रानी गाइदिन्ल्यू: अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाली नागा महिला
हमारी पुरखिन सीज़न 2 में आज बात रानी गाइदिन्ल्यू की, जिन्होंने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाकर ना केवल संघर्ष किया बल्कि अपने इलाके के लोगों को उनका हक़ दिलाने की लड़ाई वे आख़िरी दम तक लड़ती रहीं.
26 जनवरी, 1915 को जन्मीं रानी गाइदिन्ल्यू नागा जनजाति रॉन्गमई से आती थीं और अपने चचेरे भाई हाइपॉन्ग जदोनांग से बहुत प्रभावित थीं.
जदोनांग नागा जनजातियों को एकजुट करने के लिए अपने रीति-रिवाजों और प्राचीन धर्म हेराका को ईसाई मिशनरियों के बढ़ते प्रभाव से बचाने के लिए आंदोलन चला रहे थे. वो नागा इलाकों में ब्रितानी हस्तक्षेप का विरोध कर रहे थे. उन्होंने इसे ज़ेलिऑन्गरॉन्ग आंदोलन का नाम दिया. इस आंदोलन में हाइपॉन्ग जदोनांग के साथ रानी गाइदिन्ल्यू भी जुड़ गईं.

रामकुई न्यूमे असम में रहते हैं और वो रानी गाइदिन्ल्यू के साथ काम भी कर चुके हैं. उन्होंने ज़ेलिऑन्गरॉन्ग आंदोलन के बारे में बीबीसी से बातचीत में कहा कि हाइपॉन्ग जदोनांग रानी के बड़े भाई थे और वे पास के गांव में ही रहते थे.
उन्होंने बताया, "उन दोनों ब्रितानी अधिकारियों के जबरन हाउस टैक्स लेने और पोर्टर का काम करवाने के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई. जब भी कोई ब्रितानी अधिकारी आता था तो गांववालों को उनके लिए खाना भी बनाना पड़ता था. उन्हें मुफ़्त में अपने कंधे पर उठाकर जगह-जगह ले जाना पड़ता था. एक बार रानी मां को भी यही काम करना पड़ा था."
"वे अन्यायपूर्ण हुक्म देते थे. इसके बाद जदोनांग ने सोचा कि ब्रिटिश हमारे देश को बर्बाद कर रहे हैं और उनको निकालना ही पड़ेगा. उन्होंने मिलकर इसका विद्रोह किया और कहा कि वो न ही टैक्स देंगे और न पोर्टर का काम करेंगे. और यही कारण बना जिसकी वजह से हाइपॉन्ग जदोनांग को गिरफ़्तार कर लिया गया."
जदोनांग को ब्रितानी विरोधी कार्रवाई के कारण पहले गिरफ़्तार किया गया और फिर फांसी दे दी गई. इसके बाद आंदोलन की कमान रानी गाइदिन्ल्यू ने अपने हाथों में ले ली और ब्रितानी फ़ौज के ख़िलाफ़ एक बड़ी कार्रवाई को अंजाम दिया. इस कार्रवाई के बारे में बीबीसी के जानकारी देते हुए डॉ के. हीरा काबुई ने बताया कि
गाइदिन्ल्यू असम राइफ़ल की आउटपोस्ट के बारे में जानती थीं. उन्होंने वहां हमले किए.
हारी काबुई, रानी गाइदिन्ल्यू पर पुस्तिका भी लिख चुके हैं. वे बताते हैं, "रानी ने हमले तो किए लेकिन उसका असर बहुत कम हुआ. इसके जवाब में ब्रितानी असम राइफ़ल ने भी हमला किया जिसमें कई लोग मारे गए. उन्होंने गांवों को भी जलाया. लेकिन रानी और उनके साथी जंगल में बच निकले."

