दक्षिण चीन सागर में चीनी बम वर्षकों की तैनाती का मतलब क्या

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- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
चीन ने दक्षिण चीन सागर के विवादित क्षेत्र में पहली बार अपना बम वर्षक विमान H-6K तैनात कर दिया है.
विशेषज्ञों के मुताबिक़, इन विमानों की रेंज उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और अमरीकी द्वीप गुआम तक है.
अमरीका ने चीन के इस क़दम के बाद अपने युद्धक जहाज़ों को चीन के बनाए गए कृत्रिम द्वीपों की ओर रवाना कर दिया है.

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लंबी दूरी के ये बम वर्षक उन विमानों में शामिल रहे हैं जो इन द्वीपों और चट्टानों पर चीन की 'सभी क्षेत्रों तक पहुंच' को बेहतर बनाने के लिए आयोजित ड्रिल में शामिल किए गए थे.
कितना ख़तरनाक है चीन का H-6K विमान?
इस विमान के पायलट ग दाचिंग ने अपने एक बयान में कहा है कि इस अभ्यास से "हमारी हिम्मत और एक असल युद्ध की स्थिति में क्षमताएं बढ़ी हैं".

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इस विमान की क्षमताओं के बारे में रक्षा विशेषज्ञ उदय भास्कर बताते हैं कि चीन में शियान H-6K कहे जाने वाले इस बम वर्षक विमान से मिसाइल लॉन्च की जा सकती है.
वह कहते हैं, "इस विमान पर मिसाइल लगाकर उसे छोड़ा जा सकता है. इसकी ऑपरेशनल रेंज और मिसाइल की रेंज (ऑर्डिनेंस) को 1900 मील माना जाता है. अगर इस क्षेत्र के मानचित्र को देखें तो आपको दो तरह के ऑपरेशनल रेडियस मिलते हैं. दक्षिण चीन सागर में दो तरह के द्वीप हैं जिन्हें स्प्रैटली और पैरासल द्वीप कहा जाता है और दूसरा हैनान प्रांत है. अगर वहां पर इस तरह के विमानों को तैनात करेंगे तो दो अलग-अलग ऑपरेशनल रेडियस नज़र आते हैं."
भाष्कर बताते हैं कि इन विमानों के पास दो तरह की ऑपरेशनल रेडियस है जिसमें से एक रेडियस में मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे आसियन देश आते हैं.
क्या अमरीकी द्वीप गुआम विमान की ज़द में?
एशिया मैरिटाइम ट्रांसपेरेंसी इनीशिएटिव से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक़, ये विमान जल्द ही स्प्रैटली द्वीपों पर उतर सकते हैं जहां पर रनवे और हैंगर बने हुए हैं और वहां से ये विमान उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और गुआम में स्थित अमरीकी बेस तक पहुंच सकते हैं.

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उदय भास्कर बताते हैं, "इस तरह के विमानों में बीच रास्ते में ही ईंधन भरा जा सकता है. चीन ने इस विमान को काफ़ी विकसित किया है. ऐसे में अगर इस विमान को बीच रास्ते में दोबारा ईंधन दिया जा सकता है तो ये ज़रूर गुआम द्वीप तक पहुंच सकता है और शक्तिशाली देशों के लिए मिड-फ़्लाइट रिफ़्यूलिंग एक सामान्य प्रक्रिया है."
चीन की ओर से उठाए गए इस कदम के बाद अमरीका ने अपने युद्धक जहाजों को बीजिंग द्वारा बनाए कृत्रिम द्वीपों के पास पहुंचने के लिए रवाना कर दिया है.
पेंटागन के प्रवक्ता ने न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स से बात करते हुए कहा है कि 'अमरीका एक आज़ाद और खुले हुए इंडो पैसिफ़िक क्षेत्र के प्रति समर्पित है.

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कर्नल क्रिस्टोफ़र लोगन बताते हैं, "हमने ये रिपोर्ट्स देखी हैं और दक्षिण चीन सागर के विवादित क्षेत्रों में चीन का बढ़ता सैन्यीकरण सिर्फ़ इस क्षेत्र में तनाव और अस्थिरता को बढ़ाने का काम करता है."
चीन-अमरीका के बीच तनातनी
बीते काफ़ी समय से चीन और अमरीका के बीच रिश्तों में तनातनी का माहौल देखा जा रहा है. दोनों देशों के बीच 'कारोबारी जंग' शुरू होने के बाद इनके आपसी रिश्तों में तल्ख़ी काफ़ी बढ़ गई है.
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर डॉ. स्वर्ण सिंह के मुताबिक़, इस घटना से क्षेत्र में तनाव बढ़ना लाजमी है.

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डॉ. सिंह बताते हैं, "ये ज़ाहिर है कि इससे तनाव बढ़ेगा, लेकिन ये कोई अचानक होने वाली घटना नहीं है. बीते एक दशक से चीन लगातार दक्षिण चीन सागर में अपना प्रभाव बनाता रहा है. इस क्षेत्र में तनाव लगातार बना हुआ है और अमरीका सबसे पहले अपने युद्धक जहाज़ों को भेजकर फ़्रीडम ऑफ़ नैविगेशन की बात करता है. लेकिन आज अमरीका के साथ इस मुद्दे पर ज़्यादा देश खड़े हुए नज़र नहीं आते हैं. अमरीका का ख़ास दोस्त ऑस्ट्रेलिया भी चीन की ओर इस तरह की कार्रवाई से झिझकता है. हालांकि, ब्रिटेन कभी-कभी अपने पोत अमरीका के साथ भेजता है. ऐसे में अमरीका अपने आपको इस मुद्दे पर अकेला पाता है. यही नहीं, अमरीका, डोनल्ड ट्रंप की सरकार में एशिया प्रशांत क्षेत्र में अपना नेतृत्व बनाए रखने में रुचि खोता जा रहा है."
चीन के ख़िलाफ़ कोई देश क्यों खुलकर नहीं बोलता?

