राजा सुहेलदेव कौन हैं जिनके स्मारक की मोदी ने रखी आधारशिला

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- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तर प्रदेश सरकार बहराइच में राजा सुहेलदेव की याद में उनका स्मारक बना रही है जिसका आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिलान्यास किया.
स्मारक के अलावा बहराइच और श्रावस्ती ज़िलों के लिए तमाम सौगातों की भी घोषणा की गई है. माना जाता है कि इन्हीं ज़िलों में राजा सुहेलदेव का राज्य रहा होगा.
राजा सुहेलदेव को सरकार राजा सुहेलदेव राजभर के तौर पर प्रचारित कर रही है जबकि इससे पहले उन्हें राजा सुहेलदेव पासी के तौर पर भी ख़ूब प्रचारित किया गया जबकि ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो राजा सुहेलदेव को राजपूत समाज का मानते हैं.
शायद इसी वजह से राजपूत समुदाय के लोगों ने राज्य सरकार की इन कोशिशों पर आपत्ति जताई है कि राजा सुहेलदेव को राजपूत की बजाय राजभर क्यों बताया जा रहा है.
रविवार को ट्विटर पर इसके ख़िलाफ़ बाक़ायदा अभियान छेड़ा गया और '#राजपूत_विरोधी_भाजपा' हैशटैग को ट्रेंड कराया गया. रविवार को इस हैशटैग से क़रीब 54 हज़ार ट्वीट किए गए.
राजा सुहेलदेव के नाम पर राजनीतिक पार्टी गठित करने वाले यूपी के पूर्व मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने सरकार की इन कोशिशों को राजनीतिक स्टंट बताया है.
दूसरी ओर योगी सरकार में मंत्री अनिल राजभर ने ओमप्रकाश राजभर को राजभर समाज का नेता होने पर ही सवाल उठाया है.
राजा सुहेलदेव के नाम पर राजनीतिक पार्टी गठित करने वाले ओम प्रकाश राजभर ने सरकार की इन कोशिशों को राजनीतिक स्टंट बताया है.
ओम प्रकाश राजभर 2017 में योगी आदित्यनाथ की कैबिनेट में मंत्री थे लेकिन विवादों के बाद उन्हें 2019 में पिछड़ा कल्याण मंत्री के पद से हटा दिया गया.
अनिल राजभर का कहना है कि ओम प्रकाश राजभर को बिरादरी का नुमाइंदा नहीं माना जाना चाहिए.
हालाँकि ओम प्रकाश राजभर का कहना था कि उन्हें अपनी बिरादरी का भरपूर समर्थन हासिल है लेकिन आदित्यनाथ सरकार ने उनकी अनदेखी की.
ओम प्रकाश राजभर पिछला विधानसभा चुनाव बीजेपी के साथ मिलकर लड़े थे और उनकी पार्टी के चार विधायक चुनकर आए थे. राजभर अब भी उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य है.
इन सबके बीच यह जानना दिलचस्प है कि राजा सुहेलदेव कौन थे और अलग-अलग जातियों के बीच उन पर दावे की वजह क्या हैं?
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इतिहास में नहीं अमीर खुसरो की किताब में ज़िक्र
राजा सुहेलदेव के बारे में ऐतिहासिक जानकारी न के बराबर है. माना जाता है कि 11 वीं सदी में महमूद ग़ज़नवी के भारत पर आक्रमण के वक़्त सालार मसूद ग़ाज़ी ने बहराइच पर आक्रमण किया लेकिन वहां के राजा सुहेलदेव से बुरी तरह पराजित हुआ और मारा गया.
सालार मसूद ग़ाज़ी की यह कहानी चौदहवीं सदी में अमीर खुसरो की क़िताब एजाज़-ए-खुसरवी और उसके बाद 17वीं सदी में लिखी गई क़िताब मिरात-ए-मसूदी में मिलता है. लेकिन महमूद ग़ज़नवी के समकालीन इतिहासकारों ने न तो सालार मसूद ग़ाज़ी का ज़िक्र किया है, न तो राजा सुहेलदेव का ज़िक्र किया है और न ही बहराइच का ज़िक्र किया है.

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इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मध्यकालीन इतिहास विभाग में प्रोफ़ेसर हेरम्ब चतुर्वेदी बताते हैं, "मिरात-ए-मसूदी में ज़िक्र ज़रूर मिलता है लेकिन उसे ऐतिहासिक स्रोत नहीं माना जा सकता है. इसकी वजह यह है कि इस तथ्य की कहीं से कोई पुष्टि नहीं हुई है."
"सुहेलदेव के नाम के न तो कहीं कोई सिक्के मिले हैं, न तो कोई अभिलेख मिला है, न किसी भूमि अनुदान का ज़िक्र है और न ही किसी अन्य स्रोत का. यदि सालार मसूद ग़ाज़ी का यह अभियान इतना अहम और बड़ा होता तो महमूद ग़ज़नवी के समकालीन इतिहासकारों- उतबी और अलबरूनी ने इसका ज़िक्र ज़रूर किया होता."
इतिहास के पन्नों में राजा सुहेलदेव का इतिहास भले ही न दर्ज हो लेकिन लोक कथाओं में राजा सुहेलदेव का ज़िक्र होता रहा है और ऐसा हुआ है कि इतिहास के दस्तावेज़ों की तरह लोक के मन में उनकी वीर पुरुष के तौर पर छवि बनी हुई है.
लेकिन 11वीं सदी के किसी राजा के बारे में चार-पांच शताब्दियों के बाद हुए उल्लेख को इतिहासकार ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं मानते. यही नहीं, जिन दस्तावेज़ों में उनका ज़िक्र हुआ भी है, उनमें भी स्पष्टता की कमी है जो संदेह को और पुख़्ता करती है.

