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इस्लामिक स्टेट ने अपने ख़लीफ़ा की मौत की पुष्टि में इतनी देर क्यों की?
3 फ़रवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने इस्लामिक स्टेट (आईएस) समूह के जिन 'ख़लीफ़ा' अबु इब्राहिम अल-हाशिमी अल-क़ुरैशी के मारे जाने की बात कही थी, गुरुवार को इस चरमपंथी समूह ने उनके मौत की पुष्टि कर दी है.
इस्लामिक स्टेट की ओर से एक ऑनलाइन पोस्ट में ऑडियो संदेश के ज़रिए इसकी पुष्टि की गई और नए 'ख़लीफ़ा' अबु अल-हसन अल-हाशमी अल-क़ुरैशी के नाम की एलान किया गया.
लेकिन इसमें नए ख़लीफ़ा के बारे में और अधिक जानकारी नहीं दी गई और न ही यह बताया गया कि अबू इब्राहिम की मौत कब, कैसे और कहां हुई.
गुरुवार को जब ये ऑडियो मैसेज इस्लामिक स्टेट के नए प्रवक्ता अबु उमर अल-मुहजिर ने पोस्ट किया तब जाकर यह पता चला कि आखिर इस देरी की वजह क्या थी.
दरअसल मुजहिर ने ये बताया कि उनसे पहले के प्रवक्ता अबु हमज़ा अल-क़ुरैशी की भी हाल ही में मौत हो गई है. मुहजिर ने कहा कि वो नए नेता के बारे में और नहीं बताएंगे लेकिन समर्थकों से उनमें निष्ठा रखने का आग्रह किया.
राष्ट्रपति बाइडन ने जब 3 फ़रवरी को ख़ुद देर रात अबु अल-हसन अल-हाशमी अल-क़ुरैशी के मारे जाने की बात कही थी तो ये बताया गया था स्पेशल फोर्स की छापेमारी के दौरान उन्होंने अपने परिवार को मारने के साथ ख़ुद को उड़ा लिया था.
इस कार्रवाई की जानकारी देते हुए बाइडन ने कहा था कि, "दुनिया के लिए एक बड़े आतंकी ख़तरे को दूर कर दिया गया है."
तब बाइडन ने अबु इब्राहिम अल-हाशिमी अल-क़ुरैशी को दुनिया भर में इस्लामिक स्टेट से जुड़े संगठनों के प्रसार और यज़ीदी लोगों के मारे जाने के पीछे मुख्य ताक़त बताया था.
महीनों चली थी इसकी प्लानिंग
अमेरिकी अधिकारियों ने तब ये भी बताया था कि कैसे इस ऑपरेशन की प्लानिंग महीनों तक चली थी. और उसके बाद सीरिया के इदलिब प्रांत में घुसकर इस ऑपरेशन को अंजाम दिया गया था.
चरमपंथी अबू इब्राहिम अल-हाशिमी अल-क़ुरैशी को "द ड्रिस्ट्रॉयर" के नाम से भी जाना जाता था. साल 2019 में अबू बक्र अल-बग़दादी की मौत के बाद अल-क़ुरैशी को इस्लामिक स्टेट का नेता बनाया गया.
बग़दादी की मौत के चार दिन बाद ही ये घोषणा की गई कि समूह अब अल-क़ुरैशी के नेतृत्व में काम करेगा. लेकिन ऐसा माना जाता है कि अल-क़ुरैशी को इस पद के लिए काफ़ी तैयार किया गया और जंग के मैदान से दूर रखा गया था.
इदलिब के ठिकाने का पता चला था
ख़ुफ़िया रिपोर्ट से पता चला कि अल-क़ुरैशी अपने परिवार के साथ सीरिया के आतमेह कस्बे में रह रहे हैं.
