प्रधानमंत्री मोदी की केरल में ईसाई धर्मगुरुओं से मुलाक़ात से निकले संकेत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

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इमेज कैप्शन, केरल में प्रधानमंत्री मोदी चर्च के प्रमुखों से बातचीत करते हुए
    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

केरल कैथोलिक बिशप काउंसिल (केसीबीसी) ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईसाई धर्म गुरुओं से कोच्चि में हुई भेंट एक 'दोस्ताना मुलाक़ात' थी और उसके लिए ईसाई समाज से किसी तरह की कोई स्वीकृति नहीं ली गई थी.

बिशप काउंसिल के प्रवक्ता फ़ादर जैकब पलाकप्पिली ने बीबीसी हिंदी से कहा कि बीजेपी ने कुछ बिशपों को बैठक के लिए आमंत्रित किया था, 'ऐसा लगता है कि ये एक दोस्ताना मुलाक़ात थी.'

केसीबीसी राज्य में कैथोलिक चर्चों की निगरानी करनेवाली सर्वोच्च संस्था है.

प्रधानमंत्री मोदी ने सोमवार को कोच्चि में एक कार्डिनल और छह बिशप से मुलाक़ात की थी.

फ़ादर जैकब ने कहा कि संस्था को न तो बिशपों के ज़रिए और न ही राजनीतिक दल की ओर से बैठक के बारे में सूचित किया गया था. न ही केसीबीसी को बैठक के एजेंडे को लेकर किसी तरह की जानकारी थी.

हालांकि, सिरो-मालाबार चर्च के मेजर ऑर्चबिशप कार्डिनल जॉर्ज एलनचेरी ने एक वीडियो जारी करके बताया है कि सोमवार को प्रधानमंत्री के साथ ताज मालाबार में हुए रात्रिभोज के दौरान क्या-क्या हुआ.

उन्होंने कहा, "गिरजाघरों के प्रमुखों और प्रधानमंत्री के साथ बैठक अच्छी रही. बेशक, हमने ईसाई समुदाय की सभी ज़रूरतों को साझा किया. साथ ही केरल के लोगों की जरूरतों को भी साझा किया."

कार्डिनल ने कहा, "प्रधानमंत्री मोदी की सरकार की केरल के लोग वास्तव में सराहना कर रहे हैं और हम केंद्र सरकार की पहल पर केरल में और विकास की आशा करते हैं. हमने उनके सामने किसानों, मछुआरों और तटीय क्षेत्र में रहने वाले लोगों की दिक्क़तें का ज़िक्र किया. हमने दलित ईसाइयों और उन ग़रीबों की बात की जो हाशिए पर हैं. प्रधानमंत्री ने हमारी बातें ध्यान से सुनीं."

सिरो-मालाबार चर्च के मेजर ऑर्चबिशप कार्डिनल जॉर्ज एलनचेरी

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ईसाई वोटों पर नज़र?

ईसाई धर्म गुरु ने अपने वीडियो में कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री से इस बात को भी साझा किया कि किस तरह उन्होंने केरल में विकास कार्यों को आगे बढ़ाया है और आर्थिक आधार पर उनकी सरकार की ओर से दिए गए दस प्रतिशत आरक्षण का लाभ किस तरह ईसाई समुदाय के लोगों को भी मिला है.

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री से बातचीत में "हमने बताया कि कुछ धार्मिक कट्टरपंथियों के कारण किस प्रकार हमारे मिशन के काम को भारत में नुक़सान हो रहा है. उन्होंने वादा किया कि भारत में सभी धर्मों में यक़ीन रखनेवालों को सुरक्षा मिलेगी. उन्होंने बातचीत के दौरान पोप की यात्रा के संबंध में भी पूछा."

प्रधानमंत्री मोदी की ईसाई धर्म गुरुओं से मुलाकात को एक अहम क़दम के तौर पर देखा जाना चाहिए.

केरल में अल्पसंख्यकों की लगभग 46 प्रतिशत कुल आबादी में मुसलमानों का प्रतिशत 26.56 है जबकि 18.38 प्रतिशत ईसाई हैं. शेष 0.33 प्रतिशत में कम जनसंख्या वाले अल्पसंख्यक समुदाय जैसे जैन आदि हैं.

