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पंजाब चुनाव: मजबूत वोट बैंक क्यों नहीं बन पाते दलित?
- Author, अनुराग कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पंजाब में इस वक़्त चुनावी मौसम है. ऐसे में संत रविदास की जयंती के मौके पर नेताओं में भक्ति दिखाने की होड़ लगी है.
बुधवार सुबह पंजाब के सीएम चरणजीत सिंह चन्नी वाराणसी के रविदास मंदिर पहुंचे और अपनी फोटो ट्वीट की. वहीं प्रधानमंत्री मोदी दिल्ली के करोलबाग स्थित श्री गुरु रविदास विश्राम धाम मंदिर पहुंचे और भक्तों के साथ कीर्तन में भाग लेते अपना वीडियो पोस्ट किया.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी इस मौके पर लंगर में खाना परोसते नज़र आए.
तो अकाली दल और आम आदमी पार्टी भला कैसे पीछे रहती. अकाली दल की नेता और सांसद हरसिमरत कौर बादल और आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने भी संत रविदास मंदिर पहुंचकर मत्था टेका.
संत रविदास की जयंती पर पंजाब से लेकर यूपी तक में ये हलचल ऐसे ही नहीं देखी जा रही. चुनावी माहौल में इसके गहरे राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं.
पंजाब में फिलहाल दलितों की आबादी 32 फीसदी है, जबकि जाट सिखों की आबादी 20 फीसदी के आसपास है.
फिर भी अगर राज्य में अब तक की राजनीति देखें तो यहां मुख्य रूप से जाट सिखों का ही दबदबा रहा है. राज्य की आबादी में लगभग एक तिहाई हिस्सा होने के बाद भी दलितों का एकजुट समुदाय नहीं बन पाना इसकी बड़ी वजह माना जाता है.
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि देश के अन्य हिस्सों में एक मजबूत वोटबैंक बनकर उभरे दलित पंजाब में एकजुट क्यों नहीं हो पाते?
पंजाब में कई वर्गों में बंटे दलित
पंजाब में दलितों के एकजुट नहीं होने की बड़ी वजह उनके कई वर्गों में बंटे होने को माना जाता है.
इंस्टीट्यूट ऑफ़ डेवलपमेंट एंड कम्यूनिकेशन के निदेशक डॉक्टर प्रमोद कुमार इस पर कहते हैं, ''पंजाब में प्रतिशत के हिसाब से देखें तो दलित एक बहुत बड़ा वर्ग जरूर हैं, लेकिन सामाजिक तौर पर नहीं. सिख धर्म ,आर्य समाज के आने बाद जातीय जड़ें पंजाब में काफी कमजोर हुई हैं.''
डॉक्टर प्रमोद कुमार आगे कहते हैं, ''पंजाब में कुल दलित आबादी के 60 फीसदी सिख हैं और 40 फीसदी हिंदू हैं. इसके बाद इनकी लगभग 26 उपजातियां हैं. इनमें 3 प्रमुख हैं-मजहबी, रविदासिया/रामदासिया, अद धर्मी. ये आबादी पूरे पंजाब मैं फैली हुई है.''
किसी खास इलाके तक सीमित नहीं दलित आबादी
पंजाब में दलितों की आबादी ज्यादा होने की वजह से राज्य के चुनावी समीकरणों पर भी इसका असर देखने को मिलता है.
पंजाब को मुख्य रूप तीन क्षेत्रों में बांटा गया है- मालवा, माझा और दोआबा.
कुल 117 सीटों में 34 सीटें आरक्षित हैं.
इनमें से 69 सीटें अकेले मालवा क्षेत्र में आती हैं, जिनमें से अनुसूचित जातियों के लिए 19 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं.
माझा में कुल 25 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से 7 अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हैं.
दोआबा की 23 विधानसभा सीटों में से 8 आरक्षित हैं.
पिछले विधानसभा चुनाव की बात करें तो कुल 34 आरक्षित सीटों में से 21 कांग्रेस ने जीती थीं. जबकि नौ सीटें आम आदमी पार्टी ने जीती थीं. वहीं चार सीटें अकाली-बीजेपी गठबंधन के हिस्से में गई थीं.
