अफ़ग़ानिस्तान में भारत के दख़ल से बिगड़ेंगे हालात: पाकिस्तानी प्रधानमंत्री

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद ख़ाकान अब्बासी ने कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में भारत की कोई सैन्य या सियासी भूमिका नहीं हो सकती.

बीबीसी को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, 'मुझे लगता है कि भारत के दख़ल से अफ़ग़ानिस्तान में शांति स्थापित करने की प्रक्रिया को नुकसान होगा.'

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की छवि, राजनीतिक स्थिति, अमरीका से रिश्ते और चरमपंथी संगठनों को शह देने के आरोपों पर बीबीसी संवाददाता बार्बरा प्लेट ने न्यूयॉर्क में अब्बासी से बात की.

अमरीका से संबंध कमज़ोर पड़ने के सवाल पर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कहा कि अमरीका और उनका एक ही मक़सद है- चरमपंथ से लड़ाई और अफ़ग़ानिस्तान में शांति.

उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि संबंध कमज़ोर हुए हैं. यह वो रिश्ता है जो एक दूसरे पर विश्वास और सम्मान पर आधारित होना चाहिए. और अगर उसमें कहीं कमी है तो हमें उसे ठीक करने की ज़रूरत है. यही संदेश लेकर हम आए हैं."

पड़ें साक्षात्कार के अंश-

ट्रंप प्रशासन ने 225 मिलियन डॉलर की सैन्य सहायता रोक दी है तो क्या उसे रिलीज़ करने के लिए उन्होंने कोई शर्त रखी है?

कोई शर्त नहीं है. बात यह है कि हमें सिर्फ बात करने और आगे बढ़ने की ज़रूरत है और हम इसी पर चर्चा करते रहे.

ये पुरानी शिकायते हैं. लेकिन ये राष्ट्रपति नए हैं और वह कूटनीतिज्ञ नहीं हैं. वह कार्रवाई कर सकते हैं. क्या पाकिस्तान इसके लिए तैयार है?

हम आतंकवाद के ख़िलाफ़ सहयोगी हैं. हमारा मक़सद एक ही है और यह कोई विरोध वाला रिश्ता नहीं है. तो मुझे नहीं लगता कि किसी के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई की ज़रूरत है.

जब आप कहते हैं कि पाकिस्तान चरमपंथियों को समर्थन या शरण नहीं देता तो कोई इस पर यक़ीन क्यों नहीं करता? सरकारों को ऐसा क्यों लगता है कि पाकिस्तान क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं के संबंध में समाधान कम, समस्या ज़्यादा है ?

मुझे लगता है कि ये सवाल आपको उन्हीं से पूछना चाहिए. हमारी बात बिल्कुल साफ़ है. ज़मीन पर हमारा काम बिल्कुल साफ़ है. हमने वहां सक्रिय सभी आतंकवादियों को शरण देने से मना कर दिया है. हम अपनी ज़मीन पर भी उनसे लड़े हैं, उन्हें भगाया है, हराया है. पाकिस्तान से अफ़ग़ानिस्तान में हमला करने के लिए वहां अब कोई पनाहगाह नहीं बची है.

लेकिन अमरीकियों की ख़ुफिया सेवा अच्छी है. जून में अपनी पेंटागन रिपोर्ट में वो कहते हैं, 'अफ़ग़ान की ओर रुझान वाले चरमपंथी समूहों के पास पाकिस्तान में पूरी आज़ादी है और पाकिस्तानी सरकार के कुछ तत्वों से भी उन्हें मदद मिल रही है.'

हम इस बयान से सहमत नहीं है. अगर किसी पनाहगाह के बारे में बताया जाए तो हम कार्रवाई करेंगे.

लेकिन आप भारत के मुक़ाबले पिछड़ रहे हैं. राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत से अफ़ग़ानिस्तान में भूमिका निभाने को कहा है और ये वो बात है जो आप हरगिज़ नहीं चाहते?

अफ़ग़ानिस्तान में भारत की कोई सैन्य या सियासी भूमिका नहीं हो सकती. मुझे लगता है कि भारत के दख़ल से अफ़ग़ानिस्तान में शांति स्थापित करने की प्रक्रिया को नुकसान होगा.

क्या आपको लगता है कि अफ़ग़ानिस्तान पर राष्ट्रपति ट्रंप की नीति कारगर होगी? तालिबान को बातचीत की मेज़ पर लाने के लिए उनके ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई करना?

हमें नहीं लगता कि युद्ध से अफ़ग़ान मसले का कोई हल निकलेगा. यह अफ़ग़ान लोगों के बीच उन्हीं की ओर से किया जाना चाहिए. बाकी दुनिया इसमें उनकी सिर्फ मदद कर सकती है. अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध समाधान नहीं है.

लेकिन यह वहां तक पहुंचने का रास्ता हो सकता है. मतलब अमरीकी लोग तो इसी तरह इसकी व्याख्या कर रहे हैं.

मुझे लगता है कि अगर आप बीते 15 सालों के संदर्भ में देखें तो अब तक यह कारगर नहीं रहा है.

अमरीका ने कहा है कि तालिबान को समझौते की मेज पर लाने में पाकिस्तान अहम भूमिका निभा सकता है. क्या आपको लगता है कि पाकिस्तान का अब भी वैसा प्रभाव है?

मुझे नहीं लगता. हमें स्थिति का अंदाज़ा है. लेकिन मुझे नहीं लगता कि अकेले पाकिस्तान का ऐसा प्रभाव है. हम सिर्फ मदद कर सकते हैं. हम समाधानों के लिए ज़िम्मेदार नहीं हो सकते.

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