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पाकिस्तान के स्वात में फिर 'जीवित' हुए बुद्ध
- Author, ल्यूका एम ओलिविएरी
- पदनाम, पुरातत्वशास्त्री
मंगलावर गांव के पास पत्थरों पर उकेरी गौतम बुद्ध की प्रतिमा के बारे में दुनिया को सबसे पहले नब्बे साल पहले 1926 में पता चला था, सर ऑरेल स्टीन के ज़रिये.
साल 2007 में संदिग्ध तालिबान चरमपंथियों ने ईसा पूर्व की इन प्रतिमाओं की तोड़ फोड़ की.
पत्थरों पर उकेरी गई पद्मपानी की प्रतिमा को नष्ट कर दिया गया लेकिन अब इतालवी दूतावास की मदद के बाद इसे फिर से ठीक कर दिया गया है और अब इसे स्वात म्यूज़ियम में रखा जाएगा.
बुद्ध की प्रतिमा के जीर्णोद्धार का काम तीन चरणों में पूरा किया गया. पहले चरण में जिन हिस्सों को नुकसान पहुंचा था, उसका संरक्षण किया गया.
पुरानी तस्वीरों और दस्तावेज़ों के सहारे थ्रीडी डेटा तैयार किया गया. जिसकी मदद से जो टुकड़े बचे थे उनसे सिर और कंधे फिर से तैयार हुए.
स्वात पर गहन अध्ययन वाली अन्ना फिलगेंज़ी की रिपोर्ट, जो 2015 में छपी थी, उससे भी इस काम में बहुत मदद मिली.
इटली के आर्कीअलॉजिकल मिशन ने यूनिवर्सिटी ऑफ पडुआ के साथ मिलकर इस इलाक़े की पुरातात्विक महत्व की जगहों का सर्वे किया. इसमें ख़ैबर-पख्तूनख्वा के पुरातत्व और म्यूज़ियम विभाग ने भी भाग लिया था.
सर्वे में पहाड़ की चोटी पर एक विशाल बौद्ध मठ के अवेशष मिले.
बुद्ध की प्रतिमा तक ले जाती पुरातात्विक महत्व की एक सीढ़ी भी मिली. इस चोटी पर एक स्तूप के अवशेष भी पाए गए.
बोधिसत्व पद्मपानी की मूर्ति, ध्यान के लिए गुफ़ाएं, गुफ़ाओं की दीवारों पर भित्तीचित्र, पुरातात्विक महत्व के तीन बौद्ध शिलालेख और पास में एक विशाल स्तूप यहां मिले.
तिब्बती यात्री ओर ज्ञान पा ने 1260 और 1283 के बीच स्वात का दौरा किया था.
उन्होंने लिखा है, "मंगलावर में एक मंदिर था. राजा इंद्रभूति ने इसके लिए धन मुहैया कराया था. वहां बुद्ध, तारा और लोकेश्वर की कई प्रस्तर प्रतिमाएं थीं."
ओर ज्ञान पा हिमालय की यात्रा करने वाले उन बौद्ध तीर्थयात्रियों में से एक थे जिन्होंने स्वात का दौरा किया था.
5वीं सदी से ही बौद्ध तीर्थयात्री उदयन, राजा इंद्रभूति और मुनि पद्मसंभव की पवित्र भूमि का दौरा किया करते थे.
मुनि पद्मसंभव को तिब्बत और भूटान में गुरु रिम्पोचे के नाम से जाना जाता है.
ल्यूका एम ओलिविएरी स्वात में गौतम बुद्ध की प्रतिमा के जीर्णोद्धार से जुड़े रहे हैं.
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