अलग-अलग विधानसभा सीटों पर दलितों की आबादी को लेकर डॉक्टर प्रमोद कुमार कहते हैं, ''ऐसा नहीं है कि दलित किसी खास इलाके तक ही सीमित हैं. इनकी मौजूदगी राज्य के तीनों क्षेत्रों में अच्छी खासी है. उदाहरण के तौर पर 13 विधानसभा क्षेत्रों में मजहबी समुदाय के लोगों की आबादी 25 फीसदी से ज्यादा हैं. उसी तरह से रविदासिया की आबादी 3 विधानसभा क्षेत्रों में 25 फीसदी से ज्यादा है. अद-धर्मी समुदाय की आबादी देखें तो 12 विधानसभा क्षेत्रों में उनकी आबादी 25 फीसदी से ज्यादा है.''
चुनावों में दलित फैक्टर
इन चुनावों में दलित महत्वपूर्ण हैं? इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री कहते हैं, '' पंजाब की राजनीति में दलितों को कभी प्रतिनिधित्व नहीं मिला. पंजाब की राजनीति में जाट सिखों का दबदबा रहा है. सारे संसाधन जाट सिखों के पास हैं. इसलिए राजनीति के मैदान पर वो हमेशा जाट सिखों का राज रहा है.''
चुनावों में दलित फैक्टर के असर को लेकर अत्री कहते हैं, ''धर्म के आधार पर पंजाब में जाति कोई फैक्टर कभी नहीं रहा, लेकिन चुनाव आते हैं तो जाति एक महत्वपूर्ण फैक्टर बन जाती है. इसी वजह से चरणजीत सिंह चन्नी आखिर में मुख्यमंत्री के तौर पर कांग्रेस की पसंद बने.''
दलित राजनीति और डेरों का प्रभाव
पंजाब की राजनीति में डेरों का काफी प्रभाव माना जाता है. इसके पीछे भी कहीं ना कहीं दलित वोट बैंक की राजनीति है. इन डेरों में जाने वाले ज़्यादतर लोग ग्रामीण इलाकों में रहने वाले दलित ही हैं. पंजाब के नामी डेरों में डेरा सच्चा सौदा, राधा स्वामी सत्संग, डेरा नूरमहल, डेरा निरंकारी, डेरा सचखंड बल्लां और डेरा नामधारी शामिल हैं.
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से राधा स्वामी सत्संग ब्यास के प्रमुख बाबा गुरिंदर सिंह ढिल्लों के मुलाकात की थी. प्रधानमंत्री के साथ डेरा प्रमुख की इस मुलाकात को पंजाब चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है. इसके अलावा पंजाब के सीएम चरणजीत सिंह चन्नी, दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल, अकाली दल की नेता हरसिमरत कौर बादल जालंधर स्थित डेरा सचखंड बल्लां का दौरा कर चुकी हैं.
पंजाब की राजनीति में डेरों की भूमिका पर वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री कहते हैं, ''पंजाब के अंदर अधिकतर सियासत डेरों से ही होती है. ज्यादातर डेरे मालवा क्षेत्र में है. इन डेरों से जुड़े ज्यादातर लोग समाज के निचले तबकों से आते हैं, दलित होते हैं. इस वजह से ही हाल में राधा स्वामी सत्संग ब्यास के प्रमुख से पीएम नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी. डेरा सच्चा के सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम को पंजाब चुनाव के समय फरलो पर रिहा करने को भी इस वजह से ही राजनीति से जोड़ा जा रहा है.''
क्यों एकजुट वोट बैंक नहीं हैं दलित?
दलितों के एक खास वर्ग के तौर पर एकजुट नहीं होने के सवाल पर डॉ. प्रमोद कहते हैं, '' पंजाब की दलित आबादी में कई तरह की भिन्नताएं हैं. इनमें सांस्कृतिक समानताएं नहीं हैं, आपस में शादिया नहीं होती हैं. कुछ उपजातियों को आरक्षण के अंदर भी आरक्षण मिलता है. इस वजह से इनमें आपस में विवाद होता रहता है. उसके अलावा दलितों में हिंदू और सिख का बंटवारा भी है. इसलिए दलित समुदाय पंजाब में एक वोट बैंक नहीं बन पाया.''
हालांकि वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री इससे इत्तेफाक नहीं रखते, वो कहते हैं, ''सामाजिक और ऐतिहासिक तौर पर पंजाब का समाज जाति के बंधन से ऊपर है. लेकिन राजनीतिक पार्टियों के लिए हमेशा दलित एक वोट बैंक ही रहेगा.''
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