी क़ामयाब रहा है.

1917 में अमरीका ने डेनमार्क के कब्ज़े में रहे वेस्ट इंडीज़ को अमरीका ने एक सौदे के तहत ख़रीदा था. इन द्वीपों को नामकरण अमरीका के वर्जिन द्वीप के तौर पर किया गया.

गिफोर्ड कहते हैं, उस वक्त अमरीका को अच्छी क़ीमत पर ये द्वीप मिला था. एनपीआर को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि "डेनमार्क के लोग अभी भी इस झटके से उबर रहे हैं."

"इससे मुझे ये तो पता चलता है कि दोबारा ऐसा कुछ नहीं होगा. वो फिर से इतिहास नहीं दोहरांगे."

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