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ये हैं श्रीलंका में आपातकाल लगाए जाने के कारण
श्रीलंका सरकार ने छह मार्च को देश में आपातकाल की घोषणा कर दी है जिसकी विपक्षी पार्टी ने आलोचना की है.
श्रीलंका के कैंडी ज़िले में सिंहल बौद्ध और अल्पसंख्यक मुसलमान समुदाय के बीच हिंसक झड़पों और मस्जिदों पर हमले के बाद यहां दस दिनों के आपातकाल की घोषणा की गई है.
अशांति को काबू करने में नाकाम रहने के बाद कई विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंहे की निंदा की है.
श्रीलंका में 2011 में आपातकाल हटाया गया था जिसके बाद पहली बार फिर से आपातकाल लागू किया गया है.
1971 से कुछ संक्षिप्त अंतराल को छोड़कर क़रीब चार दशकों तक श्रीलंका में आपातकाल लागू था.
1983 के बाद से आपातकाल विद्रोही तमिल समूह लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (एलटीटीई), जिसे तमिल टाइगर्स के नाम से भी जाना जाता है, के अलग राज्य की मांग के कारण उपजे गृहयुद्ध के कारण लगाया गया था.
क्या है पूरा मामला?
4 मार्च को कैंडी ज़िले में एक हिंसक झड़प में दो लोगों की हत्या हुई और कई मस्जिदों और घरों को नुकसान पहुंचाया गया जिसके बाद राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना ने छह मार्च को दस दिनों के लिए आपातकाल की घोषणा की.
सिंहली बौद्ध समुदाय के मुसलमानों और उनके घरों और दुकानों पर हमले के बाद उपजी अशांति के कारण मध्य श्रीलंका के इस ज़िले में कर्फ़्यू लगाया गया.
फिर से हुई झड़प के बाद सरकार ने सात मार्च को एक बार फिर से इलाके में कर्फ़्यू लगा दिया. हालात पर काबू पाने के लिए कुछ सोशल मीडिया वेबसाइट्स और फ़ोन मैसेजिंग सेवाएं भी प्रतिबंधित की गईं हैं.
ऐसी स्थिति क्यों बनी?
पिछले हफ़्ते मुस्लिम भीड़ के हमले में एक सिंहली बौद्ध व्यक्ति की मौत की ख़बरों के बाद चार मार्च को कैंडी ज़िले में हिंसा भड़क उठी थी. इस घटना के बाद सिंहली बौद्ध समुदाय के लोगों ने मुसलमानों के घरों और दुकानों पर हमले किए.
ज़िले के कुछ हिस्सों में अशांति के कारण सभी सरकारी स्कूलों को बंद कर दिया गया है. साथ ही और अधिक सैनिकों की तैनाती कर दी गई है.
सरकार ने दूरसंचार नियामक, श्रीलंकाई दूरसंचार विनियामक आयोग (टीआरसीएसएल) को व्हाट्सएप, ट्विटर और वाइबर जैसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों की निगरानी के निर्देश दिए हैं.
श्रीलंका की आबादी दो करोड़ दस लाख के क़रीब है, जिसमें तीन चौथाई सिंहली बौद्ध हैं जबकि देश की आबादी में 10 फ़ीसदी मुसलमान हैं.
क्या है प्रतिक्रिया?
साल 2015 में राष्ट्रपति का चुनाव हारने वाले श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे ने "राजनीतिक साज़िश" की ख़बरों को खारिज कर दिया है. उनका कहना है कि आपातकाल यह दर्शाता है कि सरकार अपने असल दायित्व से भटक गई है.
इसी तरह विपक्षी पार्टी जनता विमुक्ति पेरामुना पार्टी के नेता अनुरा कुमार दिसानायके कहते हैं, "सरकार लोगों के ज्वलंत मुद्दों को हल करने में नाकाम रही है और ये प्रदर्शन तो सरकार के लिए वरदान की तरह है ताकि लोगों का ध्यान दूसरी तरफ़ भटकाया जा सके."
इधर सरकार ने सोशल मीडिया पर प्रतिबंधों को सही ठहराते हुए कहा है कि यह सांप्रदायिक दंगों को रोकने के लिए ज़रूरी है.
विकास नीति और आर्थिक मामलों के उप मंत्री डॉ. हर्ष डी-सिल्वा ने ट्वीट किया, "फ़ेसबुक पर नफ़रत फैलाने वाली बातें बढ़ रही हैं. लोगों की ज़िंदगी बचाने के लिए सरकार को कार्रवाई करनी होगी."
श्रीलंका की दूरसंचार विनियामक आयोग ने सेवा देने वाली कंपनियों से कैंडी ज़िले में इंटरनेट सेवाओं पर रोक लगाने के लिए कहा है.
अदादेराना.आईके वेबसाइट के मुताबिक़ आयोग के प्रवक्ता अदा देराना ने कहा कि, "रक्षा मंत्रालय ने विनियामक आयोग से अनुरोध किया है कि उन लोगों की पहचान करें जो कैंडी ज़िला में सोशल मीडिया पर नफ़रत और झूठी ख़बरें फैला रहे हैं."
श्रीलंका में हिंसक घटनाओं पर क्रिकेटर माहेला जयावर्धने ने ट्वीट किया है, "मैं हिंसा की कड़ी निंदा करता हूं. पीड़ितों को जाति, धर्म और मान्यताओं के इतर न्याय मिलना चाहिए. मैं गृहयुद्ध के दौरान पला-बढ़ा हूं, जो 25 सालों तक चला था. मैं नहीं चाहता कि अगली पीढ़ी इस तरह के माहौल से गुज़रे."
इस बीच अमरीका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया ने अपने नागरिकों को सलाह दी है कि वे श्रीलंका जाने से परहेज़ करें.
आगे क्या होगा?
सामाजिक उत्थान मंत्री दिसानायके ने कहा कि दस दिन के बाद राष्ट्रपति फ़ैसला ले सकते है कि आपातकाल की अवधि आगे बढाई जाए या नहीं.
उन्होंने बताया कि आपातकाल बढ़ाने के लिए संसद की अनुमति लेना ज़रूरी होता है.
(बीबीसी मॉनिटरिंग दुनिया भर के टीवी, रेडियो, वेब और प्रिंट माध्यमों में प्रकाशित होने वाली ख़बरों पर रिपोर्टिंग और विश्लेषण करता है. आप बीबीसी मॉनिटरिंग की ख़बरें ट्विटर और फ़ेसबुक पर भी पढ़ सकते हैं.)