सिल्वरीन स्वेर: दूसरे विश्व युद्ध के दौरान असम-अरुणाचल प्रदेश को राशन मुहैया कराने वाली महिला
पूर्वोत्तर राज्य मेघालय से आने वाली सिल्वरीन स्वेर की पहचान एक ऐसी महिला की है जिन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में लड़कियों को आगे बढ़ाया, दूसरे गृह युद्ध के संकट के दौरान अपनी प्रशासनिक कुशलता का लोहा मनवाया और सरकारी आधिकारिक पदों पर रहीं जो उस दौर में किसी खासी जाति से आने वाली महिला के लिए असंभव माना जाता था.
हम बात कर रहे हैं 80 साल पहले की. उस समय शिलांग, छोटा-सा शहर हुआ करता था. अरुणाचल प्रदेश को तब नार्थ ईस्ट फ़्रंटियर एजेंसी (नेफ़ा) कहा जाता था.
इस इलाक़े में पढ़ाई-लिखाई की बातें तो दूर, प्रशासन की पहुंच भी न के बराबर थी. उस दौर में सिल्वरीन स्वेर ने जो काम उस इलाक़े में किया, वो बेमिसाल है.
सिल्वरीन स्वेर अनुसूचित जनजाति, खासी से आती थीं. कोलकाता के स्कॉटिश चर्च कॉलेज में पढ़ाई पूरी करने के बाद वे शिलांग आकर वेल्श मिशन गर्ल्स हाई स्कूल में पढ़ाने लगीं.
इसके बाद वे गर्ल गाइड्स मूवमेंट से बतौर ट्रेनर जुड़ीं और यहीं से उन्होंने युवा लड़कियों को शिक्षा, प्रशिक्षण और गर्ल गाइड्स के ज़रिए नई राह दिखाना शुरू किया. मेघालय में भारत स्कॉउट्स एंड गाइड्स की नींव रखने में उनकी अहम भूमिका मानी जाती है.
इस बारे में बीबीसी को जानकारी देते हुए भारत स्कॉउट्स एंड गाइड्स इंडिया की स्टेट सेक्रेटरी अमीलिया स्वेर ने बताया, "सिल्वरीन ने गर्ल गाइडिंग की शुरुआत वेल्श मिशन स्कूल से की. वे स्काउटिंग और गाइडिंग के विचार से बहुत गहराई से जुड़ी हुई थीं. असम से उन्होंने इसकी शुरुआत की."
"वे पूर्वोत्तर क्षेत्र की सबसे बेहतरीन ट्रेनर बनीं और फिर पूरे भारत की. वे हमेशा काम के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाती रहती थीं. दूरदराज़ के इलाक़े ही क्यों न हों, वो वहां पैदल चलकर जाती थीं. वे इस आंदोलन की अगुवा थीं और उन्होंने ही मेघालय में भारत स्काउट्स एंड गाइड्स की शुरुआत की."

सिल्वरीन स्वेर जब टीचिंग और गाइड्स मूवमेंट से जुड़ीं, उस वक़्त दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था. भारत के उत्तर पूर्व इलाक़े में विश्व युद्ध के गहरे बादल मंडरा रहे थे. दूसरी तरफ़ भारत का स्वतंत्रता आंदोलन भी अपने आख़िरी दौर में था और उत्तर पूर्व भी इससे अछूता नहीं था. इस माहौल में सिल्वरीन स्वेर को एक नई ज़िम्मेदारी सौंपी गई.
इस ज़िम्मेदारी के बारे में जानकारी देते हुए उनके रिश्तेदार अशोक मेहता बताते हैं, "शिक्षा के क्षेत्र में उनके प्रबंधन की कार्यकुशलता को देखते हुए उन्हें एक और ज़िम्मेदारी दी गई. साल 1947 तक तो ब्रिटिश थे और वो नॉर्थ ईस्ट में भी थे. दूसरे विश्व युद्ध में पूरे उत्तर पूर्व में जो राशनिंग सिस्टम था उसमें पीडीएस या सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसा कुछ नहीं था."
"ब्रिटिश अधिकारियों ने ये कहा कि ये इतनी ईमानदार महिला हैं और इनकी ऑर्गनाइज़िंग कैपेसिटी इतनी अच्छी है कि उन्हें असिस्टेंट कंट्रोलर ऑफ़ राशनिंग का पद दिया जाना चाहिए. इसके तहत उनका काम पूरे असम में और नेफ़ा में सबको राशन दिलवाना था."
असिस्टेंट कंट्रोलर ऑफ़ राशनिंग के तौर पर सिल्वरीन स्वेर के काम को काफ़ी सराहा गया और उन्हें इसके लिए क़ैसर-ए-हिंद पुरस्कार से भी नवाज़ा गया. लेकिन ये काम कितना मुश्किलों भरा था, वो उन्होंने दूरदर्शन शिलांग को दिए गए एक साक्षात्कार में बताया.
उन्होंने इस साक्षात्कार में बताया, "ये काम काफ़ी दबाव से भरा था क्योंकि आपको लगातार जाकर दुकानों की जांच करनी होती थी. लोग दफ़्तर में आपसे मिलने आते रहते थे. काफ़ी भीड़ रहती थी और लोगों के राशन को लेकर कई सवाल होते थे, जैसे कितना या ये काफ़ी नहीं है.''
"1947 में तो नर्वस ब्रेकडाउन की वजह से मुझे अस्पताल जाना पड़ा था. मैं इससे पहले मरीज़ के तौर पर कभी अस्पताल नहीं गई थी. आप समझ सकते हैं कि एक कंट्रोलर रहते हुए एक व्यक्ति पर कितनी ज़िम्मेदारी होती है."
इसके बाद उनका सामना एन.के. रस्तुमजी से हुआ. वे नॉर्थ ईस्टर्न फ़्रंटियर एजेंसी यानी नेफ़ा के लिए असम गर्वनर के सलाहकार थे. सिल्वरीन स्वेर को नेफ़ा स्थित पासीघाट ऑफ़िस में चीफ़ सोशल एजुकेशन ऑफ़िसर का पद दिया. ये काफ़ी चुनौतीपूर्ण था, लेकिन उन्होंने इसे भी स्वीकार किया.