तुर्की की सीमा के पास इदलिब प्रांत में आने वाला ये इलाक़ा जिहादी गुटों का गढ़ है जो इस्लामिक स्टेट के धुर विरोधी हैं. साथ ही साथ वहाँ तुर्की समर्थित विद्रोही भी यहाँ सक्रिय हैं, जो सीरिया की सरकार का विरोध कर रहे हैं.
ख़ुफ़िया जानकारी थी कि अल-क़ुरैशी वहाँ अपने परिवार के साथ एक तीन मंज़िला रिहायशी इमारत की दूसरी मंज़िल पर रह रहे है. क़ुरैशी वहीं से कुरियर यानी संदेशवाहकों के ज़रिए अपने आदेश सीरिया और दूसरी जगहों पर भेजकर समूह को चलाते थे.
वो कभी भी घर से बाहर नहीं निकलते थे. सिर्फ़ नहाने के लिए बिल्डिंग की तीसरी मंज़िल पर जाया करते थे. अब यहाँ पर संदेह ये था कि अगर एयर स्ट्राइक की जाए तो इससे आम नागरिकों की मौत का ख़तरा था.
ऐसा माना जा रहा था कि बिल्डिंग में रहने वाले दूसरे परिवार इस्लामिक स्टेट से जुड़े नहीं थे या वो नहीं जानते थे कि अल-क़ुरैशी यहीं रहते हैं.
ऑपरेशन कैसे अंजाम दिया गया
वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए ज़मीन के रास्ते हमला बोलने के बारे में विस्तार से अध्ययन किया गया.
कई तरह के हालातों का अभ्यास किया गया, ये समझने की कोशिश की गई कि अगर ज़मीन से ऑपरेशन होता है तो कितना जोख़िम है.
रिहायशी इमारत का मॉडल बनाया गया. इंजीनियरों ने ये समझा कि अगर विस्फोट से बिल्डिंग को उड़ाया जाता है तो कैसी स्थिति बनेगी.
राष्ट्रपति बाइडन को दिसंबर में इस संभावित ऑपरेशन के बारे में विस्तार से बताया गया. बाइडन ने पहली फ़रवरी को इस कार्रवाई की अनुमति दी थी.
3 फ़रवरी को जब इस ऑपरेशन के लिए हेलिकॉप्टर आतमेह पहुंच रहे थे तो बाइडन ख़ुद व्हाइट हाउस में स्थिति पर नज़र रखे हुए थे.
पेंटागन के प्रवक्ता जॉन किर्बी के मुताबिक अमेरिकी सेना ने कार्रवाई से पहले 8 बच्चों समेत 10 लोगों को बिल्डिंग से निकाला.
किर्बी ने बताया कि इस कार्रवाई के दौरान ही क़ुरैशी ने बिल्डिंग की तीसरी मंज़िल पर विस्फोट कर दिया, जिसमें क़ुरैशी, उनकी पत्नी और दो बच्चों की मौत हो गई.
उन्होंने ये भी बताया कि बाद में फिंगरप्रिंट और डीएनए एनालिसिस के बाद अल-क़ुरैशी की पहचान हुई.
साल 1976 में इराक़ में जन्मे अल-क़ुरैशी पर अमेरिका ने 1 करोड़ डॉलर का इनाम रखा था.
कभी इस्लामिक स्टेट का पूर्वी इराक़ से पश्चिम सीरिया तक क़रीब 88 हज़ार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर क़ब्ज़ा था और यहां के 80 लाख लोग इनके क्रूर शासन को झेलने के लिए बाध्य थे.
2019 में इस समूह को इस पूरी ज़मीन से खदेड़ दिया गया था लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ के एक अनुमान के मुताबिक सीरिया और इराक़ में इसके 6 से 10 हज़ार लड़ाके आज भी मौजूद हैं जो अचानक तेज़ हमले, घात लगाकर हमले और सड़क किनारे बमबारी जैसी घटनाओं आए दिन अंजाम देते रहते हैं.
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