नज़रिया: इसराइल-फ़लस्तीनी विवाद सुलझाने में मोदी अहम भूमिका निभा सकते हैं.

    • Author, प्रो. एके पाशा
    • पदनाम, मध्य पूर्व मामलों के जानकार, बीबीसी हिंदी के लिए

भारत ने फ़लस्तीनी विभाजन की योजना का ज़ोरदार विरोध किया था और उसे संघीय राज्य बनाने की वक़ालत की थी, लेकिन संयुक्त राष्ट्र महासभा ने बहुमत के प्रस्ताव को मंज़ूर किया और 1947 में विभाजन हो गया.

यहूदियों ने 14 मई 1948 को इसराइल को यहूदी राज्य घोषित कर दिया और संयुक्त राष्ट्र ने भी 1949 में इसराइल को 59वें सदस्य के रूप में मान्यता प्रदान कर दी.

लेकिन भारत ने इसराइल को सदस्यता दिए जाने का यह कहते हुए विरोध किया कि 'वो उस इसराइल को मान्यता नहीं दे सकता जो हथियारों के बल पर बना है न कि बातचीत के आधार पर.'

शुरू से ही फ़लस्तीनियों के साथ रहा है भारत

17 सितंबर 1950 को नेहरू ने आख़िरकार इसराइल को मान्यता प्रदान की. हालांकि भारत ने अरब राष्ट्रों को आश्वासन दिया कि वो फ़लस्तीन के मुद्दे को समर्थन देता रहेगा और ये भी कि वो मानता है कि यरूशलम में यथास्थिति बनाई रखी जानी चाहिए और इसराइल को मान्यता दिए जाने का ये मतलब नहीं है कि वो सीमाओं के दावे पर इसराइल का समर्थन कर रहा है.

1953 में इसराइल में बॉम्बे (अब मुंबई) में अपना वाणिज्यिक दूतावास खोला, लेकिन भारत ने इसराइल में वाणिज्यिक दूतावास खोलने से इनकार कर दिया.

इसराइल के नेता मोशे डयान अगस्त 1977 में गुपचुप तरीके से भारत की यात्रा पर आए, उनका इरादा भारत के साथ कूटनीतिक रिश्ते कायम करना था, लेकिन वो ऐसा करने में नाकाम रहे.

1992 से भारत और इसराइल के बीच राजनयिक संबंध

1988 में भारत ने फ़लस्तीन को मान्यता दी. उसके बाद से 1992 तक भारत की सभी सरकारें इसराइल के साथ अपने संबंधों नहीं होने को अरब देशों के साथ मजबूत रिश्तों के रूप में पेश किया करती थी.

अक्टूबर 1991 में मैड्रिड सम्मेलन में भारत ने अपने रुख़ में बदलाव किया और 29 जनवरी 1992 को भारत ने इसराइल के साथ राजनयिक रिश्ते कायम कर दिए.

सितंबर 1993 में ओस्लो शांति समझौते के बाद उम्मीद जताई जा रही थी कि इसराइल क़ब्जे वाले इलाक़ों से हट जाएगा और फ़लस्तीन राज्य का निर्माण होगा.

बिन्यामिन नेतन्याहू और शेरॉन के कारण टूटी शांति वार्ता

लेकिन चार नवंबर 1995 को इसराइल के प्रधानमंत्री इत्ज़ाक रॉबिन की हत्या और बिन्यामिन नेतन्याहू और शेरॉन के उद्भव के साथ ही इसराइल के साथ शांति वार्ता टूट गई.

कई लोग यासिर अराफ़ात पर जुलाई 2000 में कैंप डेविड में इसराइल के शांति प्रस्ताव को ठुकराने का आरोप लगाते हैं.

अराफ़ात चाहते थे कि 77 फ़ीसदी ऐतिहासिक क्षेत्र और 23 फ़ीसदी इसराइल के क़ब्जे वाले इलाक़े के साथ फ़लस्तीन बनाया जाए. यानी वो फ़लस्तीन के लिए ग़ज़ा, वेस्ट बैंक और पूर्वी यरूशलम की मांग कर रहे थे.

लेकिन इसराइल ने वेस्ट बैंक में फ़लस्तीनी इलाक़े को अलग करती दीवार बनाना शुरू किया और अंधाधुंध गिरफ़्तारियां, हत्याएं, कर्फ्यू, घर गिराना, सुरक्षा नाकों पर लोगों को अपमानित करने जैसे काम किए.

शेरॉन ने अराफ़ात को आतंकवादी के रूप में पेश किया. इसराइल के नकारात्मक रुख़ के बाद हमास और इस्लामिक जिहाद और युवा फ़लस्तीनियों ने हिंसा का रास्ता अख़्तियार कर लिया.

नवंबर 2014 में अराफ़ात की मौत और 9 जनवरी 2005 को फ़लस्तीनी राष्ट्रपति के रूप में महमूद अब्बास के चुने जाने के बाद वहाँ से शांति नदारद है.