इस बारे में बीबीसी से बातचीत में शिलांग कॉलेज की पूर्व प्रिंसिपल डॉक्टर एम.पी.आर लिंगदोह ने कहा, "वो एक शिक्षक थीं और उन्होंने नेफ़ा में काम शुरू किया, जो अभी अरुणाचल प्रदेश में हैं. उन्होंने ही वहां टीचर्स ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट शुरू किया था. आज हम स्किल डेवलपमेंट की बात करते हैं, लेकिन उन्होंने उस ज़माने में लोगों को कृषि और शिल्प कला से आय कमाना सिखाया."
"अरुणाचल प्रदेश के लोगों ने इसलिए उनकी काफ़ी तारीफ़ भी की. उस समय अरुणाचल प्रदेश जाकर काम करना काफ़ी मुश्किल था. आज भी हम वहां जाने से डरते हैं. ऐसे रास्तों के बीच से काम के लिए गुज़रना, जहां घना जंगल और जंगली जानवर हुआ करते थे, लेकिन वे काम करती रहीं."
सिल्वरीन स्वेर युद्ध और हथियार के ख़ात्मे के लिए चल रही इंटरनेशनल स्प्रिचुअल मुवमेंट से भी जुड़ीं और यहां से उन्होंने एक सुंदर आज़ाद दुनिया के लिए काम शुरू किया. घृणा, डर और लालच से मुक्त समाज.

मेघालय के समाज की बात की जाए तो इसे मातृ-सत्तात्मक माना जाता है, लेकिन यहां की राजनीति में पुरुषों का वर्चस्व रहा है.
सिल्वरीन स्वेर ने उसे तोड़ने के भी प्रयास किए. सिल्वरीन मानती थीं कि महिलाओं को फ़ैसले लेने वाले हर पद पर होना चाहिए. उन्होंने मेघालय को राज्य का दर्जा मिलने के बाद निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव भी लड़ा. हालांकि वो चुनाव नहीं जीत पाईं, लेकिन, उन्हें खासी जाति में कई मुक़ाम पाने वाली पहली महिला ज़रूर कहा जा सकता है.
सिल्वरीन पर डाक्यूमेंटरी बना चुकीं रीडालांग एम तारियांग कहती हैं, "उन्होंने ऐसे कई काम किए हैं, जो किसी खासी महिला ने पहली बार किए होंगे. वे मेघालय से पद्मश्री पाने वाली पहली महिला हैं. वे सरकार में रहते हुए एग्ज़िक्यूटिव पद पाने वाली भी पहली महिला हैं."
"ये पद उनके पास 1940 से पहले यानी भारत की आज़ादी से पहले था. इस दौरान उन्हें अपने काम के लिए ब्रिटिश सरकार से क़ैसर-ए-हिंद पुरस्कार भी मिला था. शिक्षाविद् या सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ-साथ वे समुदाय के लिए काम करना चाहती थीं और लोग आज भी उन्हें याद करते हैं."
एक फरवरी, 2014 में निधन होने तक अपने जीवन के 103 वर्ष तक सिल्वरीन काफ़ी सक्रिय रहीं. जानकार बताते हैं कि उनके दरवाज़े हर तरह की मदद के लिए हमेशा खुले रहते थे.
खासी समाज में उन्होंने महिलाओं को एक नई चेतना दी. युद्ध से आहत समाज को जोड़ने के लिए आवाज़ बुलंद की. लड़कियों को गाइड्स मूवमेंट से जोड़कर सामाजिक भागीदारी दी. नेतृत्व करना सिखाया. लोगों को स्वास्थ्य और साफ़-सफ़ाई को लेकर जागरूक किया और इसीलिए उनके समाज के लोग उन्हें कोंग सील यानी बड़ी दीदी कहते हैं.
रिपोर्ट/ सिरीज़ प्रोड्यूसर- सुशीला सिंह
(बीबीसी लाई है हमारी पुरखिन की दूसरी सिरीज़ जिसमें हम आपको बता रहे हैं आठ ऐसी दमदार महिलाओं की कहानियाँ जिन्हें हाशिए पर रहना मंज़ूर नहीं था. हमारी पुरखिन-2 की सातवीं कड़ी में आपको मिलवाएंगे ऐसी महिला से जिन्होंने झांसी की रानी का भेष बदलकर अंग्रेज़ों को चकमा दिया था.)
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