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राजा सुहेलदेव की जाति को लेकर विवाद क्यों?
सवाल यह है कि जब किसी राजा की ऐतिहासिकता पर ही संदेह हो तो उसकी जाति को लेकर इतना विवाद क्यों है और कैसे है?
राजा सुहेलदेव के बारे में समाजशास्त्री प्रोफ़ेसर बद्री नारायण ने अपनी पुस्तक 'फ़ैसिनेटिंग हिन्दुत्व: सैफ़्रॉन पॉलिटिक्स एंड दलित मोबिलाइज़ेशन' नामक पुस्तक में विस्तार से लिखा है.
हालांकि सुहेलदेव की ऐतिहासिकता पर बद्री नारायण भी बात नहीं करते हैं लेकिन उनकी जाति को लेकर होने वाले विवाद पर ज़रूर चर्चा करते हैं.
बीबीसी से बातचीत में बद्री नारायण कहते हैं, "सुहेलदेव को भर समुदाय के लोग भी नायक बताते हैं. पासी जाति भी उन पर अपना अधिकार जताती है और पूर्वी उत्तर प्रदेश में राजभर जाति के लोग भी उन्हें अपना नायक बताते हैं. उनकी जाति को लेकर कई तरह के दावे हैं लेकिन स्पष्ट रूप से कुछ भी कहना संभव नहीं है."
"दरअसल, उस समय जो समुदाय लाठी से मज़बूत होते थे, वो ताकत के बूते अपना राज्य स्थापित करने में कामयाब हो जाते थे. राजा सुहेलदेव के साथ भी ऐसा ही रहा होगा."

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सुहेलदेव की जाति को लेकर कई जाति समूह दावा जता चुके हैं.
मिरात-ए-मसूदी के बाद के लेखकों ने सुहेलदेव को भर, राजभर, बैस राजपूत, भारशिव या फिर नागवंशी क्षत्रिय तक बताया है. इसी आधार पर क्षत्रिय समाज इस बात पर आपत्ति जता रहा है कि सुहेलदेव को उनकी जाति के नायक की बजाय किसी और जाति को नायक के रूप में क्यों सौंपा जा रहा है.
राजपूत करणी सेना के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह रघुवंशी कहते हैं, "क्षत्रिय समाज के राजा सुहेलदेव बैस के इतिहास से छेड़छाड़ करने को राजपूत समाज बर्दाश्त नहीं करेगा. यह हमारे मान, सम्मान और स्वाभिमान से जुड़ा मामला है. राजनीतिक लाभ लेने के लिए उन्हें राजपूत समाज से अलग करने की साज़िश की जा रही है जिसका हम सड़क पर उतरकर विरोध करेंगे."
दरअसल, पूर्वी उत्तर प्रदेश में क़रीब 18 फ़ीसद राजभर हैं और बहराइच से लेकर वाराणसी तक के 15 ज़िलों की 60 विधानसभा सीटों पर इस समुदाय का काफ़ी प्रभाव है.
राजभर उत्तर प्रदेश की उन अति पिछड़ी जातियों में से हैं जो लंबे समय से अनुसूचित जाति में शामिल होने की मांग कर रहे हैं.
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बीबीसी से बातचीत में बद्री नारायण कहते हैं, "सुहेलदेव को भर समुदाय के लोग भी नायक बताते हैं. पासी जाति भी उन पर अपना अधिकार जताती है और पूर्वी उत्तर प्रदेश में राजभर जाति के लोग भी उन्हें अपना नायक बताते हैं. उनकी जाति को लेकर कई तरह के दावे हैं लेकिन स्पष्ट रूप से कुछ भी कहना संभव नहीं है."
बताते हैं कि सम्भवतः 1960 के दशक के आस पास बहराइच और इसके आस-पास के ज़िलों के राजनीतिक विमर्श में विभिन्न जातियों को आकर्षित करने के क्रम में राजा सुहेलदेव के नायकत्व का भी महत्व बढ़ा. उनके मुताबिक़, "सुहेलदेव का राजनीतिक महत्व बढ़ने से पासियों और अन्य सामाजिक समूहों के गर्वबोध का भी विस्तार हुआ. बाद में बहुजन समाज पार्टी ने इन सामाजिक प्रतीकों का राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास किया और अब बीजेपी उसी अभियान को आगे बढ़ा रही है."
साल 2002 में बहुजन समाज पार्टी से अलग होने के बाद ओमप्रकाश राजभर ने नई पार्टी बनाई और उसका नाम रखा- सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी. लेकिन बीजेपी सुहेलदेव के नाम पर राजभर समुदाय को जोड़ने की कोशिश में है. सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी पहले बीजेपी के साथ एनडीए गठबंधन में थी लेकिन अब वह उस गठबंधन से अलग है.

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