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नवाज़ के भाई क्यों नहीं बनेंगे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री?
- Author, आसिफ़ फ़ारूक़ी
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, इस्लामाबाद
नवाज़ शरीफ़ ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद से हाथ धोते ही अपने भाई शाहबाज़ शरीफ़ के नया प्रधानमंत्री बनने की बात रखी थी. लेकिन अब नवाज़ शरीफ़ ने इससे पीछे हटने का फैसला किया है.
शाहबाज़ शरीफ़ फिलहाल पंजाब सूबे के मुख्यमंत्री हैं और, पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने पनामा पेपर्स में नाम आने के बाद नवाज़ शरीफ़ को प्रधानमंत्री पद के लिए अयोग्य करार दिया है. इसके बाद से उनके भाई शाहबाज़ को प्रधानमंत्री बनाए जाने की अटकलें तेज हो गई थीं.
शरीफ़ की पार्टी पीएमएल-एन की संसदीय दल की बैठक में प्रधानमंत्री के पद के लिए शाहबाज़ के नाम को मंजूरी मिल गई थी. लेकिन शाहबाज नेशनल असेंबली के सदस्य नहीं हैं और उनके नेशनल असेंबली में शामिल होने तक ये जिम्मेदारी शाहिद ख़कान अब्बासी को सौंपी गई थी.
लेकिन नवाज़ शरीफ़ ने बीते सोमवार को पत्रकारों से बात करते हुए साफ कर दिया है कि शाहबाज़ फ़िलहाल पंजाब में ही रहेंगे और नवाज़ शरीफ़ की सीट एनए 120 पर होने वाले उपचुनाव में हिस्सा नहीं लेंगे.
ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर वह कौन से कारण थे जिनकी वजह से पाकिस्तान की सत्ताधारी पार्टी के फ़ैसले में इतना बड़ा परिवर्तन आया.
पंजाब का विकास है बड़ा मुद्दा
शाहबाज़ शरीफ़ को शाहबाज़ स्पीड के नाम से भी जाना जाता है. और, पंजाब के सीएम को ये नाम एक चीनी नागरिक ने दिया है जो पंजाब में चल रही विकास परियोजनाओं में काम की गति से प्रभावित था.
पंजाब के मुख्यमंत्री शाहबाज़ को अपना ये निकनेम भी खूब पसंद है.
बीते कुछ दिनों में, पार्टी नेतृत्व में ये राय बनती नज़र आ रही है कि अगर शाहबाज़ को पंजाब से दूर करते हैं तो विकास परियोजनाएं प्रभावित होंगी.
और, ये परियोजनाएं अगले चुनावों से पहले पूरी नहीं हो पाएंगी जिससे पार्टी को नुकसान उठाना पड़ सकता है.
शरीफ़ परिवार में जारी कुर्सी की दौड़
पाकिस्तान के सबसे बड़े सूबे पंजाब की सत्ता शरीफ़ परिवार के हाथ में रही है. सत्ता अगर, शरीफ़ परिवार के सदस्य के हाथ में नहीं तो उनके किसी उम्मीदवार के हाथों में रही है.
लीग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, ऐसा कम ही देखा गया है कि नवाज़ और शाहबाज़ अहम राजनीतिक मुद्दों पर अलग-अलग दिखाई दिए हों. लेकिन पंजाब के मुख्यमंत्री उम्मीदवार के चयन के मामले में ऐसा कई बार देखा गया.
कहा जाता है, नवाज़ शरीफ़ की बेटी अपने किसी ख़ास को मुख्यमंत्री बनाना चाहती थीं. वहीं, शाहबाज़ के बेटे हमज़ा की पसंद कोई और था.
और, शरीफ़ परिवार के ये दोनों कैंप अपने-अपने उम्मीदवार के लिए कोशिशें शुरू कर चुके थे.
साल 2018 का चुनाव
पंजाब में चुनाव जीतने वाली पार्टी के हाथ ही पाकिस्तान की सत्ता लगती है. ऐसे में पंजाब का चुनाव ही शाहबाज़ और प्रधानमंत्री पद के बीच दीवार बनकर खड़ा हो गया.
नवाज़ शरीफ़ ने सत्ता हाथ से जाते ही शाहबाज़ शरीफ़ का नाम उत्तराधिकारी के रूप में घोषित कर दिया. और, ये प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ. लेकिन जब प्रस्ताव के समर्थन करने वालों का शोर ख़त्म हुआ तो पार्टी के नेताओं ने नवाज़ शरीफ़ को इस राजनीतिक समीकरण के दूसरे पहलू से भी अवगत कराया.
और, ये पहलू था चुनाव से पहले पीएमएल - एन को तोड़ने की आशंकाएं. पार्टी नेताओं का कहना था कि मजबूत नेताओं को दूसरे दलों में शामिल होने का प्रलोभन दिया जाएगा. और, पार्टी को संगठन के नजरिये से भी कमजोर करने की कोशिशें होने की आशंका जताई गई.
पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के मुताबिक, ऐसी स्थिति से जूझने के लिए शाहबाज़ से बेहतर कोई और नहीं हो सकता. आखिर, दस महीने का प्रधानमंत्री पद के लिए पंजाब को गंवाना कैसी राजनीतिक समझदारी है?
नवाज़ का राजनीतिक संघर्ष
हालिया घटनाओं को देखा जाए तो नवाज़ शरीफ़ पाक गृहमंत्री चौधरी निसार अली ख़ान के लाख समझाने के बावजूद टकराव की राजनीति करने की मंशा रखते दिखाई पड़ रहे हैं.
एक तरफ़ वो कई राजों से पर्दा उठाने की बात कर रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट की आदेश के बावजूद जीटी रोड से जाने की जगह लावा लश्कर के साथ लाहौर पहुंचते हैं.
ये संकेत बताते हैं कि शरीफ़ चौधरी निसार के सुझावों को दरकिनार करते हुए शांति से बैठने वाले नहीं हैं.
ऐसे में जब वह सीधे-सीधे पंगा लेते दिख रहे हैं तो प्रधानमंत्री के रूप में उनके भाई शाहबाज ठीक व्यक्ति नहीं हैं. अब तक ये भी साफ़ हो गया है कि शाहबाज़ समझौतावादी राजनीति में विश्वास करते हैं और नवाज़ को भी समझाने की कोशिश कर रहे हैं.
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