इस बीच, सैन्य, ख़ुफ़िया मामलों और आर्थिक क्षेत्रों में भारत और इसराइल के द्विपक्षीय संबंध लगातार मजबूत हुए हैं, ख़ासकर भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के कार्यकाल में.

भाजपा की सरकारों ने इसराइल से संबंध प्रगाढ़ किए

भाजपा की अलग विचारधारा और सांप्रदायिक छवि ने 'आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध' के साझा नारे के साथ भारत-इसराइल सहयोग को नई दिशा दी है.

कोई हैरानी नहीं है कि इसराइल आज भारत को सबसे अधिक हथियारों की आपूर्ति करने वाले देशों में दूसरे स्थान पर है, साथ ही एशिया में इसराइल, भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है.

इसराइल के प्रधानमंत्री एरियल शेरॉन 9 सितंबर 2003 को भारत आए थे और उन्होंने संयुक्त राष्ट्र और गुटनिरपेक्ष सम्मेलन जैसे मंचों पर भारत से समर्थन मांगा. महमूद अब्बास पहली बार मई 2005 में भारत आए और 16 मई 2017 को उन्होंने चौथी बार भारत में क़दम रखा.

फ़लस्तीनी क्षेत्र के दौरे पर प्रधानमंत्री मोदी

इसराइल का दौरा करने और हाल ही में इसराइली प्रधानमंत्री की मेजबानी करने के बाद प्रधानमंत्री मोदी की शनिवार को फ़लस्तीन की यात्रा बेहद महत्वपूर्ण है.

महत्वपूर्ण इस मायने में कि ये भारत के इसराइल और फ़लस्तीन के साथ संबंधों में अहम मोड़ साबित हो सकती है. भारत ने फ़लस्तीन को बुनियादी ढांचा परियोजनाओं और ग़ज़ा में अल अज़हर यूनिवर्सिटी में पुस्तकालय सह गतिविधि केंद्र बनाने के लिए 65 करोड़ रुपए की मदद देने का वादा किया है.

इसके अलावा भारत आईसीसीआर के माध्यम से फ़लस्तीनी छात्रों को विभिन्न विश्वविद्यालयों में शिक्षा हासिल करने के लिए छात्रवृत्ति भी दे रहा है. साथ ही, फ़लस्तीनी पुलिस अधिकारियों को सुरक्षा में प्रशिक्षण की पेशकश भी की गई है.

भारत नियमित तौर पर फ़लस्तीन को चिकित्सा और मानवीय सहायता मुहैया कराता रहा है. भारत ने फ़लस्तीनी डिप्लोमैटिक इंस्टिट्यूट के लिए 45 लाख डॉलर की आर्थिक मदद दी है, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री मोदी करेंगे.

मोदी की फ़लस्तीन यात्रा का इसलिए भी विशेष महत्व है क्योंकि वो ओमान और संयुक्त अरब अमीरात का दौरा भी करेंगे. ऐसी ख़बरें हैं कि सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात के साथ बहरीन, क़तर और ओमान भी इसराइल के नजदीक आ रहे हैं.

इसराइल से अच्छे संबंध फिर भी फ़लस्तीन के साथ भारत

हालाँकि इसराइली प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के बाद जो साझा बयान जारी हुआ उसमें समाधान के रूप में दो राज्यों के निर्माण की बात नहीं की गई है.

लेकिन भारत ने इससे पहले फ़लस्तीनियों के आत्मनिर्णय के संघर्ष को अपना समर्थन देने की बात दोहराई है और हिंसा समाप्त करने का आह्वान किया है.

इसराइल की नीतियां विशेषकर पश्चिमी तट पर यहूदी बस्तियां बसाने की नीति दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद नीति से कम नहीं है.

भारत इसराइल की इन नीतियों पर चुप्पी नहीं बनाए रख सकता और न ही उसे चुप रहना चाहिए. इसमें कोई शक़ नहीं है कि भारत में फ़लस्तीनी मुद्दे को व्यापक समर्थन और लोकप्रियता हासिल है.

बहुत से भारतीय फ़लस्तीन में जारी हिंसा की वजह इसराइली नीतियों को मानते हैं. भारत अरब-इसराइल शांति प्रक्रिया में शामिल होने का इच्छुक है और प्रधानमंत्री अपनी इसराइल यात्रा के दौरान वो यूएई में रियाद में रह रहे फ़लस्तीनी नेता मोहम्मद दहलन से मिले थे.

दहलन वो शख्स हैं जिन्हें यूएई, मिस्र, अमरीका और इसराइल अब्बास के बाद फ़लस्तीनी नेता के रूप में देखना चाहते हैं. पश्चिमी तट और ग़ज़ा के स्वतंत्र फ़लस्तीनी राज्य बनने का इसराइल का विरोध भारत के व्यापक हित में नहीं है क्योंकि इससे चरमपंथ को बढ़ावा मिलता रहेगा और पूरे इलाके में अस्थिरता बनी रहेगी.