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दक्षिण चीन सागर के मुद्दे पर अमरीका एक लंबे समय से चीन पर दबाव बनाता रहा है. लेकिन चीन दावा करता रहा है कि दक्षिण चीन सागर से उसके नागरिकों के 2000 साल पुराने रिश्ते हैं और ये एक ऐसा इलाक़ा था जहां चीनी नागरिक ही व्यापार करते थे.
साल 2016 में अंतरराष्ट्रीय अदालत ने कहा था कि ऐसे कोई ऐतिहासिक सबूत नहीं हैं कि चीन का इस समुद्र और इसके संसाधनों पर एकाधिकार रहा है.
लेकिन चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने इस अदालती कार्रवाई को 'ढोंग' बताया था और चीन ने कहा था कि अंतरराष्ट्रीय अदालत इस इलाक़े को लेकर उसके सम्प्रभुता के दावे पर चाहे जो फ़ैसला दे, वो दक्षिणी चीन सागर में अपने समुद्री हितों की रक्षा करेगा.
चीनी रक्षा मंत्रालय ने तब कहा था कि चीन की सशस्त्र सेनाएं धमकियों और ख़तरों से निपटने के लिए तैयार हैं.
तब अमरीका ने कहा था कि ये फ़ैसला इस समुद्री विवाद को सुलझाने में मदद करेगा और जापान ने कहा था कि यह फ़ैसला बाध्यकारी और अंतिम है.

लेकिन इसके बावजूद चीन लगभग पूरे दक्षिणी चीन सागर पर दावा करता रहा है. इसमें मूंगे की चट्टानें और द्वीप भी शामिल हैं जिन पर अन्य देश भी दावा करते हैं.
डॉ. स्वर्ण सिंह बताते हैं, "बीते एक दशक से इस क्षेत्र में तनाव बना हुआ है. चीन की कृत्रिम द्वीप बनाने की कोशिशों, नौसेना के आधुनिकीकरण, जहाज़ों की पेट्रोलिंग और 2010 में बनाया गया सबसे बड़ा एयरक्राफ़्ट कैरियर. इस तरह से इस क्षेत्र में चीन का प्रभाव बढ़ता रहा है और इसका तनाव सभी तटीय देशों के संबंधों में नज़र आता है. मगर ये कहना भी ज़रूरी है कि इस क्षेत्र पर बाकी पांच देश भी अपना दावा करते हैं और सभी ऐसी कोशिशें कर रहे हैं, फ़र्क़ इतना है कि चीन की हैसियत बहुत ज़्यादा है."
"चीन ने अपने बढ़ते हुए प्रभाव के साथ थोड़ी-सी अलग रणनीति भी रखी है. वो सबसे पहले अपने आर्थिक व्यापार और आर्थिक संबंधों को दूसरे देशों के साथ इतना उलझा लेता है कि तनाव होने के बाद भी वे देश चीन पर कड़ी प्रतिक्रिया करने से झिझकते हैं. राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने एक बार कहा था कि अगर वह चीन पर प्रतिबंध लगाते हैं तो उनके देश में 17 हज़ार नौकरियों पर ख़तरा पैदा हो सकता है, ऐसे में चीन पहले आर्थिक संबंध बना लेता है, उसके बाद रक्षा, सुरक्षा और सामरिक प्रभाव बनाने की कोशिश करता है. ऐसे में मुझे लगता नहीं है कि इस पर कोई ख़ास प्रतिक्रिया दी जाएगी."

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इस घटना के दूरगामी परिणामों पर डॉ. स्वर्ण सिंह कहते हैं कि एशिया प्रशांत में चीन के निरंकुश प्रभाव को देखना होगा, नहीं तो वह बिना रोक-टोक के अपने तरीके से काम करता रहेगा.
अमरीका और चीन के विवाद में भारत कहां?
चीन दक्षिण चीन सागर पर अपना दावा जताता रहा है, लेकिन हिंद महासागर के मुद्दे पर वह भारत को कह चुका है कि हिंद महासागर के अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र को अपने घर का आंगन न समझे.
वहीं, चीन और अमरीका के बीच तनाव में भारत को अमरीका के ज़्यादा क़रीब माना जाता रहा है.

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ऐसे में एक सवाल उठता है कि इस बढ़ते हुए क्षेत्रीय तनाव का भारत पर क्या असर पड़ सकता है.
डॉ. स्वर्ण सिंह इस सवाल के जवाब में कहते हैं, "90 के दशक तक भारत और चीन एक जैसे ही देश थे और चीन के तेजी से आगे बढ़ जाने से हिंद महासागर में उसका प्रभाव देखा ही जा सकता है. ऐसे में भारत पर इसका सीधा प्रभाव तो पड़ता ही है. मगर भारत को इस समय ये कोशिश करनी होगी कि वो कोई एक पक्ष चुनने की कोशिश न करे और भारत की जो बहुपक्षीय जुड़ाव की नीति है, वो उसी पर चलता रहे. कहने का तात्पर्य यह है कि जितने ज़्यादा देशों के साथ भारत के रिश्ते होंगे और सहयोग का वातारण बना रहेगा, उसका उसे फ़ायदा होगा और भारत पहले से भी ऐसा कर भी रहा है."
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