वो बताते हैं कि पहली बार हमलों में हथियारों और बंदूकों का इस्तेमाल हुआ. जदोनांग के समय में ऐसा नहीं हुआ था. इस आंदोलन के बाद गाइदिन्ल्यू अंडरग्राउंड हो गईं और फिर उन्होंने समर्थकों के साथ मिलकर नागा नेशनल काउंसिल का गठन किया.
वहीं रानी गाइदिन्ल्यू और उनके समर्थकों की तरफ़ से हुई कार्रवाई के बाद ब्रितानी फ़ौज ने उन्हें पकड़ने का अभियान तेज़ कर दिया. रानी गाइदिन्ल्यू के बारे में जानकारी देनेवाले को कर माफ़ी और नक़द इनाम देने का एलान किया गया. हालांकि ये सारे प्रलोभन काम नहीं आए, लेकिन आख़िरकार 16 साल की उम्र में रानी गाइदिन्ल्यू को गिरफ़्तार कर लिया गया.
गोन्मे लॉम्बिलुंग काबुई इंफाल कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं और इतिहास पढ़ाते हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया, 'रानी शिलांग, गुवाहाटी, आइजॉल, तूरा की जेल में रही हैं. उनके जीवन के अहम साल जेल में ख़त्म हो गए. औपनिवेशिक प्रशासन ने अपमानित करने के हरसंभव प्रयास किए ताकि विद्रोह या बग़ावत भविष्य में न हो पाए. एक ब्रितानी सांसद नैन्सी एसटॉन ने उन्हें जेल से छुड़ाने की कोशिश भी की लेकिन वे अपनी संसद में उसके लिए बहुमत नहीं जुटा पाईं."
जब वे जेल में थीं उस दौरान पंडित जवाहर लाल नेहरू ने रानी गाइदिन्ल्यू से मुलाक़ात की और इस बारे में अख़बार में लेख लिखा. नेहरू ने रानी गाइदिन्ल्यू को उनके साहस और योगदान के लिए पहाड़ों की बेटी और रानी की उपाधि दी. नेहरू ने उन्हें छुड़ाने की भी कोशिश की लेकिन रानी गाइदिन्ल्यू की रिहाई भारत की आज़ादी के बाद ही हो पाई. 14 साल जेल में गुज़ारने के बाद रानी गाइदिन्ल्यू अपने समाज के लोगों को पारंपरिक धर्म हेराका से जोड़ने और नागा जनजातियों के ज़ेलिऑन्गरॉन्ग समुदाय को एकजुट करने में जुट गईं.
मणिपुर यूनिवर्सिटी में इतिहास के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, डॉ मैथ्यू कामई ने बताया कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें रानी की उपाधि दी.

डॉ मैथ्यू कामई के अनुसार, "रानी गाइदिन्ल्यू के आंदोलन का मक़सद ज़ेलिऑन्गरॉंग लोगों के लिए काम करना और उन्हें एकजुट कर एक छतरी के नीचे लाना था जो आज़ादी से पूर्व नागालैंड, मणिपुर और असम में बिखरे हुए थे. उन्होंने इस सिलसिले में देश के प्रधानमंत्रियों पंडित नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी को ज्ञापन भी सौंपा था. उनकी राजनीतिक मांग जिसके लिए उन्होंने संघर्ष किया वो अभी भी पूरी नहीं हुई है."
रानी गाइदिन्ल्यू का मानना था कि अपनी संस्कृति को खोना पहचान को खोना है. दूसरी तरफ आज़ादी के बाद से ही नागा नेतृत्व का एक तबक़ा जैसे नागा नेशनल काउंसिल भारत से अलग होने की बात कर रहा था. वो पारंपरिक धर्म हेराका को स्थापित करने की कोशिशों का भी विरोध कर रहा था. हालात इतने बिगड़े कि रानी गाइदिन्ल्यू को अपने समर्थकों के साथ एक बार फिर अंडरग्राउंड होना पड़ा. लेकिन, फिर भारत सरकार की कोशिशों के बाद साल 1966 में रानी गाइदिन्ल्यू दोबारा मुख्यधारा में लौटीं.
1972 में उन्हें स्वतंत्रता सेनानी ताम्रपत्र और पद्म भूषण जैसे सम्मान से नवाज़ा गया. हेराका से जुड़ी अपनी पहचान को बचाए रखने के लिए वो पहले अंग्रेज़ों से लड़ीं और फिर अपने समाज के अलगाववादियों से. उनका निधन 17 फरवरी, 1993 को हुआ लेकिन अपनी पहचान को कभी न खोने देने की मुहिम, जो रानी गाइदिन्ल्यू ने शुरू की वो आज भी चल रही है.
रिपोर्ट/सिरीज़ प्रोड्यूसर- सुशीला सिंह
(बीबीसी लाई है हमारी पुरखिन की दूसरी सिरीज़ जिसमें हम आपको बताएंगे आठ ऐसी दमदार महिलाओं की कहानियाँ जिन्हें हाशिए पर रहना मंज़ूर नहीं था. हमारी पुरखिन-2 की चौथी कड़ी में आपको मिलवाएंगे ऐसी महिला से जिसने कुली का काम किया लेकिन फिर शिक्षिका बन लड़कियों को आगे बढ़ाया. लेकिन क्या उनके लिए इतना आसान था यह सब कर पाना, जानने के लिए इंतज़ार कीजिए शुक्रवार तक)
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