यह बेशक इस्लामिक गुटों ख़ासकर हमास, हिज़्बुल्लाह, इस्लामिक जिहाद और अन्य को बढ़ाता रहेगा और ये इसराइल-फ़लस्तीन मुद्दे की आड़ में हिंसा और आतंकवाद को हवा देते रहेंगे.

फ़लस्तीन को संप्रभू राष्ट्र बनाने का समर्थन

समय आ गया है कि भारत, फ़लस्तीन को जल्द से जल्द एक स्वतंत्र संप्रभु राष्ट्र बनाने का दृढ़तापूर्वक समर्थन करे और इसराइल पर संयुक्त राष्ट्र के असंख्य प्रस्तावों को मानने और शांति समझौते पर दस्तखत करने का दबाव बनाए.

सऊदी अरब के पूर्व विदेश मंत्री अल फ़ैसल ने इसराइल-फ़लस्तीन संघर्ष को क्षेत्र की मूल समस्या बताया था और कहा था कि "इसका समधान होते ही क्षेत्र की कई दूसरी समस्याएं अपने आप सुलझ जाएंगी. उम्मीद की जाती है कि अमरीका शांति वार्ता की प्रक्रिया फिर से शुरू करेगा, जिससे क्षेत्र में शांति और स्थिरता कायम हो."

अमरीका में सऊदी अरब के पूर्व राजदूत प्रिंस तुर्की अल फ़ैसल साफ़-साफ़ कहते हैं कि फ़लस्तीन के मुद्दे पर अमरीका प्रयासों का अब नतीजा निकलना ही चाहिए, बातचीत काफ़ी नहीं है.

प्रिंस तुर्की कहते हैं, "हम प्रक्रियाओं के बारे में पिछले 50 साल से बात करते आ रहे हैं. अब हमें फ़लस्तीन समस्या के कठिन मुद्दों के बारे में बात करनी चाहिए. हम अमरीका से यही चाहते हैं. हम समझते हैं कि ये समय अमरीका को इस दिशा में अपने कदम आगे बढ़ाने का है."

प्रिंस तुर्की की इस टिप्पणी में अरब देशों की वो भावना है जिसमें वो इसराइल-फ़लस्तीन शांति प्रक्रिया में अमरीका की निष्क्रियता को देखते हैं.

इसराइल-फ़लस्तीन शांति वार्ता की पहल

शायद मोदी अब्बास से इसराइल-फ़लस्तीन शांति वार्ता फिर से शुरू करने पर विचार करने के लिए कहें. हालाँकि, फ़लस्तीनियों को मूलभूत अधिकार नहीं देना एक मुद्दा है, जिसे भारत को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए.

अगर दोनों पक्ष आपसी सहमति से इस मुद्दे को सुलझा लेते हैं तो पश्चिम एशिया में शांति और विकास और हिंसा और चरमपंथ को रोकने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है.

ये तक़रीबन साफ़ है कि इसराइल और फ़लस्तीन दोनों उनके विवादों का समाधान निकालने में सक्षम नहीं हैं, जिससे अक्सर क्षेत्र की शांति और सुरक्षा को ख़तरा पैदा होता है.

इसके साथ ही दूसरे विवादास्पद मुद्दे भी जुड़े हैं. क्योंकि भारत के अमरीका और इसराइल दोनों के साथ अच्छे संबंध हैं, इसलिए वो इस विवाद को सुलझाने में अहम भूमिका अदा कर सकता है.

सभी प्रमुख शक्तियों के बीच फ़लस्तीनी राज्य की स्थापना पर सर्वसहमति बनाना इस दिशा में प्रारंभिक बिंदु हो सकता है. फ़लस्तीनियों को लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष में न्याय हासिल करने के लिए भारत (और दूसरे देशों की) के समर्थन की आवश्यकता है.

भारत को फ़लस्तीनियों के हक़ में आवाज़ उठानी चाहिए और लगातार बढ़ती जा रही इसराइल की ज़्यादतियों की निंदा करनी चाहिए. ये न केवल फ़लस्तीन के साथ संबंध सुधारने, बल्कि अरब देशों के साथ संबंध मजबूत करने के लिए भी ज़रूरी है.

लेकिन क्या मोदी की अगुवाई में भारत इसराइल से किसी तरह की उम्मीद कर सकता है, वो भी तब जब इसराइल और भारत सैन्य, गुप्तचर और सुरक्षा में सहयोग के मुद्दे पर लगातार करीब आ रहे हैं.

सवाल ये भी है कि क्या मोदी फ़लस्तीनियों को ये भरोसा दिलाएंगे कि उन्हें भारत से राजनीतिक समर्थन मिलता रहेगा या फिर मोदी अब्बास को अमरीका-इसराइल योजना को स्वीकार करने और उन पर पद छोड़ने का दबाव डालेंगे?

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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