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सुशील कुमार गिरफ़्तार, पहलवान सागर धनखड़ की हत्या का है आरोप
- Author, आदेश कुमार गुप्त
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए
दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने ओलंपिक पदक विजेता रहे पहलवान सुशील कुमार को गिरफ़्तार कर लिया है.
दो बार के ओलंपिक पदक विजेता सुशील कुमार पहलवान सागर धनखड़ की हत्या के मामले में फ़रार चल रहे थे. पुलिस के मुताबिक़, उन्हें दिल्ली के मुंडका से गिरफ़्तार किया गया है.
भारत के लिए दो बार ओलंपिक मेडल जीत चुके पूर्व विश्व चैंपियन पहलवान सुशील कुमार पिछले कुछ दिनों से फ़रार चल रहे थे. पुलिस ने उनकी सूचना देने वाले को एक लाख रुपये का इनाम देने की घोषणा भी की थी.
सुशील कुमार के ख़िलाफ़ पहलवान सागर धनखड़ हत्याकांड में अपहरण, हत्या, ग़ैर-इरादेतन हत्या समेत अन्य धाराओं में केस दर्ज है.
बीबीसी के सहयोगी पत्रकार रविंदर सिंह रॉबिन के मुताबिक़ एसीपी अत्तर सिंह की निगरानी और इंस्पेक्टर शिवकुमार और इंस्पेक्टर करमबीर सिंह की अगुआई वाली दिल्ली पुलिस की स्पेशल टीम ने सुशील कुमार को गिरफ़्तार किया है.
38 वर्षीय पहलवान सुनील कुमार के अलावा पुलिस ने 48 साल के अजय को भी गिरफ़्तार किया है. सुशील कुमार पर एक लाख रुपये का इनाम था और अजय पर 50 हज़ार रुपये का.
भारत के सबसे बड़े पहलवान माने जाने वाले सुशील कुमार से मेरे संबंध बहुत पुराने रहे हैं. इस दौरान उनका व्यवहार हमेशा मर्यादित रहा.
वो साल 2010 में मेरे बुलाने पर बीबीसी स्टूडियो भी आए, लेकिन देखते-देखते उनका नाम विवादों से जुड़ता गया.
पहले पहलवान प्रवीण राणा और उनके समर्थकों के बीच दिल्ली के एक स्टेडियम में हुई मारपीट, फिर पहलवान नरसिंह पंचम यादव के साथ ओलंपिक में जाने की दावेदारी को लेकर हुआ ट्रायल विवाद या अब पहलवान सागर धनखड़ हत्याकांड.
अखाड़ों पर उठते सवाल
सागर धनखड़ हत्याकांड में उनकी अग्रिम ज़मानत याचिका ख़ारिज हो चुकी है.
पिछले तीन-चार महीने में ये ऐसी दूसरी घटना है जिसने अखाड़ों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं.
फ़रवरी में रोहतक के जाट कॉलेज स्थित अखाड़े में ताबड़तोड़ गोलियों चली थीं जिसमें दो महिला पहलवानों सहित पाँच लोगों की मौत हो गई थी. इनमें कोच और उनकी महिला पहलवान पत्नी भी शामिल थीं.
भारत को अंतरराष्ट्रीय जगत में राष्ट्रमंडल, एशियाई, सैफ़, विश्व चैंपियनशिप और ओलंपिक तक में पदक दिलाने में इन अखाड़ों की बड़ी भूमिका रही है. भारतीय महिला पहलवानों ने भी इनके सहारे कामयाबी के झंडे गाड़े हैं.
हाल की घटनाओं से ज़ाहिर है कि अखाड़ों की गुरु-शिष्य परंपरा, पहलवानों की गुटबाज़ी, दबाव और पैसे से जुड़े विवाद शामिल हैं.
पहले विवादों से दूर रहते थे अखाड़े
पिछले 20-25 सालों में नामी अखाड़े और पहलवान विवादों से दूर ही रहे. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेडल हासिल करने के बाद पहलवानों को बेहद आसानी से रेलवे, पुलिस और दूसरे महकमों में नौकरियाँ मिल जाती थीं जिससे उनके व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में बड़ा बदलाव आता था.
अगर कोई पहलवान ग़ैर क़ानूनी घटनाओं में लिप्त पाया जाता, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर तो दूर वो राष्ट्रीय स्तर के गेम्स में भी शामिल होने की नहीं सोच सकता था.