मुसलमानों और ईसाइयों ने चुनावों में अधिकतर कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) का समर्थन किया है. अगर बीजेपी राज्य में अपना विस्तार करना चाहती है तो उसे इस गठबंधन को तोड़ना होगा. इस रणनीति के तहत बीजेपी कई तरीक़े से ईसाई समुदाय को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रही है.

साल 2021 में हुए विधानसभा चुनाव में, मुसलमानों और ईसाईयों ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ़) को बड़े पैमाने पर समर्थन दिया था. दोनों समुदायों के बीच ये भावना काम कर रही थी कि यूडीएफ़ उनके हितों की रक्षा बेहतर ढंग से नहीं कर पाएगा.

प्रधानमंत्री ने साल 2021 में पोप फ्रांसिस से मुलाक़ात के लिए जब वैटिकन की यात्रा की तो उसे ईसाई समुदाय को लुभाने के लिए सबसे पहला बड़ा क़दम माना गया. उन्होंने पोप को भारत आने का भी निमंत्रण दिया था.

हालाँकि, समुदाय के एक वर्ग ने इसे महज़ "राजनीतिक क़दम" बताया.

सिरो-मालाबार चर्च

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सुप्रीम कोर्ट में याचिका

इस तरह की टिप्पणी का कारण था हिंदुत्ववादी संगठनों की ओर से कई राज्यों में चर्च के प्रतिनिधियों पर जारी हमले, जो "जबरन धर्म परिवर्तन" के नाम पर किया जा रहा था.

समुदाय के भीतर इन बातों को लेकर कुछ इस तरह की बेचैनी थी कि पिछले साल बेंगलुरु के आर्चबिशप डॉ पीटर मचाडो ने "हिंसा की भयावह घटना" और "घृणास्पद भाषण" के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की. याचिका में दक्षिणपंथी संगठनों और उपद्रवी समूहों पर हिंसा का आरोप लगाया गया था.

केंद्र सरकार ने अदालत में इसका विरोध इस आधार पर किया था कि ये आरोप एकतरफा रिपोर्टों पर आधारित थे.

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि साल 2021 से मई 2022 के बीच, ईसाई संस्थानों पर हमले के 700 मामले सामने आए लेकिन केवल 23 'अपराधियों' को गिरफ्तार किया गया. जबकि हिंसा के पीड़ितों के ख़िलाफ़ लगभग 113 मुकदमे दर्ज किए गए.

मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार को सलाह दी कि वह सभी राज्यों से चर्चों पर हुए हमलों का विवरण प्रस्तुत करने को कहे. यह मामला 13 अप्रैल को फिर से बेंच के सामने आया लेकिन केंद्र सरकार ने बिहार को लेकर याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश आंकड़ों पर सवाल उठाया.

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याचिकाकर्ताओं के वकील कॉलिन गोंजाल्विस ने अदालत से कहा कि वह इस पर गौर करेंगे और अपना पक्ष अगली सुनवाई में रखेंगे.

प्रधानमंत्री ने ईसाइयों में पहुंच बढ़ाने के क्रम में 400 साल पुराने विवाद मामले में दो पक्षों - ऑर्थोडॉक्स और जैकोबाइट्स चर्च के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया और मामले को सुलझाने की कोशिश की.

इस मामले का समाधान आज तक नहीं हो सका है.

टिप्पणी पर सवाल

इसी बीच कुछ दूसरे घटनाक्रम भी सामने आ रहे थे. कम से कम, दो ईसाई धार्मिक नेताओं ने गैर हिंदुओं को "लव जिहाद" और यहां तक कि "नारकोटिक्स जिहाद" से सावधान रहने की सलाह दी.

ये एक ऐसी शब्दावली है जिसका इस्तेमाल बीजेपी नेतृत्व इस्लाम और मुसलमानों के ख़िलाफ़ करता रहा है.

चर्च के कुछ नेतृत्व की ओर इन शब्दों के प्रयोग का ख़ुद चर्च के भीतर विरोध हुआ.

मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन और विधानसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस लीडर वीडी सतीसन ने भी इसकी कड़ी आलोचना की. विजयन ने इसे "विभाजनकारी" टिप्पणी बताया .

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