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ब्लॉग: क्या दो जासूसों की किताब में भारत-पाकिस्तान के राज़ खुले?
- Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
दुर्रानी और दुलत की किताब का मामला ठहरता हुआ नहीं लग रहा है.
जेएचक्यू पिंडी में भूतपूर्व 'स्पाई मास्टर' लेफ्टिनेंट जनरल असद दुर्रानी हाईकमान को ये बताएंगे कि उन्होंने भारतीय गुप्तचर संस्था 'रॉ' के भूतपूर्व बॉस अमरजीत सिंह दुलत के साथ जो बातें की गईं और जो अभी अभी 'स्पाई क्रॉनिकल' नाम की किताब में छपी हैं, क्या इस प्रोजेक्ट में हाथ डालने से पहले हाईकमान से इजाज़त ली गई थी.
क्या इससे सेना की आचार संहिता का उल्लंघन तो नहीं हुआ. इसमें कई बातें ऐसी क्यों हैं जिनका वास्तविकता से लेना देना नहीं है.
इससे मुझे याद आया कि 'स्पाई क्रॉनिकल' में एक जगह जनरल असद दुर्रानी ने हंसते हुए कहा कि अगर हम दोनों उपन्यास भी लिख दें तब भी लोग यक़ीन नहीं करेंगे.
नवाज़ शरीफ का बयान
पाकिस्तानी सीनेट के भूतपूर्व अध्यक्ष रज़ा रब्बानी ने सवाल उठाया कि ऐसी बातें कोई सिवीलियन करता तो अब तक देशद्रोही होने का ठप्पा लग चुका होता.
मुंबई अटैक के बारे में अपने ही बयान के डंसे नवाज़ शरीफ़ ने कहा कि जैसे मेरे एक जुमले को पकड़कर नेशनल सिक्योरिटी कमिटी की बैठक बुलाई गई, अब जनरल असद दुर्रानी के लिए भी बुलाओ ना.
'स्पाई क्रॉनिकल' फिलहाल पाकिस्तान में उपलब्ध नहीं है. एक मित्र ने मुझे पीडीएफ़ कॉपी ईमेल की.
इसमें एक मज़ेदार वाक़या असद दुर्रानी ने ये बताया कि जब जर्मनी में मिलिट्री अटैची के तौर पर मेरी पोस्टिंग होनी थी तब एक एजेंसी के दो लोग मेरे कैरेक्टर के बारे में पता करने लाहौर मेरे ससुराल पहुंचे.
दुर्रानी के बेटे का क़िस्सा
घरवाले कहीं गए हुए थे. एजेंसी वालों ने गली के चौकीदार से पूछा कि इस घर में जो लोग रहते हैं वो कैसे हैं.
चौकीदार ने कहा अच्छे शरीफ़ लोग हैं साहब. यूं चौकीदार के बयान से मेरी जर्मनी की पोस्टिंग क्लियर हो गई.
एक बार जनरल असद दुर्रानी का बेटा पाकिस्तानी पासपोर्ट पर किसी जर्मन कंपनी के कंसल्टेंट के तौर पर कोचीन (केरल, भारत) गया.
उसे किसी ने नहीं बताया कि पाकिस्तानी पासपोर्ट वालों को पुलिस रिपोर्टिंग करानी पड़ती है और जिस पोर्ट से वो भारत में दाख़िल हुआ है उसी पोर्ट से वापस जाना होता है.
चुनाचें वो कोचीन से बंबई एयरपोर्ट पहुंच गया और उसे रोक लिया गया.
मुशर्रफ पर हमले की टिप
जनरल साहब ने अमरजीत सिंह दुलत को फोन किया.
दुलत साहब ने मुंबई में अपने कनेक्शन इस्तेमाल किए और जनरल साहब के बेटे को दूसरे दिन की फ्लाइट से इज्ज़त से रवाना कर दिया गया.
जब दुलत साहब ने मदद करने वाले 'रॉ' के कर्मचारी का शुक्रिया अदा किया तो उसने कहा कि शुक्रिया किस बात का सर आख़िर को जनरल साहब भी कुलीग ही हैं. यानी जासूस जासूस भाई-भाई.
शायद इसलिए ही 2003 में 'रॉ' ने 'आईएसआई' को जनरल मुशर्रफ़ पर एक घातक हमले की टिप दी और यूं जनरल मुशर्रफ़ इस हमले में महफ़ूज़ रहे.
अब ऐसी बातें लिखने से अगर नेशनल सिक्यूरिटी को ख़तरा है तो भले होता रहे.
मगर फायदा ये है कि किताब ख़ूब बिकेगी और अगर इस किताब पर पाबंदी लग जाए तो शुभानअल्लाह. तब तो छापने वाले की पांचों उंगलियां घी में होंगी.
क्या दोनों रिटायर्ड जासूसों ने कश्मीर या एक दूसरे के ख़िलाफ़ गुप्तचर कार्रवाइयों समेत कई राज़ों से भी पर्दा उठाया है.
अगर मैं कह दूं कि नहीं तो आप काहे को स्पाई क्रॉनिकल खरीदेंगे. इसलिए मैं नहीं तो बिलकुल नहीं कह रहा.
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