वो दौर चला गया था जब गली मोहल्लों के लड़कों पर रौब जमाने के लिए लोग पहलवानी करते थे.
सुशील कुमार के कोच द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता सतपाल सिंह क़िस्सा सुनाते थे कि कुछ बच्चे उन्हें बचपन में पीट देते थे जिसके बाद उनके पिता ने उन्हें पहलवानी सीखने गुरु हनुमान के पास छोड़ दिया. कुछ ही दिनों बाद उन्हें पीटने वाले गली-मोहल्ले के उनसे हाथ मिलाने के लिए उनके आगे पीछे घूमने लगे.
अखाड़ा घंटा घर के पास था, जहां से अम्बा सिनेमा ज़्यादा दूर नहीं था. लेकिन सतपाल यह बताना भी नहीं भूलते थे कि गुरु हनुमान किसी को भी पास के सिनेमाघर में पकड़ लेते तो उसकी पिटाई जूतों से करते थे.
गुरु हनुमान के शिष्यों में करतार सिंह, सतपाल, जगमिंदर, सुदेश कुमार और ना जाने कितने पहलवान रहे जिन्होंने कामयाबी के साथ साथ सार्वजनिक जीवन में भी एक मिसाल पेश की और पहलवानों की उस छवि को बदला जिसके चलते कहा जाता था कि पहलवान प्रॉपर्टी के झगड़े सुलझाते हैं या नेताओं के लिए काम करते हैं.
अगर दिल्ली की ही बात करें तो गुरु हनुमान अखाड़ा, छत्रसाल स्टेडियम अखाड़ा, मास्टर चंदगी राम अखाड़ा, जगदीश कालीरमण अखाड़ा, संजय अखाड़ा, प्रेमनाथ अखाड़ा, कैप्टन चाँदरूप अखाड़ा, यह सब जूनियर और सीनियर स्तर पर पहलवान तैयार कर रहे हैं.
अखाड़ों की चुप्पी
सुशील कुमार का नाम सागर घनखड़ हत्याकांड में लिए जाने के बाद अधिकतर अखाड़ों के 'ख़लीफ़ा' चुप्पी साधे हैं. अनौपचारिक बातचीत में हालांकि वो कहते हैं कि सुशील कुमार की वजह से कुश्ती का नाम रोशन हुआ है और वो कोई ऐसी बात नहीं करना चाहते जिससे पहलवान और पहलवानी की छवि ख़राब हो.
राम सोंधी महिला और पुरुष कुश्ती चीफ़ कोच थे जब सुशील कुमार ने स्वर्ण पदक जीता था.
सोंधी कहते हैं कि 2010 में विश्व चैंपियन बनने पर पहलवान को 10 लाख रुपये मिलते थे पर अब तो राष्ट्रमंडल, एशियन और ओलंपिक पदक जीतने पर करोड़ों रुपये हाथ लग जाते हैं.
वैसे वो साफ़ करते हैं कि पहलवानों को धन तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने से ही हासिल हो पाता है.
अखाड़े का खेल ख़ुद बना अखाड़ा
वरिष्ठ खेल पत्रकार राजेन्द्र सजवान का मानना है कि गुरु हनुमान के चेलों ने जो अखाड़े शुरू किए उनमें वो बात नहीं थी, और धीरे-धीरे कुश्ती में असामाजिक तत्व भी सेंध लगाने लगे, और आजकल तो अखाड़ों पर क़ब्ज़ा करने के लिए पहलवानों में लड़ाई होती है.
सजवान कहते हैं कि अखाड़ों में कुछ पुरानी छवियां फिर दिखने लगी हैं. वो छवि जो एक समय अखाड़ों ने ख़ुद अपने दम पर बदली थी कि वहां असामाजिक तत्व रहते हैं.
राजेंद्र सजवान ने गुरु हनुमान पर एक किताब भी लिखी है.
क्या है विवादों की वजह
पुराने दिनों के क़िस्से सुनाते सजवान कहते हैं कि पहलवान चंदगीराम, सतपाल, करतार, सुदेश, जगमिंदर, प्रेमनाथ बताया करते थे कि उन्हें जीतने पर एक रुपया, दस रुपये वग़ैरह मिलते थे. सत्तर-अस्सी के दशक में ज़रूर भारत केसरी, भारत भीम, हिंद केसरी दंगल में लाखों रुपये की कुश्ती होती थी. अब कुश्ती लीग से भी पैसा आने लगा है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक लाने पर तो पैसा मिलता ही है.
लेकिन जो अच्छे पहलवान नहीं बन पाते वह बड़े पहलवानों के पिछलग्गू बन जाते हैं, या भटक जाते हैं. वह पैसा कमाने के लिए ग़लत राह पर चल पड़ते है. यही अखाड़ों में गड़बड़ की वजह है.
इसकी वजह से एक-एक अखाड़े के दो-तीन दावेदार होने लगे हैं. ये पहलवानों में रंजिश की वजह बन रहा है. और पैसा तो हर जगह फ़साद की जड़ है ही.
राजेंद्र सजवान कहते हैं कि वह कुछ दिन पहले भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष बृज भूषण शरण सिंह से कुश्ती को राष्ट्रीय खेल बनाने की माँग उठाने की बात कह रहे थे.
"लेकिन अब इन शर्मनाक घटनाओं ने उन पर पानी फेर दिया है." अब वो कहते हैं कि तमाम अखाड़ों को सरकारी निगरानी में चलना चाहिए.
फ़िलहाल दिल्ली का छत्रसाल स्टेडियम अखाड़ा दिल्ली सरकार की मदद से चलता है. गुरु हनुमान अखाड़ा पहले बिड़ला परिवार की मदद से चलता था, अब गुरु हनुमान के शिष्यों द्वारा बनाए गए ट्रस्ट से चलता है. बाकी अन्य अखाड़े थोड़ी बहुत स्पोर्ट्स ऑथरिटी ऑफ़ इंडिया द्वारा दी गई मदद और सामाजिक संस्थाओं के दान से बेहद मुश्किल से चलते हैं.
पहलवानी के पुराने गुरु और आज के कोच भी गुरु-शिष्य परंपरा को बेहद अहम मानते हैं. उनका मानना है कि महाभारत के समय से चली आ रही ये परंपरा कुश्ती की ही देन है.
जब सुशील कुमार ने रचा इतिहास
भारत में खेलों में गुरुओं को द्रोणाचार्य और खिलाड़ियों को सरकार हर साल अर्जुन पुरस्कार देती है.
प्यारा राम सोंधी सुशील कुमार को लेकर उठे हाल के मामले पर कहते हैं कि हो सकता है कि ये पैसे का मसला हो. सुशील कुमार को सोंधी शर्मीले स्वभाव का मानते हैं जो अपने में मस्त रहते थे.
साल 2008 बीजिंग ओलंपिक को याद करते हुए सोंधी कहते हैं कि सुशील कुमार पहले ही दौर में हारकर निराश अपने कमरे में बैठे थे तब उन्होंने और दो बार के एशियन गेम्स विजेता करतार ने उन्हें समझाया कि उदास मत रहो.
"हो सकता है जिस पहलवान से तुम हारे हो वह फ़ाइनल में पहुँच जाए और तुम्हें रैपचेज़ से पदक जीतने का मौक़ा मिल जाए."
हुआ भी वैसा ही.
उसके बाद सुशील कुमार ने इतिहास रच दिया.
विवादों से सुशील कुमार का नाता
सुशील कुमार पहली बार तब विवादों में आए जब साल 2017 में वो साल 2018 कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए क्वालीफ़ाई कर गए थे लेकिन इसी बीच उनका मुक़ाबला दिल्ली में प्रवीण राणा से हुआ.
मुक़ाबले में सुशील कुमार जीते लेकिन उसके बाद उनके और प्रवीण राणा के समर्थकों में जमकर मारपीट हुई. इसकी शिकायत पुलिस थाने में भी की गई. लेकिन बाद में बात आई गई हो गई.
साल 2016 में हुए रियो ओलंपिक से पहले वो तब विवाद में घिर गए जब 74 किलो भार वर्ग में हिस्सा लेने वाले पहलवान नरसिंह यादव ने उनपर डोपिंग में ख़ुद को फँसवाने का आरोप लगाया था.
तब सुशील कुमार चोट के कारण ओलंपिक क्वालीफ़ायर में हिस्सा नहीं ले सके थे और नरसिंह यादव ने भारत को ओलंपिक कोटा दिला दिया था.
और अब सागर पहलवान की हत्या के मामले में वो फ़रार थे.
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